वेद-पुराणों में बताया है-विवाह में अग्नि के सात फेरे और सप्त धातुओं को ऊर्जावान बना
एक दम नवीन जानकारी-
अमृतम पत्रिका के इस ब्लॉग में
वैदिक रीति से विवाह करने पर होता है यह फायदा….
विवाह के सात फेरे लेने से….
शरीर में अग्नि का आवागमन सुचारू रूप से होने लगता है। हमारी देह अग्नि, ऊर्जा से ही चलायमान है हैं। विवाह के वक्त सात फेरे और सात अग्नियों का बड़ा पवित्र महत्व है-
अग्नियां सात प्रकार की होती हैं-
【१】 हिरण्य
【२】 कनका
【३】 रक्ता
【४】 आरक्ता
【५】सुप्रभा
【६】 बहुरूपा
【७】सती।
इन्हें जिव्हादेवी कहा गया है। विवाह में इन्हीं ७ अग्नि के ७ फेरे लेने का वैदिक विधान है। फेरे लेेते समय इन अग्नियों के ध्यान-स्मरण से सर्व सर्वार्थसिद्धि सहज-सरल सम्भव है।
(भविष्यपुराण, ब्राह्मपर्व अध्याय-१६)
शादी में फेरे के 7 पवित्र वचन और महत्व…
विवाह के समय पति-पत्नी अग्नि को साक्षी मानकर एक-दूसरे को सात वचन देते हैं जिनका दांपत्य जीवन में काफी महत्व होता है।
{१}~ तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया
सहैव प्रियवयं कुर्या:
पुज्यो यथा स्वौ पितरौ ममापि
तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
पहले वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ, तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना। कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
{२}~ जीवनम अवस्थात्रये पालनां कुर्यात
कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
{३}~ स्वसद्यकार्ये व्यहारकर्मण्ये
व्यये मामापि मन्त्रयेथा
न मेपमानमं सविधे सखीना
द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्वेत!
तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे यह वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूं।
{४}~ कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य
कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं
ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ:।।
अर्थात- कन्या चौथा वचन यह मांगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिंता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जब कि आप विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूं!
{५}~ स्वसद्यकार्ये व्यहारकर्मण्ये
व्यये मामापि मन्त्रयेथा
वामांगमायामि तदा त्वदीयं
ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या!!
इस वचन में कन्या कहती जो कहती है, वह आज के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत महत्व रखता है। वह कहती है कि अपने घर के कार्यों में, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मंत्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।)
यह वचन पूरी तरह से पत्नी के अधिकारों को रेखांकित करता है। अब यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नी से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नी का सम्मान तो बढ़ता ही है, साथ-साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है।
{६}~ न मेपमानमं सविधे सखीना
द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्वेत
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं
ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!!
अर्थात- कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूं, तब आप वहां सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे। यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आपको दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
{७}~ परस्त्रियं मातूसमां समीक्ष्य
स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कूर्या।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच:
सप्तमंत्र कन्या!!
अर्थात-सातवे अंतिम वचन के रूप में कन्या यह वचन मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और पति-पत्नी के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगे। यदि आप यह वचन मुझे दें, तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है।
