अघोरियों के रहस्य, साधना और सिद्धि क्या है।

  • सच्चा अघोरी कतार गुरु भक्त होता है। जिन्होंने भी मानव शरीर लेकर इस भौतिक संसार में गुरु को सर्वोच्च माना वे सब अघोरी, अवधूत कहलाए। इसमें राजा भृतहरी, गुरु गोरखनाथ, तेलांग स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, गुरुनानक देव और दतिया पीतांबरा पीठ के अधिपति स्वामी जी आदि।
  • तीसरा खंड या भाग अभी देना शेष है।

नीचे का लेख भाग दो है

  • गुरुभक्ति’ के लिये प्रसिद्ध 10वीं शताब्दी में जन्मे ‘गोरखनाथ’ का नाम और यश सर्वाधिक प्रचारित हुआ। वे मत्स्येन्द्र नाथ के प्रिय शिष्य थे |
  • एक बार जब गुरु और शिष्य दोनों ही तीर्थयात्रा पर निकले, तो कनकगिरि ग्राम में रुकना पड़ा। मत्स्येन्द्र नाथ को अपने शिष्य गोरखनाथ की ‘श्रद्धा’ और भक्ति की परीक्षा की सूझी। उन्होंने गोरखनाथ को आदेश दिया कि क्षुधा शान्ति के लिये गाँव जाकर भिक्षा ले आयें।
  • गोरखनाथ गुरुआज्ञा पाकर सहर्ष चल दिये। वे गाँव के एक ऐसे घर पहुँचे जहाँ श्राद्बोप्लक्ष में ब्रह्मभोज किया जा रहा था। द्वार पर पहुँचे याचक योगी के अलख जगाने पर बड़ी ही प्रसन्नता पूर्वक एक गृहिणी ने श्रद्धापूर्वक अनेक व्यंजन प्रदान किए।
  • गुरु मत्स्येंद्रनाथ बड़ी प्रशंसा करते हुए गोरखनाथ द्वारा लाई भिक्षा के व्यंजनों का रसस्वादन किया और पुन: गोरखनाथ को भिक्षा लाने हेतु आदेशित किया यह कहते हुये “मुझे इन व्यंजनों में बड़े बहुत प्रिय लगे हैं यदि एक और लेकर आओ तो इच्छापूर्ति हो सकेगी।
  • गोरखनाथ पुनः गये। अलख जगाई और गृहणी माता से एक बड़ा भिक्षारूप में प्रदान किये जाने का विनम्र निवेदन किया। परंतु उन्हें प्रतिक्रिया ।स्वरूप जो शब्द सुनने को मिले, वह उनकी सहनशीलता और विनम्रता में समाहित हो गये।
  • गृहणी माँ ने कहा “अभी कुछ देर पूर्व ही तुम यहाँ से भिक्षा लेकर गये थे जो पर्याप्त सामग्री थी। तुम फिर भिक्षा माँगने आये हो, ऐसा लगता है तुम सच्चे जोगी नहीं लोभी पुरुष हो जो योगी का भेष धारण किये त्हो । मुफ्त का माँगकर और खाकर तुम्हें लज्जा नहीं आती।
  • गोरखनाथ ने अत्यंत विनम्रता से कहा- माई। मैं अपने लिये नहीं अपने गुरु के लिये ही यहाँ पुनः भिक्षा लेने आया हूँ। कृपा कर एक गुलाबजामुन और बड़ा दे दो। गुरुजी को वह बहुत पसंद आया है और उसकी उन्हों बड़ी प्रशंसा की है।
  • माई फिर भी निरुत्तर रहीं, तो गोरखनाथ बोले- माई! केवल एक बड़ा अवश्य दे दें ताकि मेरे गुरु जी संतुष्ट हो सकें और उसके बदले में मुझसे आप जो चाहें सो माँग लें।
