रं बीज मंत्र नाभि को जागृत करने के लिए श्रेष्ठ है। इस बीज मंत्र के अजपा जप से यह सिद्ध होने से नाभि में अमृत स्थापित हो जाता है। इससे अग्नि तत्व की वृद्धि होती है।
रं बीज मंत्र की सिद्धि पाने के बाद यदि कोई दुरुपयोग करता है, उसका अंत हो जाता है। बाल्मीक रामायण एवं दक्षिण रामायण में बताया है कि रं बीज मंत्र का दुष्प्रभाव या दुरुपयोग ही राम-रावण का युद्ध है।
ऐसे ही मूलाधार जागृत करने हेतु लं बीज मंत्र जपते हैं। स्वाधिष्ठान को जागृत हेतु वं बीज मंत्र जपते हैं। हर हर बम बम यह मन्त्र भी स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करता है।
विशेष बात यह है कि हमें सुनी सुनाई बातों या कथा की लता पर भरोसा न करके अपने वैज्ञानिक ग्रन्थ-पुराणों का अध्ययन करना चाहिए। सच्चाई का पता लगेगा।
कभी मौका लगा, तो अमृतम रावण विशेषांक लिखा हुआ रखा है। सम्पादन हेतु वक्त नहीं मिल पाने के कारण जब यह प्रकाशित होगा, तो भक्तों के होश उड़ जाएंगे कि कितना भ्रम फैलाया जा रहा है। यह विवाद का विषय बन सकता है इसलिए इसे प्रिंट नहीं कर पा रहे हैं। यह 35 वर्षों के अध्ययन, अनुसन्धान के फलस्वरूप तैयार हो सका है।
ऐसे ही अमृतम अघोर विशेषांक एवं राहु-केतु के प्रतीक श्री गणेश विशेषांक भी प्रकाशित होने की कगार पर है।
बस इतना अभी समझ लें कि जितने भी सिर कटे देवता हैं, वह सब राहु-केतु का ही रूप हैं।
वैसे कबीरदास जी खनाए है कि-
जैसे-श्री गणपति, खाटू श्याम जी, भैरोनाथ जी आदि।
यह सब भयंकर ताकतवर, शक्तिदाता, शक्तिशाली देव हैं। इनके ऊपर का मुख राहु है और नीचे का हिस्सा केतु है।
रं बीज मंत्र का रहस्य – नाभि में अमृत का उदय एक वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टि से आज तक दिव्य रहस्य है!
रं बीज मंत्र की दिव्यता
वेदों और तंत्रशास्त्रों में “रं” बीज मंत्र को अग्नि तत्व का प्रतिनिधि कहा गया है। यह मंत्र नाभि चक्र अर्थात मणिपुर चक्र को जागृत करता है। जब साधक अजपा जप (बिना मुख से बोले मानसिक जप) करता है, तो उसके भीतर स्थित सुप्त अग्नि जागृत होती है और वहीं से अमृत नाभि में स्थापित हो जाता है!
रं रं करि जो जपे निरंतर।
जाग्रति नाभि, प्रकटे अमृतांतर॥
इस सिद्धि से व्यक्ति में अग्नि, ओज, तेज और मेधा की अद्भुत वृद्धि होती है। परंतु, यह शक्ति अत्यंत संवेदनशील है! इसका दुरुपयोग करने वाला स्वयं अपने अंत का कारण बन जाता है!
राम–रावण युद्ध और रं बीज का रहस्य बाल्मीकि रामायण एवं दक्षिण रामायण में उल्लेख है! रावण ने “रं बीज” की शक्ति को वशीकरण और बल-सिद्धि के लिए प्रयोग किया।
किन्तु जब यह अग्नि भक्ति के मार्ग से हटकर अभिमान में परिवर्तित हुई, तो यही “रं” बीज अग्नि बनकर उसके अंत का कारण बना।
रं बीज बल, रावण तन मांहि।
सोइ बने दावानल, प्रलय सम आहि॥