विवाह में ७ वचनों का शरीर पर असर…
विवाह में 7 कदम सूर्य के सात अश्वशक्ति के समान हैं। ”
सात वचन” के बंधन से शरीर की –
सप्त धातु- मजबूत होती हैं। जैसे
■ रस
■ रक्त
■ माँस
■ मेद
■ हड्डियां
■ मज्जा
■ वीर्य।
(अमृतसागर श्रीसवाई प्रताप सिंह पेज -९)
सात की संख्या सर्वाधिक शुभकारक होने से
शादी के समय में ७ वचनों का विशेष महत्व है। बरसात की सात बूंदे, व्यक्ति के अंदर सप्त विकृति नाशक हैं, प्रकृति से गुंजित संगीत के सात सुर (स्वर) शरीर का संक्रमण दूर कर देते हैं।
वर्षाऋतु में आकाश की रंगीन छटा बिखेरते इंद्रधनुष में रंग भी सात होते हैं। पवित्र महासागर भी सात मान जाते हैं।
तारों के समूह को सप्तऋषि कहते हैं।
विवाह -स्वास्थ्य वर्द्धक होता है…
अथर्ववेद की एक ऋचा/मन्त्र के अनुसार
पचनेन्द्रीय कमजोरी एवं पाचनतंत्र
की खराबी से रस शरीर में रक्त का निर्माण नहीं कर पाता। रस ही हमारी त्वचा को चमकदार बनाते हैं।
देह में आत्मविश्वास में हीनता होने का मतलब है कि शरीर में रस का नवनिर्माण ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा और दिनोदिन रोगप्रतिरोधक क्षमता क्षीण होती जा रही है।
◆ रसतत्व विवेचन ◆ रसह्रदयतन्त्र
◆रसौपनिषद (प्रथमखण्ड)
◆ रसशास्त्र प्रवेशिका
[प्रकाशक कृष्ण-गोपाल ग्रंथशाला]
इन पुस्तकों के अनुसार……
एक बात और याद रखें कि-मेटाबोलिज्म की
मजबूती तथा लिवर के ठीक रहने से व्यक्ति में द्वेष-दुर्भावना उत्पन्न नहीं होती। स्मरण रहे कि- लिवर फंक्शन जितना करेक्ट होगा, व्यक्ति उतना ही
व्यक्ति का तन-मन प्रसन्नता, आत्मविश्वास और मनो
फिलहाल शरीर में रस निर्माण हेतु


और ”
अमॄतम टेबलेट”
का 3 से 5 माह तक सेवन कर यकृत को क्रियाशील तथा पाचनतंत्र को रो
विवाह उपरांत सातों का सम्मान और
अभिवादन करें…
सुखी वैवाहिक जीवन के लिए
१-माता, २-पिता, ३-गुरु, ४-ईश्वर,
५-सूर्य, ६-अग्नि और ७-अतिथि
इन सातों को अभिवादन करना चाहिए।
पावक, पवित्र, पूज्यनीय पत्नी…
महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र एवं
स्त्री प्रदीपिका ने बताया है कि पत्नी भी पवन वाहक होती है। पीड़ा देना और पीड़ारहित करना इनके लिए पलभर का काम है-
पत्नी को क्षणे रुष्ठा-क्षणे तुष्टा कहा गया है।
पुराणों में पत्नी का अर्थ है…
पतनात् त्रायते इति पत्नी!
अर्थात पति को जो पतन से बचाती है,
जो पति की मति भ्रष्ट नहीं होने देती।
उसे पत्नी कहा जाता है। कुछ लोग पत्नी
के साथ ज्यादा अति करते हैं, उनकी पत्नी
शादी के कुछ दिनों बाद, कम उम्र में ही सती या
तलाक लेकर अलग हो जाती है।
इसलिए कहा गया-धन्यो गृहस्थाश्रमः
नारद पुराण के अनुसार विवाह 7 प्रकार के होते हैं-
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथाऽऽसुरः।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः।।
ब्रह्म, दैव, आर्य, प्राजापत्य (बिना किसी अनुठान, आयोजन, भोजन के कन्या प्रदान करना।)
असुर विवाह (दहेज ले-देकर करना),
गन्धर्व (प्रेमविवाह)
राक्षस-पिशाच (कन्या की इच्छा के विपरीत, जबरदस्ती विवाह करना)
स्वस्थ्य शरीर को सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म गया है। अतः तन्दरुस्त, पुरुषार्थी पुरुष को ही विवाह करना चाहिए, जो पत्नी को पूरी तरह सन्तुष्टि प्रदान कर सके- मनु सहिंता
जीवन में स्वस्थ्य रहने के लिए सात नित्य
क्रियायों का भी ध्यान रखें-
शौच, दंतधावन, स्नान, ध्यान, भोजन, भजन और शयन यह सात क्रियाएँ मानव जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन संस्कार पूर्ण नियमो से घर में सिद्धि-समृद्धि आती है।
सात विकारों की शुरुआत-अन्त भी शादी
के बाद ही होती है-
◆काम, ◆क्रोध ◆मद , ◆लोभ
◆मोह ◆ईर्ष्या ◆द्वेष
आदि सप्त विकार ही मनुष्य के पतन
का कारण बनते हैं। स्त्री इन सब दोषों से
पुरुष को बचाती है, इसलिए उसे पत्नी
कहा जाता है।
वधू का अर्थ है वर्धन
अर्थात..
