क्या आपने कभी सोचा है जिस सूर्य को हम केवल एक तारा समझते हैं, वह वास्तव में सम्पूर्ण सृष्टि का साक्षात् चेतन रूप है!
वेदों और उपनिषदों में कहा गया है कि सूर्य ही शिव का स्वरूप है, जो समस्त अणुओं में व्याप्त विष्णु तत्व की रक्षा करता है।
प्रत्येक किरण में सृष्टि की गति है। प्रत्येक अणु में ईश्वर की ज्योति है- और यही वह आध्यात्मिक-वैज्ञानिक रहस्य है जिसे आज तक विज्ञान भी पूर्णतः समझ नहीं पाया।
सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च नित्यः प्रबोधकरः।(ऋग्वेद 1.115.1)
सूर्य समस्त चर-अचर जगत् का आत्मा है; वही जागृति, चेतना और जीवन का आधार है।
सूर्य -शिव स्वरूप और विश्व का अधिष्ठान! सूर्य केवल प्रकाश का गोला नहीं, वह शिव की दाहिनी आँख है। उसके प्रत्येक अणु में सृष्टि का संतुलन छिपा है।
प्रत्येक फोटॉन, प्रत्येक ऊर्जा कण सृष्टि के तालमेल का नर्तक है।
यत्र विश्वं भवत्येकनीडं, तत्र सूर्यः शिवरूपधारी।
अर्थात- जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक ही कण में समाया है, वहाँ सूर्य शिव का रूप धारण करता है।
सूर्य और विष्णु का अणु-संबंध:
भारतीय दर्शन कहता है
विश्वं विष्णुर्विष्णु विश्वं! अर्थात् विश्व और विष्णु एक ही हैं। विष्णु पालनकर्ता शक्ति हैं जो हर अणु में जीवन का प्रवाह बनाए रखते हैं।
सूर्यदेव अपनी किरणों से इन अणु-विष्णु तत्वों की रक्षा करते हैं, ताकि जीवन की पालन स्थिति अविच्छिन्न बनी रहे। यही कारण है कि वैदिक ग्रंथों में सूर्य को विष्णुपालक तेजः कहा गया है।
सूर्य और अणु की वैज्ञानिक एकता
आधुनिक विज्ञान अब यह मानता है कि सूर्य का फोटॉन (प्रकाश कण) ही पृथ्वी के हर अणु में ऊर्जा प्रवाहित करता है। पौधों के क्लोरोफिल से लेकर मनुष्य की कोशिकाओं तक हर जगह सूर्य की स्पंदनात्मक ऊर्जा चलायमान है। जो चलता है, वही ईश्वर है और जो ईश्वर है, वह चलने का ही कारण है।
मानव शरीर के अणुओं पर सूर्य कृपा–
हमारे शरीर में प्रतिदिन करोड़ों कोशिकाएँ (अणु) नष्ट होकर नई बनती हैं। यह जीवन की नित्य नवनीकरण प्रक्रिया है और इसका मुख्य प्रेरक है सूर्य।
ब्राह्ममुहूर्त में उठना और प्रातःकाल सूर्य दर्शन करने से हमारे भीतर स्थित अणुओं को जीवनीय ऊर्जा प्राप्त होती है।
सूर्य की किरणें माइटोकॉन्ड्रिया (शरीर के ऊर्जा केंद्र) को सक्रिय कर शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कई गुना बढ़ा देती हैं।
सूर्यो रोगहरः नित्यं, बलं बुद्धिं च वर्धयेत्।
अर्थ: सूर्य का ध्यान और दर्शन रोगों का नाश कर बल और बुद्धि प्रदान करता है।
उपनिषद् का गूढ़ संदेश !तमसो मा ज्योतिर्गमय!
यह केवल आध्यात्मिक वाक्य नहीं, बल्कि क्वांटम ट्रुथ है अर्थात् “अंधकार से प्रकाश की ओर! यानी जड़ता से चेतना की ओर! अवसाद से ऊर्जा की ओर! अज्ञान से ज्ञान की ओर। सूर्य के माध्यम से यह यात्रा संभव होती है।
जब हमारे भीतर के अणु प्रकाशित होते हैं, तो आत्मा जाग्रत हो जाती है और यही है सूर्योपासना का परम रहस्य।
सूर्य -आत्मा का साक्षी
सूर्य आत्मा आत्मनां साक्षी।
सूर्य आत्माओं का भी आत्मा है।)
सूर्य केवल बाहर का नहीं, भीतर का प्रकाश है।उसकी कृपा से ही मन में विचार, हृदय में करुणा और शरीर में जीवन का स्पंदन बना रहता है।
सूर्य केवल आकाश का दीपक नहीं, वह शिव की दृष्टि, विष्णु की ऊर्जा और ब्रह्मा की रचना शक्ति का समन्वय है, जो इस सत्य को जान लेता है, उसके भीतर के अंधकार का अंत हो जाता है।
सूर्ये स्थितं विश्वं, विश्वे स्थितो सूर्यः।
सूर्य ही विश्व है, और विश्व ही सूर्य है।