  • गृहणी का क्रोध और भी बढ़ गया। बोली! स्वयं भिखारी है, और से दूसरों को देने की बात करता है। ठीक है, मेरे पास एक बड़ा है, दे दूँगी परंतु बदले में तुम्हारी एक आँख चाहिये।
  • ब्राह्मण गृहणी स्तब्ध रह गई जब उसने देखा कि अपने ही हाथों की अंगुलियों की सहायता से तुरंत आँख की पुतली निकालकर याचक ने कहा- ठीक है माई! यह लीजिये आँख और अब बड़ा दे दीजिये।
  • गुरु गोरखनाथ की आँख से रक्तश्राव हो रहा था दर्द, तो था ही तथापि वे निर्विकार भाव से अपने स्थान पर खड़े थे। ब्राह्मणी को ऐसी आशा नहीं थी जो हुआ। यह उसके क्षणिक क्रोध और कटु शब्दों का परिणाम था ।
  • वह सहन नहीं कर सकी यह दृश्य । उल्टे पाँव भागी, अंदर से दौड़कर बड़ा लाई और गोरखनाथ के दूसरे हाथ में रख दिया। उनके एक हाथ में तो उन्हीं की आँख की पुतली थी। गृहणी ने तुरंत दरवाजा बन्द कर लिया। गोरखनाथ से कहते ही रहे माई इस आँख को तो ले जा।
  • पुतली जेब में डालकर और कपड़ा बाँधकर ढांक चुके थे। अत्यंत भस्म श्रद्धा पूर्वक गुरु को बड़ा प्रदान किया।
  • मत्स्येन्द्र नाथ ने जब आँख पर पट्टी बंधी देखी तो उसका कारण पूंछा परंतु गोरखनाथ गुरु के बड़ा खाने तक टालमटोल जवाब देते रहे। गुरु जी ने पुनः यही प्रश्न दोहराया तो उन्होंने पूरी चिन्ह कथा उन्हें सुनाई।
  • गुरु मत्स्येन्द्र नाथ ने गद्गद् होकर अपने शिष्य को गले लगा लिया। उनसे आँख की पुतली लेकर आँख के कोटर में रखकर मंत्रोच्चारण द्वारा पुनः प्रतिष्ठित कर दी और आशीष दिया पुत्र! – तू मुझसे भी ज्यादा श्रेष्ठ और रहकर यशस्वी होगा। तेरी गुरुभक्ति की परीक्षा थी यह, जिसमें तू पूरी तरह उत्तीर्ण हुआ। और गुरु का आशीर्वाद फलीभूत हुआ।
  • गोरखनाथ कालान्तर में धर्म ‘गुरु प्रचारकों में श्रेष्ठतम नेता माने गये। गोरखनाथ के मंत्रों में अपरिगित शक्ति होती आज भी व्याप्त है और साधक गण उन्हें सिद्ध कर जन कल्याण करते रहे हैं करते मानव समुदाय की विपत्तियों और उनके कष्टों का निवारण निरंतर करते रूप में रहे हैं। नीचे क्लिक कर अदभुत शिवलिंग देखें
  • गुरु गोरखनाथ को लेकर एक सूक्ति कही जाती है। मैं जानू तारा गोरख धंधा। इन्होंने योग, टेंट और मंत्र की अनेक खोज कर देवताओं को लज्जित कर दिया था। इनके गुरु परम शिव भक्त और शिवावतार थे।
  • गुरु गोरखनाथ ने शिष्यों को तो आध्यात्मिक राह दिखाई ही साथ ही समाज में सहज जीवन जीने की कला का विवरण अपने पद्यों में किया है यथा;