वृद्धि या बढ़ाना। स्त्री पुत्र पुत्रियों को
जन्म देकर वंश वृद्धि करती है। इसलिए
स्त्री को वधु कहा जाता है।
लेकिन कुछ भी हो पत्नी, विद्या, ओषधि के बराबर सच्चा जीवन साथी, मित्र कोई नहीं होता! श्लोक है-
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
रुग्णस्य चौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च।।
अर्थात : प्रवास की मित्र विद्या, घर की मित्र पत्नी, मरीजों की मित्र औषधि और मृत्योपरांत मित्र धर्म ही होता है।
निम्नलिखित सातों प्रकृति बंधक हैं अर्थात इन सात रूपों में प्रकृति-स्त्री अपने आपको बांधकर रखती है।
? ~धर्म
? ~अधर्म
? ~अज्ञान
? ~वैराग्य
? ~अवैराग्य
? ~ऐश्वर्य
? ~अनैश्वर्य
कुछ लोग पत्नी को कितना ही बुरी बोलें,
लेकिन सात पुरी के दर्शन पत्नी की प्रेरणा से ही हो पाते हैं-
सप्तपुरी के नाम इस प्रकार हैं-
₹ – अयोध्या पुरी
₹ – मथुरा
₹ – मायापुरी
₹ – काशी
₹ – कांचीपुरम चेन्नई
₹ – उज्जैन
₹ – द्वारकापुरी
स्त्री जातक ग्रन्थ में स्त्री और शहद में
समानता और भेदो का वर्णन है अर्थात
जैसे मधु के भेद हैं, उतने ही भेद स्त्री के
भी बताए हैं-
& माक्षिक मधु (यह सर्वश्रेष्ठ होता है)
अमॄतम मधु पंचामृत इसी से तैयार होता है।
& भ्रामर मधु
(भौरे की तरह काली मक्खियों द्वारा निर्मित मधु भ्रामर कहलाता है, जो श्वेतवर्ण का होता है)
& क्षौद्रा मधु (छोटी मक्खी का मधु)
& पौत्तिक मधु (यह मधु घृतवर्ण का होता है)
& छात्र मधु (छत्ते से निकला मधु)
& आर्ध्य मधु
& औद्दालक मधु (नाग की बाँबी के कीड़ों के बिल से निकला हुआ चेप या मधु। एक हिन्दू तीर्थ नाम)
& दाल मधु (संडान्ध रहित)
मधु (शहद) एक ऐसी पवित्र वस्तु है
जिसमें सड़ांद कभी उत्पन्न नहीं होती।
मधु देह में उत्पन्न होने वाली सड़न
एवं सड़ांद को भी रोकता है। इसीलिए
आआमृतम मधु पंचामृत पाचक व रोगनाशक है।
वेदों में मधु…..इसका वेदमन्त्र भी है।
अथर्ववेद के कांड एक, सूक्त- 34,
मंत्र-1-5 के ऋषि-अथर्वा और
देवता मधुवल्ली के मुताबिक मधु
में शिव का वास होता है। मधु में
कल्याण की भावना होने से यह देवपूज्य है।
अघोरी पन्थ में मधु-विद्या उपयोगी है।
विशेष- मधु या शहद के अदभुत चमत्कार,
ग्रह शांति, राहु को मधु क्यों पसंद है आदि अनेक जानकारी अमॄतम पत्रिका के अगले अंकों में दी जावेगी।
मान्यता है कि शादी के बाद जीवन
में चमत्कार होने लगते है।
“चमत्कार-चंद्रिका, विश्वेश्वर” के अनुसार
जीवन में ये सात चमत्कार भेद होते हैं-
!!गुण !!रीति !!वृत्ति !!पाक
!! शैय्या !!अलंकार !!रस आदि इनमें
परिवर्तन प्रारम्भ हो जाते हैं।
घर-परिवार की यह जरूरत है।
विवाह के बाद ही आदमी का जागरण
शुरू होता है, तब तक व्यक्ति सोया हुआ
जीता है। शास्त्रों में लिखा है कि-
7 लोग सदैव जगाने या जगने योग्य हैं-
