माथे पर भस्म लगाने से तन, मन, अंतर्मन के विकार भस्म हो जाते हैं !!

शिवरात्रि पर भस्म जरूर लगाएं। जाने भस्म का महत्व

  • आयुर्वेद और आध्यात्मिक दोनो जगह भस्म का बहुत उपयोग है। स्वर्ण भस्म, हीरा भस्म, स्वर्ण माक्षिक भस्म, बंग भस्म आदि 108 की भस्मों का निर्माण होता है, जो शरीर के विभिन्न रोगों को जड़ से मिटा देती हैं।
  • अध्यात्म शास्त्रों में भस्म का चमत्कार ये है कि अंतर्मन, आत्मा और मन की शुद्धि करती है। भस्म का केवल त्रिपुंड भगवान शिव को विशेष पसंद है।
  • माथे पर त्रिपुंड लगाने से त्रिविध ताप, तीन तरह के पाप और वात, पित्त, कफ संतुलित और शांत हो जाते हैं।

किस राशि वालों को लाभकारी है – भस्म :

  • वृषभ, कन्या, मकर लग्न और राशिवालों के लिए इस भस्म को त्रिपुंड के रूप में मस्तिष्क पर धारण करें, तो अत्यन्त फलदायक रहता है।
  • ये प्रथ्वी तत्व है। यदि वह किसी विशिष्ट कार्य के लिए किया जाएगा तो उससे उनके कार्यों के सफल होने की पूर्ण संभावना रहती है ।
  • भस्म का त्रिपुण्ड मस्तिष्क पर लगाने से तन-मन या अन्तर्मन का कोई भी योगिनी दोष, दुःख, संताप या प्रेत और कोई भी योग इत्यादि परेशान नहा करता। यह सब करने से व्यक्ति अवनति का सामना नहीं करना पड़ता।
  • माथे पर भस्म का त्रिपुण्ड विभिन्न रोगों को दूर करने की क्षमता रखता है। क्योंकि यह जड़ियों, कई प्रकार के तत्त्व, रस और पदार्थ के मिश्रण से बनती है।
  • प्रत्येक जड़ी में ताकत भी भिन्न-भिन्न होती है विकार भी दूर करती है।
  • त्वचा रोग जैसे खारिश, त्वचा का सूखापन, मवाद एग्जीमा को भी साफ करती है।
  • गरम भस्म शरीर पर लगाई या मली जाए, तो हड्डियों का दर्द कम होता है। यदि मस्तिष्क पर लगायी जाए तो मस्तिष्क संतुलित होता है। यदि इसको पूर्ण शरीर पर लगाया जाए तो सारे अनिष्ट समाप्त होते हैं।

डिप्रेशन में होली की भस्म के फायदे

  • जो अनेक पाप करके भी भगवान शिव के नाम जप में लग गया है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। जैसे वन में दावानल से दग्ध हुए वृक्ष भस्म हो जाते हैं, उसी शिवनाम रूपी दावानल से दग्ध होकर उस समय तक के सारे पाप भस्म हो जाते हैं।
  • भगवान शिव के नाम का जप संसार सागर को पार करने के लिए सर्वोत्तम उपाय है। पूर्वकाल में महापापी राजा इन्द्रद्युम्न ने शिवनाम के प्रभाव से ही उत्तम सद्गति प्राप्त की थी। इसी तरह कोई ब्राह्मणी युवती भी जो बहुत पाप कर चुकी थी, शिवनाम के प्रभाव से ही उत्तम सद्गति प्राप्त की थी।