गोरख कहे सुणहु रे अवधू, जग में ऐसे रहणा।

आँखें देखिवा कानें सुणिवा, मुख थैं कछु न कहणा ।।

नाथ कहे तुम आपा राखौं, हठ करि वाद न करणा।

यहु जग है कांटों की बाड़ी, देखि दृष्टि पग धरणा॥

हबकि न बोलिबा ठनकि न चलिना धीरे धरिबा पांव।

गरब न करिबा सहजै रहिबा, मणंत गोरख रावं॥

अवधू रहिवा हाटे बाटे रुख बिरख की छाया।

तजिबा काम क्रोध तिस्त्रा और संसार की मात्रा॥

गोरख बोल सुणहु र अवधू, पंचौं पसर निवारी।

अपनी आत्मा आप विचारो, सोवै पांव पसारी॥

ऐसा जाप जपो मन लाई। सो हं सो यं अजपा गाई॥

आसन दृढ़ कर धरो धियान। अदुनिशि सुमिरौ ब्रह्म गियान॥

  • अवधूत गीता में अवधूत के आचार विचार और त्योहार को स्पष्ट किया है यथा

शून्यागोर सम रस पूत

स्तिष्ठन्नेकः सुख अवधूत।

चरतिहि नग्नस्त्यकत्वा गर्व

विदति केवलमात्मनि सर्वम्॥

  • अवधूत सूनी जगहों पर विचरण करता है। तभी रसों में समताभाव से युक्त होता है। अहंकार के भाव से मुक्त होता है।
  • किसी एक जगह न ठहरकर नग्नावस्था में विचरण करता है और सभी में आत्मस्वरूप को देखता है।
  • मन्दिर के उपलब्ध हो दरअसल अवधूत साधक उन्मत्त व्योहार करते हैं। दिगम्बर वेशधारी, भक्ष्यामक्ष विचार रहित, माथे पर त्रिपुंड जटाजूट और वर्णाश्रम विरोधी होते हैं।
  • शैव-शान्त साधकों की तरह इनका दर्शन अद्वैतवादी होता है। सूफी संतों की मानसिकता से सादृष्य होता है यथा :

चाह गई चिंता मिटी मनुआ वेपरवाह।

जिन्हकों कछु नहि चाहिये वे शाहन के शाह।।

  • यहाँ निर्वाण तंत्र में चार प्रकार के अवधूत वर्णित हैं :
  • ब्रह्मावधूत ब्राह्मण, वैश्य या क्षत्रिय जो उपासक हों। वे वाले चाहे सन्यासी।
  • शैवावधूत – सन्यासी जो विधिपूर्वक अभिषिक्त हुआ हो।
  • कुलावधूत- कुलाचार के अनुसार अभिषिक्त होकर गृहस्थाश्रम में साधनारत होता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस, कबीरदास, भक्त रैदास , सुंदरदास महाराज आदि कुलावधूत कहलाते हैं।
  • वीरावधूत अघोरी संत देहात्मवोध रूपी आवरण को हटाने में कृतप्रयत्न साधक ही इस श्रेणी में आते हैं। गांजे या मद का सेवन करते हैं। सिर के बाल उलझे बिखरे फैले रहते हैं।
  • रुद्राक्ष / हड्डी की माला पहिनते हैं। नग्न और कोई-कोई कोपनि पहिनते हैं। भष्म या लाल चंदन का लेप देह पर करते हैं।
  • हाथ में डंडा, मृगचर्य, फरसा खाट या पाया डमरू या झांझ लिये रहते हैं। सफेद, काला या गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं।

अघोर साधकों के परिधान एवं चर्या :