(१) गुरु (२) विद्यार्थी (३) भण्डा
(४) कृषिरक्षक किसान (५) कार्यकर्ता
(६) भामिनि अर्थात सुंदर स्त्री
(७) बुभुक्षित यानि भूखा।
परम्परागत पत्नियां परिवार को देवलोक
बना देती हैं। “मनुस्मृति” के मुताबिक जिस
घर में भगवान शिव की पूजा होती है,
वह घर देवलोक स्वरूप है।
स्कन्ध पुराण में सात देवपुरी का वर्णन है-
#शिव # विष्णुपुरी # ब्रह्मपुरी
# वरुणपुरी # अलकापुरी # अमरा
जिन घरों में प्रातः-सांय दीप जलता है,
वहां सृष्टि के सातों द्वीप आकर नमन करते हैं।
द्वीप सात बताए जाते हैं-
¶ कुश ¶ शाक ¶ जम्बू ¶ शाल्मली
¶ क्रोंच ¶ प्लक्ष ¶ पुष्कर।
अच्छी पत्नी पाकर व्यक्ति धन-धान्य
हो जाता है।
धान्य 7 तरह के होते हैं-
■ गेँहू ■ जौ ■ तिल ■ उड़द ■ मूं
■ मसूर ■ काँगनी।
शादी के बाद ही व्यक्ति के सातों स्वर खुलने लगते हैं। सात स्वर/गान इस प्रकार है…
षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद !!सा रे गा मा पा धा नि सा!!
स्वर साधना से सात देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। स्वर के भी देवता 7 हैं…
{1} षड्जाधिदेव अग्नि:
{2} ऋषभाधिदेव ब्रह्मा:
{3} गांधाराधिदेवी सरस्वती:
{4} मध्यमस्वराधिदेव महादेव:
{5} पञ्चमाधिदेव विष्णु:
{6} धैवताधिदेव श्रीगणेश:
{7} निषाधिदेव भगवान सूर्य:
इन 7 तरह के साधकों के लिए सदैव स्वर्ग के द्वार खुल रहते हैं….
तपश्च दानं च शमो दमश्च ह्रींरार्जव सर्वभूतानुकम्पा। स्वर्गस्य…पुंसांम्।
अर्थात—तप, दान, शांति, दम (इन्द्रीयदमन), ह्रीं यानी लज्जा, आर्जव (सरलता) तथा गुरुकृपा के पात्र ये स्वर्ग के द्वार हैं।
शिव-सप्तगण…
♀- कीर्तिमुख
♀- श्रृंगी
♀- भृंगी
♀- रिटि
♀- बाण
♀- चन्डिश
♀- वीरभद्र
ये सभी ७ गण महाकाल के सानिध्य में रहते हैं।
विवाह के बाद ही इन 7 का उपयोग हो पाता है-
जैसे- हस्त हाथ उदर पृष्ठ पाद यानी पैर लिंग नाभि इन्हें शरीरस्थ निम्न लोक भी कहतें हैं।
सात शुद्ध धातुओं सोना चांदी की जरूरत शादी के बाद ही पड़ती है।
सात वायु वैवाहिक जीवन को चलाने वाली और साधूयों को केवल 5 वायु की जरूरत रहती है।
पुरुष को पूर्ण पुरुषत्व जगाना जरूरी है।
विवाह…. पुरुषार्थ प्राप्ती की प्रक्रिया है।
अपने पितृगणों के ऋणों से मुक्त होने के
लिए संस्कारी संतान को जन्म देने की
यह प्राचीन परम्परा है। सनातन धर्म में ग्रहस्थ आश्रम प्रवेश 16 संस्कारों में एक है।
शादी का उल्टा दिशा होता है, जो इंसान की दिशा-दशा तय करता है। विवाह केवल तन से तन मिलन नहीं है। मन भी मिलना महत्वपूर्ण है।
मन 40 किलो का भी होता है। दो मन मिलने से विवाह निभता है। अस्सी किलो न हो जाये इसका ध्यान अवश्य रखें। समय के साथ-साथ आजकल सब कुछ बदल गया है-
क्या-क्या है सात, जाने अमृतम के साथ…
सात अज्ञात गति….
