“योगक्षेमो नः कल्पताम्”… इस वाक्य का क्या अर्थ है?

यह ऋचा शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के अध्याय २२ की २२ वीं कंडिका से ली गई है: यह वैदिक राष्ट्रगान जिसमें संपूर्ण राष्ट्र और उसके नागरिकों, पशुओं, फसलों आदि के कुशल क्षेम की कामना की गई है। “आ ब्रह्मन् ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चसी जायतामराष्ट्रेराजन्य: शूर ईषव्योअति व्याधी महारथो।जायतां दोग्ध्री धेनुर्वाढानाड्वानाशु: सप्ति: पुरंध्रिर्योषा जिष्णु रथेष्ठा सभेयो युवास्या यजमानस्य वीरो जायताम निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न औषधय: पचयंताम् योगक्षेमो न: कल्पताम्“। ‘योगक्षेमो कल्पताम् का अर्थ है जो प्राप्त है उसकी रक्षा करने की एवं जो अप्राप्त है उसको प्राप्त करने की क्षमता बनाए रखने की प्रार्थना की गई है’। योग: अप्राप्त की प्राप्ति क्षेम:प्राप्त की रक्षा कल्पताम्: में समर्थ हो। भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है: अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासिते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।०९/२२ अनन्यदर्शी निष्कामी भक्त अपने योगक्षेम की चिंता नहीं करते हैं,वे निरंतर अनन्य भक्ति भाव से मुझको भजते रहते हैं या निष्काम उपासना करते रहते हैं, […]

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