कर्नाटक राज्य बंगलौर से २०० km दूर हासन शहर में जो प्राचीन काल में यह स्थान सिंहासनपुरी के नाम से प्रसिद्ध था। हासन का अर्थ है मुस्कान!
यहाँ स्थित दुनिया का एक मात्र माँ सप्तघृत मातृका मंदिर, साल में केवल ७ दिन के लिए खुलता है! मंदिर के बंद होने के बाद भी अंदर का दीपक पूरे वर्ष जलता रहता है, और देवी को चढ़ाया गया प्रसाद ताज़ा बना रहता है जो एक बड़ा चमत्कार माना जाता है।

रावणोत्सव जात्रा — आस्था का महापर्व
बाली पड्यमी के दिन मंदिर परिसर में रावणोत्सव नामक भव्य मेला आयोजित होता है। यह आयोजन भगवान सिद्धेश्वर स्वामी को समर्पित होता है। हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस जात्रे में हिस्सा लेते हैं।
ढोल-नगाड़ों से पूरा क्षेत्र जय दशानन हर हर हर महादेव
जयघोष से गूंज उठता है। यहाँ शिव भक्त और राहु अवतार रावण की विशेष पूजा अर्चना की जाती है!
हासन में माँ का ये मंदिर जैन तीर्थ श्रवणबेलगोला से क़रीब लगभग 50 किमी की दूरी पर है! यहाँ रावण अभी भी जीवित अवस्था में शिव भक्ति कर रहे हैं! उन्हें जैन धर्म में अगले भव में प्रथम तीर्थंकर के रूप में पूजा जाएगा!
देवी हसनम्बा मंदिर का इतिहास: दया, न्याय और चमत्कारों से भरा रहस्यमय स्थल है! हसनम्बा नाम का अर्थ है- हासन की मां!
देवी हसनम्बा को दयालु माता के रूप में पूजा जाता है।
पर जब बात अपने भक्तों की आती है, तो वे किसी भी अन्याय को सहन नहीं करतीं। माँ की न्यायप्रियता से जुड़ी कई लोककथाएं आज भी स्थानीय लोग बड़े विश्वास से सुनाते हैं।
चमत्कारिक बहू का पत्थर
एक भक्त बहू रोज़ मंदिर आकर देवी की पूजा करती थी।
लेकिन उसकी सास हमेशा उसके साथ बुरा व्यवहार करती थी। एक दिन जब बहू मंदिर में प्रार्थना कर रही थी, तो सास पीछे से आई और बोली !
तेरे लिए मंदिर ज़्यादा ज़रूरी है या घर के काम?
और फिर उसने सिर पर प्याले से ज़ोरदार प्रहार किया।
डरी हुई बहू ने अम्बा पुकारते हुए देवी से सुरक्षा मांगी।
तभी देवी हसनम्बा प्रकट हुईं और बहू को एक पत्थर में बदल दिया, ताकि वह सदा देवी के संरक्षण में रहे।
इस पत्थर को “सोसे कल्लू” (बहू का पत्थर) कहा जाता है।
यह पत्थर हर वर्ष धान के दाने के आकार में देवी की ओर थोड़ा-थोड़ा बढ़ता रहता है।
यह चमत्कार आज भी मंदिर में देखने को मिलता है और हजारों श्रद्धालु इसे साक्षात न्याय का प्रतीक मानते हैं।
लुटेरों का पत्थर (कल्लपना गुड़ी) की सच्चा किस्सा-
चार लुटेरों ने एक बार देवी के आभूषण चुराने की कोशिश की। देवी ने उन्हें वहीं पकड़ा और दंड स्वरूप पत्थरों में बदल दिया।
ये चारों पत्थर आज भी मंदिर परिसर के एक कोने में “कल्लपना गुड़ी” के नाम से देखे जा सकते हैं।
माना जाता है कि कोई भी व्यक्ति इस पवित्र स्थान में बुरे इरादे से प्रवेश नहीं कर सकता।
सिद्धेश्वर स्वामी मंदिर
मंदिर परिसर में एक और ऐतिहासिक मंदिर स्थित है!
सिद्धेश्वर स्वामी मंदिर जो भगवान शिव को समर्पित है।
यहां की पत्थर की मूर्ति में भगवान शिव को अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्रदान करते हुए दर्शाया गया है। केवल शिवजी का यह मंदिर प्रतिदिन दर्शन के लिए खुला रहता है और भक्त बड़ी श्रद्धा से यहां पूजा करते हैं।
हसनम्बा मंदिर के खुलने की अनोखी परंपरा इस मंदिर की सबसे रहस्यमय बात यह है कि
देवी हसनम्बा मंदिर वर्ष में सिर्फ एक बार ही खुलता है।
सन् 2017 में मंदिर 12 अक्टूबर को खोला गया था
और 21 अक्टूबर 2017 को मंदिर बंद हुआ था।
2017 में भी मंदिर अश्विजा मास की पूर्णिमा के बाद वाले गुरुवार को खोला गया था और बाली पड्यमी (दीवाली के बाद का दिन) तक दर्शन चला था।
रावण- आस्था, अध्यात्म और धर्म का अद्भुत प्रतीक
जब पूरा हासन जय दशानन, हर हर महादेव के नारे से गूंजता है, तब रावण केवल “लंकापति” नहीं होता वह ज्ञान, तपस्या और धर्म के उच्च शिखर पर विराजमान एक योगी और तांत्रिक रूप में पूजे जाते हैं।
तीर्थंकर जैसी तपस्या
किंवदंती के अनुसार रावण ने कैलाश पर जाकर हजारों वर्ष तक महादेव की कठोर आराधना की थी। जिस एकाग्रता और आत्म-बल से उसने शिव को प्रसन्न किया, उसे तीर्थंकरों की तपस्या के समान माना गया है।
तपसा सिद्धिर्भवति, तपसा धर्मः प्रतिष्ठितः।


