गांधारी के किस शाप के कारण अफगानिस्तान में कभी शांति क्यों नहीं रहती…

ये सच है कि अफ़ग़ानिस्तान में कभी शांति नहीं रहती। कभी सोवियत संघ से युद्ध, कभी अमेरिका से युद्ध तो कभी गृह युद्ध। अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की प्रवृत्ति ऐसी है कि वो हमेशा लड़ते रहेंगे।
अफ़्गान शब्द संस्कृत के  अवगान अव अर्थात धरती से स्वतः ही गान, गीत की धुन निकलती है। अवगान को बदलकर अफ़ग़ान कर दिया।
स्मरण रहे कि- “अफ़्ग़ान” शब्द में ग़ की ध्वनि है और “ग” की नहीं।
शास्त्रों में गंधार का एक नाम कन्दहार, कंधार भी मिलता है। यह कन्द, मेवा देने वाली भूमि है। चिलगोजा, ख़ुरबानी, बादाम, काजू, हींग की यहां अत्याधिक उपज होती है।
दुनिया के सभी धर्मों में मान्यता है कि कभी कोई भी बददुआ या शाप खाली नहीं जाता। धार्मिक ग्रन्थों में ऐसे असँख्य उदाहरण भरे पड़े हैं। श्रवण कुमार के माता-पिता ने राजा दशरथ को शापित किया, उसके दुष्परिणाम आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
कहते हैं कि इंसान के मरने के बाद भी शाप कभी मरता नहीं। ऐसा ही कुछ परम् शिव भक्त गांधारी के साथ हुआ, जो कि शकुनी की बहिन थी। आज भी गांधारी के नाम पर अफगानिस्तान के एक प्रान्त का नाम गंधार है।
 शिवभक्तनी गांधारी एक तेजस्वी और पतिव्रता नारी थी।
गंधार देश की राजकुमारी गांधारी के पिता का नाम-सुबाला, और माँ सुधर्मा थीं।
भ्राता-शकुनि, पति-धृतराष्ट्र, पुत्र दुर्योधन, दुःशासन, विकर्ण सहित 97 पुत्र तथा दुशाला नाम की एक पुत्री थी।
एक गुमनाम किस्सा...
 
धृतराष्ट्र गांधारी के दूसरे पति थे…
एक कथा के अनुसार गांधारी घोर मांगलिक थी, इसलिए मंगलदोष की शांति हेतु उनका विवाह पहले एक बकरे से कराकर उसकी हत्या कर दी थी। विवाह से पूर्व धृतराष्ट्र को इस बात का पता नहीं था कि गांधारी की कुंडली में कोई दोष होने की वजह से उसका विवाह पहले एक बकरे से कराया गया था और बाद में उस बकरे की हत्या कर दी थी।
कहते हैं जब धृतराष्ट्र को इस बारे में पता चला तो वह बहुत क्रोधित हुआ। 
धृतराष्ट्र ने राजा सुबाला और उसके सभी सौ पुत्रों को बंदी बनाकर गंधार यानि आज का अफगानिस्तान देश पर कब्जा कर लिया था और गन्धार नरेश सुबाला को कारागार में डाल कर अनेक कष्टदायी यातनाएं दीं। 
धृतराष्ट्र उन्हें खाने को  केवल एक मुठ्ठी चावल देता था। अतः भूख से तड़प कर सुवाला के एक एक कर सभी पुत्रों की मृत्यु हो गयी। 
परन्तु उसका सबसे छोटा पुत्र शकुनि अभी जीवित था। ऐसा इसलिए क्योंकि धृतराष्ट्र द्वारा दिया हुआ वह एक मुठ्ठी चावल सुबाला अपने पुत्र शकुनि को खिला देता ताकि वह ज़िंदा रह सके और इस कष्ट का बदला ले सके।
राजा सुबाला ने मरते वक्त अपने पुत्र शकुनि को कहा कि वह मेरी रीढ़ की हड्डी के पासे बनवाकर अपने पास रखें। अपनी अंतिम इच्छा के रूप में सुबाला ने धृतराष्ट्र से शकुनि की सजामुक्ति मांगी, तो धृतराष्ट्र ने मामा शकुनि को रिहा कर दिया था।
 
बाद में शकुनि ने धीरे धीरे कौरवों और पांडवों के बीच दरार पैदा की और जब उनके बीच पाशे खेलने की लत लगा दी थी। इस जुए के खेल में सुबाला की रीढ़ की हड्डी का बना पासा ही इस्तेमाल हुआ था।
श्रीमद्भागवत में अफगानिस्तान के नाम गंधार देश के नाम से उल्लेखित है। यह पूरा क्षेत्र जम्मुद्विप के अंतर्गत भारत का ही भाग था।
गांधारी इससे बहुत दुःखी हुई और उन्होंने इस भूमि को शाप दिया कि यहां रहने वाला कोई भी प्राणी सुख-शांति से नहीं रह सकेगा। गन्धार में हमेशा युद्ध, क्लेश बने ही रहेंगे। इसी शाप की वजह से अफगानिस्तान जैसी स्वर्ग धरती पर पिछले 5400 वर्षों से अशांति बनी हुई है। आज तक यहां पर 318 आक्रमण हो चुके हैं। कभी महाराजा रणजीत सिंह यहां के अधिपति थे।
सिकन्दर का किस्सा…

३२८ ईसापूर्व में सिकन्दर का आक्रमण

उस समय हुआ जब यहाँ प्रायः फ़ारस के हखामनी शाहों का शासन था।

कहा जाता है कि सिकंदर अफ़ग़ानिस्तान को जीतने के लिए संघर्ष कर रहा था तो उसकी माँ ने एक चिट्ठी भेजी जिसमें लिखा कि तुम दुनिया को जीतने वाले सिकंदर इस छोटे से अफ़ग़ानिस्तान को क्यों नहीं जीत पा रहे।

सिकंदर ने चिट्ठी का जवाब देते समय उसके साथ अफ़ग़ानिस्तान की मिट्टी भी भेज दी।

मिश्र से 200 किलोमीटर दूर सिकन्दर की जन्मभूमि एलेक्जेंडिया शहर में जसए ही पत्र के साथ मिट्टी पहुँची, वहाँ पर झगड़े शुरू हो गये।

अफगानिस्तान के लोग हमेशा लड़ते रहेंगे, पहले विदेशियों से और जब वो नहीं मिलेंगे तो आपस में ही भिड़ जायेंगे।

अफगानिस्तान पर सिख साम्राज्य के प्रतापी राजा दिलीप सिंह का कई वर्षों तक अधिकार रहा।

अभी बहुत सी कथा शेष है। भारतीय पुराणों में इनका विस्तार से वर्णन है

अफगानिस्तान की पर्वत मालाएं आज भी हिंदुकुश पर्वत कहे जाते हैं। यह क्षेत्र जम्मुद्विप के अंतर्गत आता है।

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