भस्म का महत्व

  • भस्म संपूर्ण मंगलों को देनेवाला है। भस्म के दो भेद बताये गये हैं- एक को महाभस्म और दूसरे को “स्वल्प भस्म।
  • महाभस्म के भी अनेक भेद हैं। वह तीन प्रकार का माना गया है- श्रौत, स्मार्त और लौकिक।
  • स्वल्प भम्म के भी बहुत से भेदों का वर्णन किया गया है। श्रीत और स्मार्त भस्म को केवल द्विजों के ही उपयोग में आने के योग्य कहा गया है।
  • तीसरा जो लौकिक भस्म है, वह अन्य सब लोगों के भी उपयोग में आ सकता है।
  • श्रेष्ठ महर्षियों ने यह बताया है कि द्विजों को वैदिक मंत्र के उच्चारण के साथ भस्म को धारण करना चाहिए। दूसरे लोगों के लिए बिना मंत्र के ही केवल धारण करने का
  • जले हुए गोबर से प्रकट होनेवाला भस्म आग्नेय कहलाता है। वह त्रिपुण्ड्र का द्रव्य है। अग्निहोत्र से उत्पन्न हुए भस्म का भी मनीषी पुरुषों को संग्रह करना चाहिए। अन्य यज्ञ से प्रकट हुआ भस्म भी त्रिपुण्ड्र धारण के काम में आ सकता है।
  • जाबालोपनिषद् में आये हुए अग्निः इत्यादि सात मन्त्रों द्वारा जल मिश्रित भस्म से धूलन करना चाहिए।
  • महर्षि जाबालि ने सभी वर्गों और आश्रमों के लिए मंत्र से या बिना मंत्र के भी आदरपूर्वक भस्म से त्रिपुण्ड्र लगाने की आवश्यकता बतायी है।
  • समस्त अंगों में तिरछा त्रिपुण्ड्र लगाना – इन कार्यों को मोक्षार्थी पुरुष प्रमाद से भी न छोड़े | ऐसा श्रुति का आदेश है।
  • भगवान शिव और विष्णु ने भी | तिर्यक त्रिपुण्ड्र धारण किया है। ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों वर्णसंकरों तथा जातिभ्रष्ट पुरुषों ने भी त्रिपुण्ड्र के रूप में भस्म धारण किया है।

त्रिपुण्ड्र की महिमा

  • ललाट आदि सभी निर्दिष्ट स्थानों में जो भस्म से | तीन तिरछी रेखाएँ बनायी जाती है, उन्हीं को विद्वानों ने | त्रिपुण्ड्र कहा है।
  • भौहों के मध्य भाग से लेकर जहाँ तक भौहों का अंत है, उतना बडा त्रिपुण्ड्र ललाट में धारण करना चाहिए।
  • मध्यमा और अनामिका अंगुली से दो रेखाएँ करके बीच में अंगुष्ठद्वारा प्रतिलोमभाव से की गयी रेखा त्रिपुण्ड्र कहलाती है।
  • बीच की तीन अंगुलियों से भस्म लेकर यत्नपूर्वक भक्तिभाव से ललाट में त्रिपुण्ड्र धारण करे।
  • त्रिपुण्ड्र अत्यंत उत्तम तथा भोग और मोक्ष को देनेवाला है। त्रिपुण्ड्र की तीनों रेखाओं में से प्रत्येक के नौ-नौ देवता हैं।
  • ॐ यानि प्रणव का प्रथम अक्षर अकार, गार्हपत्य अग्नि, पृथ्वी, धर्म, रजोगुण, ऋग्वेद, क्रियाशक्ति, प्रातःसवन तथा महादेव – ये त्रिपुण्ड्र की प्रथम रेखा के नौ देवता हैं।
  • ॐ प्रणव का दूसरा अक्षर उकार, दक्षिणाग्नि, आकाश, सत्वगुण, यजुर्वेद, मध्यंदिनसवन, इच्छाशक्ति, अंतरात्मा तथा महेश्वर- ये दूसरी रेखा के नौ देवता हैं।
  • ॐ प्रणव का तीसरा अक्षर मकार, आवाहनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, धुलोक, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तृतीय सवन तथा शिव ये तीसरी रेखा के नौ देवता हैं।
  • इस प्रकार देवताओं को उत्तम भक्तिभाव से नित्य नमस्कार करके स्नान आदि से शुद्ध हुआ पुरुष यदि त्रिपुण्ड्र धारण करे तो भोग और मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है।