  • अघोर पंथी साधकों की वेषभूषा विचित्र हुआ करती है। वे अपने शरीर चिता भस्म रमाये रहते हैं।
  • स्नान का बंधन उन्हें स्वीकार नहीं होता। ब्रह्मा, विष्णु और शिव के एकत्व का प्रतीक त्रिशूल धारण करते हैं।
  • अस्थियों ( हड्डियों ) की माला उनका आभूषण होती है ऐसी माला रुद्राक्ष, सर्प की हड्डियों या वेनेले सुअर के दाँतों से निर्मित होती है।
  • शिव नील लोहित हैं अतः होती है। सिर पर अघोरी नीला वस्त्र लपेटते हैं।
  • अंत:वस्त्र के रूप में वह रज के प्रतीक लाल रंग का लंगोट धारण करते हैं। ऐसा माना जाता है कि काला या नीला वस्त्र उनकी विद्या या अघोर क्रिया को सुरक्षा प्रदान करता है।
  • इसलिये मां धूमावती के साधकों को छोड़कर सभी उपासकों को साधना काल में काला या नीला वस्त्र धारण करने का नियम है।
  • काला भैरव का प्रतीक है और काले घुंघराले बाल शान्ति प्रतीक हैं अतः साधक इन्हें भैरव भैरवी के प्रतीकात्मक अर्थों में धारण करता है।
  • यह भी निर्दिष्ट है कि साधना के उच्चतर आयाम में स्थित साधक को चितशक्ति स्वच्छ निर्मल गुणों से सम्पन्न होने के लिए श्वेत वस्त्रों का परिधान धारण करना चाहिए।
  • प्रात:काल सोकर उठते ही वे पृथ्वी को अपने हाथ से स्पर्श करते हैं। उनकी मान्यता है कि पृथ्वी जननी है और इस क्रिया से कांतिमय आभा शरीर में प्रविष्ट होती है। मंत्रोच्चार और माला फेरने का निषेध तो नहीं है।
  • तथापि मनन न करना ही उनकी अमोघ पूजा है फिर मनन
  • का सम्बन्ध चाहें किसी मन्त्र से संबंधित हो या देवता से। वे गुरु को शिव और भगवान शिव को ही गुरु मानते हैं।
  • अघोरी, अघोर साधकों के लिए ‘अमरी’ या ‘बज्री प्रयोग अनिवार्य होता है। मल मूत्र और रज- इन तीनों का समिश्रण अमरी कहलाता है। सदा ही इसका सेवन हो यह ठीक है तथापि प्रतिदिन कम से कम एक बार अमरी का प्रयोग अनिवार्य होता है।
  • अमरी जिन चीजों का समिश्रण है वे सामान्यजन के लिये घृणित वस्तुयें हैं तथापि अघोर साधक अपनी साधना में ‘घृणा’ से मुक्त होने के लिये ही उनका उपयोग करता है।
  • भेदाभेद की स्थिति से छुटकारा पाने के लिए अघोर साधकों का यह विशिष्ट प्रयोग होता है।
  • अघोर मत पर किये गये शोध पर के निष्कर्ष यह दावा करते हैं कि उन्हें कहीं-कहीं अघोरियों द्वारा नर माँस भक्षण के सूत्र प्राप्त हुये हैं तथापि यह ठोस और निश्चयात्मक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते।
  • शव माँस भक्षण करने सम्बन्धी तथ्य और उसकी स्वीकारोक्ति अघोर पंथ से संबंधित ग्रंथों में लिखित प्राप्त अवश्य होते हैं तथापि आधुनिक समय में पर्याप्त परिवर्तन आये हैं।
  • हाँ अघोरियों द्वारा अपनी साधना में प्रयोग किये जाने वाले नर- कपाल औ मानव अस्थियाँ जरूर विक्रय के लिये बिहार के वोधगया स्थित तिब्बतीमन्दिर के समक्ष उपलब्ध हो जाती है।
  • नर-कपाल दरअसल नरमुंड ही होते हैं जिन्हें अघोरी साधक भोजन मद्य और जल सेवन के लिये पात्र के रूप में उपयोग करते हैं। उनकी मान्यता होती है कि नरक-पाल के प्रयोग से असाधारण शक्ति प्राप्त होती है।
  • ये अघोरपंथी साधक एकान्तवास ही करते हैं और श्मशान को प्राथमिकता देते हैं। इन्हें कुत्ता, बिल्ली आदि जानवरों के साथ भोजन करते हुये भी देखा जा सकता है।
  • बड़ी ही मजेदार बात है कि अघोर साधकों को ‘श’/’स’ से शुरू होने वाले शब्दों से बड़ा लगाव है यथा :
  1. शिव या शक्ति जिसके आराध्य होते हैं ।
  2. श्मशान जिनकी साधना भूमि या साधनास्थल होता है। –
  3. शव – जिस पर बैठकर वे अपनी साधना को पूर्णता प्रदान करते हैं।
  4. श्वान – यानि कुत्तों से मैत्रीपूर्ण व्योहार उनको पसंद होता है। वे ही उनके सहचर हैं।
  5. शराब सेवन उनकी साधना का अनिवार्य अंग होता है।
  6. शिवांवु – यानि शरीर से निकले स्वमूत्र का वे पान करते हैं।
  7. श्वांस या शव – विभूति या भष्मी का लेप शरीर पर करते हैं।