नाग मूर्ख सिंह श्वान (कुत्ता)
राजा मधुमक्खी शिशु इनकी गति या मूड-दिमाग का भरोसा कभी न करें
सात अप्सरा…
उर्वशी, मेनका, रम्भा, सुकेशी,
तिलोत्तमा, मंजुघोषा, घृताची
अकालमृत्यु के सात कारण…
*अग्नि *जल *वृक्ष *दंश *विष *वज्र और *आपात।
सात नदियों का आव्हान रोज करने से
समृद्धि बढ़ती है-
० गंगा ० यमुना ० गोदावरी ० सरस्वती ० नर्मदा ० सिंधु तथा ० कावेरी।
(नारदीय पुराण २७,३३) में श्लोक वर्णन है
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति।
नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।
आयुर्वेद में 7 उपविष बताए हैं…
अर्क दुग्ध (सफेद अकौआ का दूध)
थूहर दूध, कलिहारी, कनेर,
धतूरा, कुचला एवं वत्सनाभ
(अमृतसागर श्रीसवाई प्रतापसिंघजी महाराज)
ऊर्ध्व लोक सात हैं….
■ब्रह्मलोक ■वैकुण्ठलोक ■शिवलोक ■सूर्यलोक ■सुरलोक ■पितृलोक ■सिद्धलोक।
पाताल सात हैं…
अतलं वितलं चैव सुतलं च तलातलम्।
महातलं च पातालं रसातलमधस्तत:।।
(व्रह्मवैवर्तपुरण पुराण, ब्रह्मखण्ड
अध्याय-७,पद-१३ से उद्गृत)
योग भी 7 प्रकार के होते हैं…
π – हठयोग π- लययोग π – राजयोग
π – ज्ञानयोग π – कर्मयोग π – मनोयोग
π – भक्तियोग।
श्री प्रौढ़देवराज महाराज ने अपने ग्रन्थ
रतिरत्नप्रदीपिका अध्याय-२, पड़-३९ – ४१ में
नारी की सात अवस्था का उल्लेख किया है….
श्लथादीनां वयोभेदादवस्थासप्तकं विंदु:
अष्टवर्षा भवेत्कन्या नववर्षा तु रोहिणी।
दशवर्षा भवेद् गौरी बालाsतष्षोडशावधि:।
आत्रिंशत्त्तरुणि प्रोक्ता प्रौढा पचंदशाब्दत:।
अत ऊर्ध्वं भवेद्वृद्धा सप्तावस्था वय: कृता।
वशिकृति प्रकारश्च यथोक्तानां निगद्यते।
अर्थात ये उम्र अनुसार नारी की अवस्था है-
♂ कन्या ♂ रोहिणी ♂ गौरी ♂ बाला ♂तरुणी
♂ प्रौढा ♂ वृद्धावस्था।
सात वार उसके स्वामी! भ्रम मिटायें…
【१】रविवार के अधिपति शिव
【२】सोमवार की दुर्गा
【३】मंगलवार: कार्तिकेय मोरगन स्वामी
【४】बुधवार के विष्णु श्रीहरि
【५】गुरुवार के महादेव
【६】शुक्रवार के गणेशजी
【७】शनिवार के महाकाल
भ्रम मिटाकर परम्परा में परिवर्तन करें…
ज्योतिष ग्रन्थ कालमहुर्त के मुुताबिक “रविवार” के स्वामी महादेव हैं। सोमवार के नहीं। सोमवार देवी दुर्गा का दिन है। सन्डे(इतवार) वाले दिन दुपहर 11.40 से 12.55 के बीच अभिजीत महूर्त होता है। दिन के 3 बजे से 4.30 के मध्य राहुकाल होने से यह दिन पूजा-साधना के लिए विशेष फलदायक बताया है। इस रहस्य को अगले ब्लॉग में पढ़िए!
श्री गणपति की पूजा शुक्रवार को करें..
ज्योतिष रत्नाकर, कालीतन्त्रम् रहस्य तथा
रावण रचित शास्त्र-मन्त्रमहोदधि
औरों में भी इसका वर्णन है-यथा
अदित्यशिव…..शिवो दुर्गा…गजाननम्शुक्र कालसँज्ञक:!
श्रीगणेशजी परम् गुरु भक्त थे। दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने गणपति को
!!ह्रीं ॐ नमः शिवाय ह्रीं!!
गुरुमन्त्र से दीक्षित किया था।
एक बात विशेष ध्यान देवें….