शरीर के 32 एसथानों पर लगाते हैं भस्म

त्रिपुण्ड्र धारण करने का स्थान

  • इन्हें संपूर्ण अंगों में स्थान देवता कहा गया है। बत्तीस, सोलह, आठ अथवा पाँच स्थानों में त्रिपुण्ड न्यास करता है।
  • त्रिपुण्ड्र का बत्तीस स्थान इस प्रकार हैमस्तक, ललाट, दोनों कान, दोनों नेत्र, दोनों नासिका, मुख, कण्ठ, दोनों हाथों, दोनों कोहनी, दोनों कलाई, हृदय, दोनों पार्श्वभाग, नाभि, दोनों अण्डकोष, दोनों दोनों गुल्फ, दोनों घुटने, दोनों पिंडली और दोनों पैर- ये बत्तीस उत्तम स्थान हैं।
  • इनमें अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु दस दिक्प्रदेश, दस दिक्पाल तथा आठ वसुओं का निवास है। धर, ध्रुव, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास- ये आठ वसु कहे गये हैं।
  • इन सब का नाम त्रिपुण्ड्र का बत्तीस स्थान इस प्रकार है- मस्तक, ललाट, दोनों कान, दोनों नेत्र, दोनों नासिका, मुख, कण्ठ, दोनों हाथों, दोनों कोहनी, दोनों कलाई, हृदय, दोनों पार्श्वभाग, नाभि, दोनों अण्डकोष, दोनों ऊरु, दोनों गुल्फ, दोनों घुटने, दोनों पिंडली और दोनों पैरये बत्तीस उत्तम स्थान हैं, इनमें अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु दस दिक्प्रदेश, दस दिक्पाल तथा आठ वसुओं का निवास है।
  • मात्र लेकर इनके स्थानों में विद्वान पुरुष त्रिपुण्ड्र करे। इसके अलावा सोलह स्थानों में त्रिपुण्ड्र धारण करे। मस्तक, ललाट, कण्ठ, दोनों कंधों, दोनों भुजाओं, दोनों।
  • कोहनियों तथा दोनों कलाइयों में, हृदय में, नाभि में दोनों • पसलियों में तथा पृष्ठ भाग में त्रिपुण्ड्र लगाकर वहाँ दोनों अश्विनीकुमारों का शिव, शक्ति, रुद्र, ईश तथा नारद का और वामा आदि नौ शक्तियों का पूजन करे। ये सब मिलकर सोलह देवता हैं।
  • अश्विनी कुमार दो कहे गये हैं। नासत्य और दस्त्र अथवा मस्तक, केश दोनों कान, मुख, दोनों भुजा, हृदय, नाभि दोनों ऊरु, दोनों जानु, दोनों पैर और पृष्ठ भाग इन सोलह स्थानों में सोलह त्रिपुण्ड्र का निवास करता है।
  • मस्तक में शिव, केश में चन्द्रमा दोनों कानों में रुद्र और ब्रह्म मुख में विघ्नराज गणेश दोनों भुजाओं में विष्णु और लक्ष्मी हृदय में शम्भु नाभि में प्रजापति, दोनों ऊरूओं में नाग और नाग कन्याएँ दोनों घुटनों में ऋषिकन्याएँ, दोनों पैरों में समुद्र तथा विशाल पृष्ठ भाग में संपूर्ण तीर्थ देवता रूप से विराजमान सोलह स्थान हैं।
  • गुह्य स्थान, ललाट, परम उत्तम कर्णयुगल, दोनों कंधे, हृदय और नाभि- ये आठ स्थान है। भस्म के स्थान को जाननेवाले विद्वानों ने इस तरह आठ स्थानों का परिचय दिया है अथवा मस्तक दोनों, दोनों भुजाएँ हृदय और नाभि- इन पाँच स्थानों को भस्मवेत्ता पुरुषों ने भस्म धारण के योग्य बताया है। देश, काल आदि की अपेक्षा रखते हुए भस्म को अभिमंत्रित करना और जल में मिलाना आदि कार्य करना। यदि भस्म में भी असमर्थ हो तो त्रिपुण्ड्र आदि लगाये।
  • त्रिनेत्रधारी तीनों गुणों के आधार तथा तीनों देवताओं के जनक भगवान शिव का स्मरण करते हुए नमः शिवाय कहकर ललाट में त्रिपुण्ड्र लगाये। ईशाभ्यां नमः ऐसा कहकर दोनों पार्श्वभागों में त्रिपुण्ड्र धारण करे। “वीजाभ्यां नमः” यह बोलकर दोनों कलाइयों में भस्म लगाव “पितृय नमः” कहकर नीचे के अंग में उमेशाभ्यां नमः कहकर ऊपर के अंग में तथा भीमाय नमः कहकर पीट में और सिर के पिछले भाग में त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिए।