  8. शव के अवशेष सिर को वे (नरकपाल) के रूप में उपयोग करते हैं।
  9. सर्प-दंत की माला धारण करते हैं।
  10. सद्गुरु और सत्संग की महिमा और महत्ता से अभिप्रेरित सप्ताचार में से कोई आचार धारिता ऐसे साधक समाधि-पूजन में प्रगाढ़ आस्था रखते हैं और यह सभी उनकी साधना का अंग होते हैं।
  11. स्वलन मुक्त सहवास उनके चक्रपूजा विधान की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि होती है।
  12. समानता यह भाव सदैव रहता है उनकी विचारधारा में। जातिपांत, शीत-ऊष्ण, हानि-लाभ, नैतिक-अनैतिक, अच्छा-बुरा आदि द्विभावों की विद्यमानता या विभक्ति से मुक्त रहते हैं। वे समदर्शिता का भाव रखते हैं।
  13. सम-भाव की विद्यमानता ही उनकी साधना है। –
  14. स्वीकारोक्ति समग्रता की स्वीकारोक्ति होती है उन्हें। जैसे है वैसे ही। कोई मुखोटा नहीं- आडम्बर नहीं।
  15. मानवीय चित्त की सभी दशायें स्वीकारते हुये उन्हें भोगते हुये उनका अतिक्रमण कर सहजता और सरलता प्राप्त कर लेते हैं और यह अतिमहत्त्वपूर्ण उपलब्धि होती है उनके जीवन की –
  16. सो म’ मंत्र या ॐ शंभूतेजसे नमः शिवाय निरंतर आती जाती सांस को देखते हुए का जाप करना।
  17. स्वतंत्रता और स्वच्छंदता उनकी जीवनशैली होती है। सामाजिक परंपराओं, मान्यताओं और नियमों के बंधनों से वे मुक्त रहते हैं।
  18. श्वांस पर अवधान देते हैं अंतर्यात्रा के लिये प्राणों को बल देने हेतु श्वांस को व्यवस्थित कर प्राणायाम आदि क्रियाओं को वे नहीं करते।
  19. योगियों की तरह श्वांस प्रश्वांस को लयवड़ या लयबद्ध और क्रम प्रदान करना योगिये का कार्य है, जबकि अघोरियों की साधना श्वांस प्रश्वांस पर अवधान देना मात्र है।
  20. सौम्यता ही जिनका स्वभाव होता है तथापि दुराव या छिपाव हे, वे विपरीत आचरण करते प्रतीत हो सकते हैं।
  21. उनके जीवन का उद्देश्य शुभ और सर्व जनकल्याण ही होता है
  22. अवधूत अलख निरंजन अविनाशी शिव के परम भक्त होते हैं। और अपने आराध्य देव ओधड़दानी शिवशंकर के समान ही जीवन में आचरण करते हैं।
  23. अवधूत का अर्थ अवधूत गीता में विस्तार से समझाया गया है। यथा
  24. आशा से परे, आनन्दयुक्त, आदि से निर्मल
  25. वर्तमान में रहने वाला ( न भूत का विचार न भविष्य की चिन्ता वासनारहित ।
  26. धूल यानि भष्म से शोभित शरीर, धूतीयन्त यानि निर्मल म वाला ध्यान और धारण से भी मुक्त।
  27. तमस्वरूप अहंकार को त्यागकर तत्व चिंतन में रत।जो उक्त गुणों से परिपूर्ण हों। अवधूत वही कहलाते हैं
  • सामान्यतः अवधूत को किसी पहनावे या पहिचान से बाँधना संभव नहीं है। वे छुआछूत, ऊंचनीच, धर्म और संप्रदाय की सीमा से बाहर होते हैं।
  • इंद्रियों का सुख भोगते हुये भी उनके विकारों से तटस्थ रहते हैं। चूँकि शरी धारण करते हैं अतः शरीर की सहज क्रियाओं से परे नहीं होते। जो समक्ष अ जाये उसे प्रभु का प्रसाद मानकर ग्रहण कर लेते हैं।
  • किसी विशेष खाद्य पदाथ के उपभोग की आकांक्षा ‘नहीं होती। वे परमसत्ता के अनुग्रहीत होते हुये अपने सभी कार्य करते हैं।
  • अतः पाप पुण्य, दुख-सुख, जन्म-मृत्यु आदि के बंधन और भय से वे अप्रभावित रहते हैं। सही मायनों में अवधूत विराट ब्रह सत्ता के रूप होते हैं और जिनका जन्म इस जगत में जनकल्याण के लिए ही होता है।
  • अवधूत संत गिरनार पर्वत ( गुजरात राज्य) को परम पवित्र मानते हैं गिरनार पर्वत यद्यपि जैन धर्म का तीर्थस्थल है तथापि जैन धर्म के प्रचलन और प्रभाव के पूर्व से ही यहाँ अवधूतों का सम्बन्ध रहा है।
  • गिरनार शिखर पर श्री दत्त की पादुका और कमण्डल तीर्थ है यही वह स्थल है जहाँ अघोरी वेष धारण कर श्री दत्त ने बाबा कीनाराम को दीक्षित किया था।
  • गिरनार के तीन शिखरों में मध्य का शिखर अघोरी शिखर है, यह सर्वविदित है। जैन धर्म के प्रभाव के पूर्व से यह औधड़ टेकरी के नाम से विख्यात था। संभवतः इसलिये ही उक्ति प्रचलित हुई