बहुत पुरानी कहावत है
बिना विचारें, जो करे-वह पीछे पछताय…
गुगल या मीडिया पर दी गई बहुत सी जानकारी में सन्दर्भ या पुस्तक, ग्रन्थ का नाम न हो उस बात पर बिल्कुल भी भरोसा न करें। गूगल पर बहुत सारा ज्ञान मनगढ़त पड़ा हुआ है।
सावधान रहें – जरा भी गलत, झूठी, भ्रमित जानकारी बिना सन्दर्भ के विश्वसनीय नहीं होती। इससे भारी नुकसान हो सकता है।
अमृतम पत्रिका के सभी लेखों में ग्रन्थ, पुराण, पुस्तक, उपनिषद आदि का सन्दर्भ अवश्य दिया जाता है। अमृतम द्वारा लिखे गए लेख ज्ञान-विज्ञान की कसौटी पर खरे होते हैं। जैसा वेद, ग्रँथन ने बताया, हम सरल भाषा और वैज्ञानिक तरीके से उसे प्रकाशित कर देते हैं।
क्योरा पर अमॄतम पत्रिका से साभार अनेक रहस्यमयी लेख तथा बहुत सी दुर्लभ जानकारी पा सकते हैं!
व्यूहांग क्या होता है…. इसकी जानकारी लोगों को बहुत ही कम है-
लज्जार्थस्य लज्जन्तेपि हि ता:’।
इसका अर्थ है कि लज्जा से अभिभूत होने से औरत का एक पर्याय स्त्री है।
मनुस्मृति अध्याय ३, श्लोक ५६, नारी कामसूत्र, विषकन्या नामक पुस्तक और श्रीप्रौढ़ देवराज द्वारा लिखित रतिरत्नप्रदीपिका में लिखा है कि-
स्त्री शरीर में सात व्यूहांग होते है। ये अंग ही व्यक्ति को कामातुर बनाकर चक्रव्यूह में फसा देते हैं। इन व्यूहांगो के नाम इस प्रकार हैं-
@ उर यानि स्त्री के उरोज या वक्ष:स्थल, छाती
कवि गिरीश ने अपने काव्य में लिखा है..
“उर-उर से आसक्ति अतोल”
व्यक्ति किसी स्त्री के सुंदर सुडौल बक्ष या छाती देखकर प्रेमी हो जाता है। अतः इस अमूल्य धन को छुपाकर रखना चाहिए।
@ कक्ष (योनि) पक्ष (पीठ)
@ मध्य (नाभि) पृष्ठ (बाहरी अंग) कोटि यानी कमर का अग्रभाग।
@ प्रतिग्रह का अर्थ है…
आलंघन करना, चूमना, kiss करना, स्त्री के शरीर पर हाथ फेरना, स्त्री को गर्मकरना, स्त्री को सेक्स के लिए प्रेरित करना आदि शब्दकोश के अनुसार प्रतिग्रह के अर्थ हैं।
महिलाओं के मन को महसूस करने के लिए क्या करें, यह ज्ञान आगे कभी पढ़े।
कामिनी की ये सप्त त्वचा रिझा लेती हैं..
आयुर्वेद में इन सात त्वचाओं के नाम हैं
१: अवमासिनी २: रक्त ३: श्वेत
५: छेदनी ६: रोहिणी ७: स्थूल! म
निम्नलिखित सात वायु हैं….
■ अनुवह ■ दिवह ■ संवह ■ आवाह
■ प्रवाह ■ परावह ■ परिवाह
बादल, आकाश, सूर्य, चन्द्र, ग्रह-नक्षत्र आदि को चलायमान रखती हैं। यानि घुमाती हैं ताकि सृष्टि का संचालन होता रहे। इसलिए स्कन्ध पुराण में उल्लेख है कि – इस ब्रह्माण्ड में स्थिर कुछ भी नहीं है। कुल वायु 49 जो मरुतगण कहलाती हैं। यह सब 49 वायु मरुदगणों के अधिपति हनुमान जी हैं।
शरीर स्थित सात साकार लोक…
【1】ब्रह्म+अनु=ब्रह्माणु
【2】नेत्र या आंखे
【3】कान या कर्ण
【4】मुख
【5】कण्ठ
【6】ह्रदय (हार्ट)
【7】नाक या नासिका
शुक्रनीति : महर्षि शुक्राचार्य-७,५६ के अनुसार— शरीर के इन अंगों पर ध्यान लगाकर सप्तलोकों का दर्शन किया जा सकता है।
सन्सार में सबका साथ बना रहे, तो सात बहुत सी चीजें हैं। जाने क्या-क्या है साथ अगले ब्लॉग में बताएंगे….