शिवरात्रि व्रतं नाम, सर्वपाप प्रणाशनम्

आचाण्डाल मनुष्याणां, भुक्ति मुक्ति प्रदायकम्।

  • जनता अपने अपने रुचि के अनुरूप कुछ लोग शिवरात्रि के दिन शिवनाम का स्मरण करते हैं तो, कुछ लोग भस्मधारण करके शिव की पूजा करते हैं।
  • महाशिवरात्रि का व्रत सब पापों का शमन करनेवाला होता है। यह मनुष्यों को भक्ति मुक्ति देनेवाला है। जो मनुष्य शिवरात्री पर अखंडित व्रत करता है, उसकी सारी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
  • रात्रि के चारों प्रहर में भगवान शिव की पूजा अर्चना करने से जागरण, पूजा और उपवास तीनों पुण्य कर्मों का एक साथ पालन हो जाता है। जिससे भगवान शिव की कृपा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

बभस्ति इति भस्म। भस् (भर्त्सनदीप्तयोः)+सर्वधातुभ्यो मनिन् इति मनिन्। दग्धकाष्ठादिविकारः।

शिवाङ्गभूषणम्।यथा- अस्याङ्गभूषणं भस्म विभूतिर्भूतिरस्य तु। इति शब्दरत्नावली। तद्भस्मकामदेवशरीरजम्।

  • अर्थात् नष्ट होता है, प्रदीप्त होता है उसका अवशिष्ट अंश भस्म है। भस्म भूतभावन परमपावन देवाधिदेव महादेव के अंग का भूषण,आभूषण है।
  • शब्दरत्नावली के अनुसार, यह इनके अंग का आभूषण ही भूति या विभूति है,ऐश्वर्य है।अंग भस्म,शिर गंग विराजत।
  • आदिशंकर ने कहा- भस्मांगरागाय महेश्वराय। भगवान् भोलेनाथ ने भस्म को अंगराग बना लिया इसीलिए वे ईश्वर हैं।
  • जिस काम के वशीभूत सृष्टि है,जिसे महादेव के ध्यान-भंग करने के लिए,देवों द्वारा भेजा गया था,उसे महादेव ने त्रिनेत्र खोलकर भस्म कर दिया और उसके भस्म को अपने दिव्य देह पर लगा लिया।
  • यह हिन्दी में राख है,छाइ है तो मैथिली में छाउर है।मैथिली का छाउर शब्द एवं हिन्दी का छाइ शब्द दोनों क्षार शब्द से बने हैं।
  • संस्कृत शब्द क्षार का संस्कृत में एक अर्थ भभूत या विभूति भी होता है।
  • अंग्रेजी में यह शब्द devour अंग्रेजी के नियमानुसार ‘डिवा’ उच्चरित होता है। यह डिवा या दिवा ही देव हैं जो प्रज्वलित हैं, अग्निमुखो वै देवाः।
  • अग्नि इन्हें हवि प्रदान करते हैं। दिव् द्युतौ इस धातु से देवता का स्वरूप तेजोमय है, प्रकाशित है। इसी प्रकाश के कारण दिन,अंग्रेजी में डे है।
  • अंग्रेजी के इस दिवा(devour)शब्द में संस्कृत के भस्म शब्द की पूरी कथा-वार्ता समाहित है।
  • भूतभावन परमपावन देवाधिदेव महादेव ने त्रिनेत्र खोलकर कामदेव को भस्म किया इसमें,भर्त्सन =भर्त्सना और दीप्ति= प्रज्वलन, दोनों है।
  • इस काम- दहन प्रसंग का रामचरितमानस, बालकाण्ड में इस तरह वर्णन है-