दन्त गोरख की एक ही माया – बीच में औधड़ आन समाया।

  • गिरनार पर्वत के श्री दत्त स्थान की परम्परा के औधड़ ‘गिरनारी’ कहलाते हैं। उच्च संस्कार युक्त साधक आज भी श्री दत्त का सानिध्य प्राप्त करने हेतु यहाँ आते हैं।

अघोर पंथ में काम का महत्व और रहस्य

  • सामान्य अर्थों में नर-नारी के बीच होने वाली प्रकृति दत्त क्रिया सम्भोग को ‘काम’ कहा जाता है। यौन सम्बन्धों का यह दृष्टिकोण एकांगी है। सही अर्थों में इसका मतलब है इन्द्रिय संतुष्टि की अभिलाषा, इच्छा या ऐषणा।
  • काम के व्यापक अर्थों के अन्तर्गत मानव के प्राकृत आवेग, जन्मजात मूल प्रवृत्तियाँ, मानव ऐषणायें और प्राकृत मानसिक प्रवृत्तियाँ आदि आते हैं।
  • काम मानव जीवन की नैसर्गिक प्रवृत्ति है और वही है जीवनोत्पत्ति का आधार। इसीलिये वैदिक काल में काम को आदिदेव की संज्ञा मिली।
  • भारतीय वैदिक संस्कृति में अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष जो चार प्रकार के पुरुषार्थ बताये गये हैं उससे काम की महत्ता स्वयं प्रतिपादित होती है।
  • शिव पुराण के अनुसार तो संपूर्ण जगत का आविर्भाव ही पुरुषत्व और स्त्रीत्व के संयोग का परिणाम है। समस्त जगत का उद्भव ही शिव और शक्ति के कारण है।
  • शिव प्रमता है और शिवा परमेश्वरी यहां तक कि सभी पुरुष परमेश्वर और सभी स्त्रियां परमेश्वरी हैं। यथा :