// विवाह कर्तव्य सात
// सप्तघृतमात्रका भी स्त्री हैं-
// सप्तमातृका 7 तरह मिट्टी
// सात नारी अवस्था
// सात पुरुष अवस्था
// मन्वंतर अन्तर्गत सप्तर्षि
// सप्तकुल पर्वत
// कौंचद्वीप सप्तपर्वत
// सप्तक्षेत्र वैदिक पुण्य तीर्थ
// सात वैदिक छंद प्रकार
// सात शब्दगुण भेद
// सात शुध्हा धातु
// सूर्य के 7 गुणधर्म
// सात सुर रश्मियां
// सात सैन्य कर्म
// सात लौकिक अप्सरा
//सात तरह के युद्ध
// योग के 7 प्रकार
// सात तरह के मणि दोष (कौटिल्य)
// सात प्रज्ञावस्था (पातंजल दर्शन)
// सात माताएं
// सात वन्यपशु
// राज्य के सात अंग
// सात योगनियाँ
// सप्तक्षेत्र
// सप्तगंगा
// सप्तगोत्र
// सप्त चिरंजीवी हनुमान आदि
// सप्तजिव्हा अग्नि
// सप्तज्ञान भूमिका
// सप्तजिव्ह-दिशाएं
// अघोरियों का सप्त ज्ञान
// सप्तज्वाल अग्नि की 7 ज्वालायें
// सप्ततन्तु
// सप्तनाड़ी चक्र
// सप्तपदी मन्त्र
// सप्तपाक यज्ञ (भविष्यपुराण)
// सप्त पदार्थ (जैन धर्म)
// सप्तभूषण
// अघोरियों के मांस-मंदिर आदि सप्तमकार
// सप्तमख -भोजन, पान, परिधान आदि
// ४९ मरुतों में से 7 मुख्य मरुत (ये सब पवनपुत्र के अधीन हैं, इनके नाम अगले लेखों में बताए जाएंगे।)
// पूजा में 7 तरह की मिट्टी सप्त मृतिका
// मणिभद्र, मणितेजा आदि सप्त यक्ष
// सप्त योनि नर, पशु-पक्षी आदि
// सप्तरक्त (करतल, पादतल, तालु, जिव्हा अधर (ओंठ), नख (नाखून) , नेत्र कोण आदि 7 स्थानों में रक्त का प्रवाह ज्यादा होता है।)
// भूर्लोक, भुवर्लोक आदि सात लोक।
// शप्तशती 700 श्लोकों वाली
// सप्तशिरा वाला पान पूज्यनीय क्यों
// सप्ताश्वा 7 घोड़ो वाला सूर्य का रहस्य।
// सप्त सरोवर
// मणिसर, पम्पासर आदि सप्तसर
// सप्तसरस्वती गया हरिद्वार आदि
// सप्तसोम
// सप्तसोमयज्ञ
// उदात्त, अनुदात्त आदि सप्त स्वर
// नाक, आंख, कान सप्तइन्द्रीय
// सप्तचक्र परिवार यह अति
महत्वपूर्ण है। ध्यान-साधना, कुण्डलिनी जागरण में इन चक्रों का खास रहस्य छुपा है। शरीर में सर्वाधिक शक्ति नाड़ी सुषुम्ना है।
सुषुम्ना के भीतर वज्रनाड़ी है।
वज्रनाड़ी कि अंदर चित्रिणी और इसके अन्दर ब्रह्मनाड़ी है। ये सभी नाड़ियाँ मकड़ी के जाल की तरह सूक्ष्मातिसूक्ष्म हैं। इन नाड़ियों का ज्ञान केवल योगियो को ही होता है।
ये नाड़ियाँ स्त्वप्रधान, प्रकाशमय तथा अदभुत शक्तिसम्पन्न हैं। यहीं सुक्षम शरीर और सूक्ष्म प्राण का स्थान एवं अधिवास हर। यहां अनेक सूक्ष्म शक्तियों का केंद्र है।
यही कुण्डलिनी की शक्ति है। इसे जन्म-जन्मान्तरों का संग्रहालय भी कहतें हैं।