सौरभ पल्लव मदनु बिलोका।भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका।।

तव सिवँ तीसर नयन उघारा।चितवतु कामु भयउ जरि छारा।।

  • अर्थ- जब आम के पत्तों में छिपे हुए कामदेव को देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ, जिससे तीनों लोक काँप उठे। तब भगवान् शिव ने तीसरा नेत्र खोला,उनके देखते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया।
  • भस्म के विषय में आह्निकतत्तत्व में कहा गया है-

विना भस्मत्रिपुण्ड्रेण विना रुद्राक्षमालया।

पूजितोऽपि महादेवो न स्यात्तस्य फलप्रदः।।

  • अर्थात् बिना भस्म से त्रिपुण्ड्र किये एवं बिना रुद्राक्ष की माला धारण किये, महादेव भगवान् शंकर की पूजा फलदायी नहीं होती।इससे भस्म की महत्ता का ज्ञान होता है।
  • साधु- संत अपने पूरे शरीर पर भस्म रमाए(लगाए) रहते हैं।
  • महाशैव औघड़ अपनी देह पर श्मसान भूमि का भस्म रमाते हैं। भूतभावन परमपावन देवाधिदेव महादेव भी चिताभस्म लगाते हैं।
  • शिवमहिम्न स्तोत्र में परम शैव गंधर्वराज पुष्पदन्ताचार्य कहते हैं-

महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः।

कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्।।

सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहिताम्।

न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति।।८।।

  • अर्थ- आपके भृकुटि के इशारे मात्र से सभी देवगण ऐश्वर्य एवं सम्पदाओं का भोग करते हैं। पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ परशु(फरसा), बैल,व्याघ्रचर्म, नागमाला,शरीर पर भस्म तथा हाथ में खप्पर(खोपड़ी)! इससे ये फलित होता है कि जो आत्मानन्द में लीन रहते हैं वह संसार के भोगपदार्थों में नहीं फंसते।
  • भगवान् आदि शंकराचार्य भी कहते हैं-

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो,

जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:।

चिताभस्म रमाए किए विषपान।

दिगम्बर जटाजूटधारी को जाने जहान।।

  • कण्ठ लिपटाए नागपशुओं के स्वामी हैं, भजे इन्हें वही जो मुक्ति के कामी हैं!
  • शरीर पर भस्म लगाने से वातावरण के दुष्प्रभाव से रक्षा होती है। भस्म, विभूति या भभूत को प्रसाद के रूप में धारण किया जाता है एवं दुःखों से त्राण तथा सुख की प्राप्ति होती है।
  • आयुर्वेद में निस्तापन (कैल्सिनेशन) से भस्म बनता है जिसका आयुर्वेदिक चिकित्सा में प्रयोग होता है। आयुर्वेद में स्वर्ण भस्म, मण्डूर भस्म,मुक्ता भस्म आदि प्रसिद्ध हैं।
  • उज्जैन में भगवान् महाकालेश्वर का भस्म से भी श्रृङ्गार किया जाता है एवं अन्य ज्योतिर्लिंगों पर भी भस्म अर्पित किया जाता है।
  • स्कंध पुराण में भस्म और चंदन दोनों का महत्व एक जैसा ही बताया है। अगर आप माथे पर भस्म का त्रिपुंड न लगा पाएं, तो चंदन का ही त्रिपुंड लगा सकते हैं।

चंदन में मिले द्रव्य घटक Product Details Material

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