उत्तरं जलस्रवो नित्यं, तत्र तिष्ठन्ति देवताः।
- शिव आगम, कर्णा अध्याय के अनुसार जहाँ जल उत्तर दिशा से बहता है, वहाँ देवता निवास करते हैं। इसलिए शिवलिंग से निकलने वाला जल उत्तर की ओर जाए तो वह शुद्धि, समृद्धि और मोक्षमार्ग का प्रतीक होता है।
amrutam पत्रिका, ग्वालियर से साभार
उत्तरं यत्र वहति हरिजलं शंभुभक्तेः प्रसादम्।
तत्रैव तिष्ठति हरिः स्वयं भक्तवशो नित्यम्॥
- अर्थात-जहाँ शिवलिंग से अभिषेक का जल उत्तर दिशा में प्रवाहित होता है, वहाँ स्वयं हरि (विष्णु) और शिव दोनों का आशीर्वाद स्थायी होता है।
- वास्तुशास्त्र के अनुसार उत्तर दिशा में चुंबकीय ध्रुव का प्रभाव सबसे शुद्ध माना जाता है। जल यदि इस दिशा में बहता है तो वह विद्युतचुंबकीय तरंगों को संतुलित कर ऊर्जा प्रवाह को स्थिर करता है। इसलिए प्राचीन मंदिरों में जलहरि का मुख उत्तर की ओर रखने से पूरे गर्भगृह में positive ionic flow बनता है!
उत्तर दिशा क्यों शुभ मानी गई है?
- उत्तर दिशा का अधिपति कुबेर हैं-धन, स्थिरता और ज्ञान के देवता। यह दिशा सूर्य के उत्तरायण का संकेत है अर्थात ऊर्ध्वगति, उन्नति और प्रकाश का मार्ग। इसलिए जलहरि का मुख उत्तर की ओर रखने का अर्थ है जीवन का प्रवाह अब नीचे नहीं, ऊपर की ओर उत्तरायण दिशा में हो। यह प्रतीकात्मक रूप से संसारिक भाव से आत्मिक भाव की यात्रा है।
शिवलिंग की जलहरि का अर्थ और रहस्य
- जलहरि वह भाग होता है जहाँ शिवलिंग से अभिषेक का जल एकत्र होता है और बाहर निकलता है। यह नालीनुमा भाग सदैव उत्तर दिशा में बनाया जाता है क्योंकि जल उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित होकर देवताओं के मार्ग (देवयान) में जाता है। आगम शास्त्र कहता है
उत्तर का उत्तर- रहस्यमय उत्तर
- उत्तर का उत्तर क्या है? यह अत्यंत दार्शनिक प्रश्न है। उत्तर का अर्थ केवल दिशा नहीं, प्रत्युत्तर भी है। जब हम किसी प्रश्न का “उत्तर” देते हैं, तब भी हम ज्ञान के उत्तर दिशा की ओर बढ़ते हैं। तो उत्तर का उत्तर वह स्थिति है! जहाँ प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। वह है-शिव जो हर प्रश्न, हर दिशा, हर उत्तर से परे है।
- उत्तर दिशा में जलहरि का रहस्य यह है कि यह जीवन की चेतना को दक्षिण (मृत्यु) से उत्तर (मोक्ष) की ओर मोड़ने की यंत्र-संरचना है। और उत्तर का उत्तर है!
- शिव का मौन -जहाँ कोई प्रश्न, कोई दिशा, कोई जल भी नहीं, केवल अस्तित्व की एकता है।
मस्तिष्क स्वरूप किंग- शिवलिंग
- शिवलिंग का वह भाग, जिससे अभिषेक का जल उत्तर दिशा में प्रवाहित होता है, उसे जलहरि” कहा जाता है। शिवलिंग केवल पत्थर का टुकड़ा नहीं, बल्कि जीवन ऊर्जा की दिशा निर्धारित करने वाला वैदिक यंत्र है।
- शिवलिंग पर जब जल, दूध या पंचामृत चढ़ाया जाता है, तो उसका प्रवाह हमारी चेतना के प्रवाह का प्रतीक होता है। वास्तु, आगम और तंत्र सभी कहते हैं जलहरि सदा उत्तर दिशा की ओर ही रखी जानी चाहिए।
- उत्तर दिशा का अधिपति कुबेर है! धन, स्थिरता और सिद्धि के देवता। यही दिशा ज्ञान, समृद्धि और मोक्ष की ओर जाने का मार्ग भी मानी गई है।
- उत्तर दिशा = देवयान मार्ग यह दिशा सूर्य के उत्तरायण की है अर्थात् प्रकाश, ज्ञान और उन्नति की ओर अग्रसर होना।जब शिवलिंग से जल उत्तर की ओर बहता है, तो वह बताता है कि अब जीवन का प्रवाह मृत्यु (दक्षिण) से हटकर अमरत्व (उत्तर) की ओर है। जो साधक की ध्यानावस्था को गहराई देता है।