पूर्व जन्म की सभी यादें, स्मृतियां इसी में समाहित हैं। जैसे-जैसे कुण्डलिनी जागरण होता जाता है, वैसे-वैसे हम अपने पूर्व जन्म के कर्मों, जन्मों का अनुभव करने लगते हैं। अपने ध्यान योग से पिछले पापों का प्रायश्चित कर उन्हें दूर कर सकते हैं। यह कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया समृद्धि ओर सिद्धि में भी सहायक है।
त्रिकालद्रष्टा महर्षि इसी योग से भूत-भविष्य-वर्तमान को जान लेते हैं।
कुण्डलिनी शक्ति केंद्रों में सात प्रस्थान स्थल हैं, जिन्हें पदम्, कमल, चक्र आदि कहा गया है। अवधोतों की हठयोग साधना में इसका बहुत प्रयोग है।
कुण्डलिनी के सात चक्र इस प्रकार हैं-
1- मूलाधार चक्र, इसका बीज मंत्र !!लं!! तथा श्रीगणेश देवता हैं।
2- स्वाधिष्ठान चक्र। बीजमन्त्र -!!बं!!- है।
3- मणिपुर चक्र इस चक्र का बीजमन्त्र !!रं!! है।
इसी बीजमन्त्र को गलती से !!रं!! से राम बनाकर सारी ऊर्जा, शक्ति का नाश कर दिया। बीजमंत्रों को कभी बोला नहीं जाता। बोलने से यह अपना उल्टा असर दिखाते हैं। भ्रम मिटाने के लिए पढ़ें-
कुण्डलिनी की शक्तियां एवं हिमालय के महायोगी आदि नामक पुस्तकें।
4- अनाहत चक्र- भगवान ईशान रूद्र इस चक्र के अधिपति हैं। और बीजमन्त्र है- !!यं!!
5- विशुद्ध चक्र- (कण्ठशुद्धि चक्र) पंचमुखी शिव इस चक्र के अधिपति देवता हैं। बीजमन्त्र है-
।।हं।। इस चक्र को जाग्रत करने के लिए आपको
हं- मंत्र का जाप करते हुए ध्यान लगाना होता है।
6- आज्ञाचक्र- !!ॐ!!
बीजमन्त्र का ध्यान लगाकर आज्ञाचक्र जागृत किया जा सकता है। चतुभुर्ज षडानना हाकिनी शक्ति अर्थात छह: मुख वाली माँ कामाख्या या महाकाली इस चक्र की मालकिन है।
ॐ के रहस्य को जानने हेतु अमृतमपत्रिका देखें।
7- सातवां है-सहस्रार चक्र- पाारब्रह्म शिव इस चक्र के है। अधिदेवता महाशक्ति है। अतिसूक्ष्म बिंदु इस चक्र का बीजमन्त्र है। यहां तक पहुंचने का मतलब है-मुक्ति/मोक्ष।
परापरिमलोल्लास: नामक शास्त्र में बताया है-सदाशिव सम्पूर्ण कुण्डलिनी चक्र के स्वामी अधपति हैं। इस चक्र के समीप ही मनश्कचक्र अष्टदल रूप में स्थित है। यही भक्तिभाव का उदगम स्थल है। यहां स्थित ओंकारमय शब्दब्रह्म सदशिवत्व के सम्बन्ध में लिखा है कि-
शब्दं ब्रह्मेति तं….सदाशिव:, परीकीर्त्यते।
लेख अभी अधूरा है। वेद के बहुत से रहस्य समझने के लिए कृपया साथ जुड़े रहें।
अमॄतम-
हर पल आपके साथ हैं हम।
जीवन को पुष्प की भांति हल्का बनाये रखने के लिए बस इतना याद रखो
भोग लगे या रूखे-सूखे,
शिव,तो हैं-श्रद्धा के भूखे!
जब अकेले में हों, तो भगवान से बातें करें और जब किसी के साथ हों, तब भगवान की बात करें… आत्मवि




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