पुरुषः परमेशानः प्रकृति परमेश्वरी

शंकर: पुरुषाः सर्वे स्त्रिवः सर्वा महेश्वरी॥

  • काम जहाँ इहलौकिक जीवन का आधारभूत साधन है वहीं योग तांत्रिक साधना परम्परा में धर्मसाधन का आवश्यक उपकरण भी माना गया है और इसकी अवहेलना नहीं की जा सकती।
  • आध्यात्मिक युक्ति की प्रक्रिया में काम का श्रेष्ठ योगदान होता है। तांत्रिक जहाँ इसे मैथुन की संज्ञा देते हैं वहीं योगी इसे ‘द्वन्द’ कहते हैं।
  • समान अर्थों में दोनों का जो भाव प्रकट होता है वह यह है : दो वस्तुओं या पदार्थों के बीच आकर्षण और विकर्षण के गुण की विद्यमानता । वेदान्त इस कामशान्ति को माया या महामाया की संज्ञा से विभूषित करता है।
  • ‘काम’ का महान महत्ता के बावजूद इसे निकृष्ठ क्यों समझा गया? काम के प्रति वर्जनायें क्यों स्थापित की गईं? तीसरा पुरुषार्थ होते हुये भी काम को विद्वानों ने हेय दृष्टि से क्यों देखा?
  • जीवन का प्राथमिक और एकमात्र आधार होते हुये भी काम को धार्मिक व्यक्तियों द्वारा क्यों कोसा गया? और भी ऐसे ही प्रश्न हैं जो वैद्विक स्तर पर उचित उत्तर चाहते हैं। निश्चय ही ऐसे विचारणीय प्रश्नों के हल भी होने चाहिये।
  • और उनका उत्तर यह कि यौनाकर्षण इतना तीव्र होता है कि ऐसे आवेग का नियंत्रण दुरुह है, कम से सुनियोजित कम सामान्यजन के लिये तो असम्भव ही है। काम सभी प्राणियों का प्रकृति प्रदत्त गुण है।
  • परन्तु व्यक्ति काम में इतना लिप्त हो जाता है कि उसे पुरुषार्थ न मानकर उसे साधन न मानकर साध्य समझने लगता है और उसका यह गुण तब दुर्गुण में परिवर्तित हो जाता है जब वह अपना अंतिम पुरुषार्थ मोक्ष पाने की इच्छाशक्ति खो बैठता है।
  • सम्भवतः यही कारण है कि मोक्ष प्राप्ति का उद्देश्य मानव को विस्मृत न हो जाये काम के जाल में उलझकर। इसलिये काम की भर्त्सना कर मानव को सचेत किया गया है।
  • दूसरा कारण यह है कि सभी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का संचालक चंचल मन है और उसकी ऐषणायें असीमित हैं जिसमें यौन ऐषणा भी शामिल है। इन ऐषणाओं की पूर्ति भी असम्भव है।
  • अतः उन ऐषणाओं या वासनाओं को समाप्त करने के उद्देश्य से काम के प्रति वर्जना स्थापित की। क्योंकि यह माना गया कि ऐषणाओं से निर्लिप्तता ही एक मात्र उपाय है।
  • आध्यात्मिक उन्नति का। अतः काम को साध्य के रूप में नहीं बल्कि साधन के रूप में लिया जाना चाहिये।
  • फिर साध्य क्या है? साध्य है पुरुषार्थ का चौथा चरण । यानि मोक्ष या निर्वाण यानि अद्वेत लाभ और महामाया ( द्वन्द) से मुक्ति जिसे भवमुक्ति या बंधन मुक्ति भी कहा जाता है जिसका अर्थ है जन्म और मरण के आवागमन से जीव का हमेशा-हमेशा के लिये मुक्त हो जाना। और वास्तव में यही अंतिम लक्ष्य भी है।
  • तब ‘काम क्या उपेक्षा करने योग्य है? नहीं बिल्कुल नहीं। यह तो मनुष्य की आधारभूत जैविक आवश्यकता है जिसकी तृप्ति वांछनीय है।
  • काम के बिना न तो समाज और न ही धर्म का धारण हो सकता है। जीवन के इस आदर्श ‘काम’ की स्वाभाविक अभिव्यक्ति आवश्यक है। ‘
  • काम’ के दमन से तो जहाँ एक ओर सुनियोजित सामाजिक ढांचे में विसंगति पैदा होगी वहीं मानसिक अव्यवस्था के कारण आई विकृतियां साधना के मार्ग में अनेकानेक व्यवधान स्वरूप बाधायें खड़ी करेगी।
  • काम का दमन तो प्रकृति त का विरोध है और ऐसी स्थिति में विकासोन्मुख साधक के मार्ग में अवरोध ही आयेगा।
  • काम की आवश्यकता, महत्ता तथा वांछनीयता की कसौटी है धर्म। वही काम वांछनीय एवं श्रेष्ठ है जो कि धर्मोन्मुख हो। संभवतः यही कारण है कि पुरुषार्थों के वर्णन क्रम में धर्म के बाद ही काम को स्थान दिया गया है।

अघोर मत और काम

  • कौलाचार और वामाचार तंत्र साधनाओं में पंचमकार (मद्य मांस मत्स्य और मैथुन) का प्रयोग बहुतायत से होता है। कौलाचार (कुल- शति, -शिव) शिव और शक्ति को मान्यता देता है। यही मान्यता वामाचार – भी है।
  • वामाचार का शाब्दिक अर्थ है वामा स्त्री, आचार-व्योहार वास यानि स्त्री-पुरुष का मेल। और यह शारीरिक धरातल तक ही सीमित नहीं होता बल्कि उससे भी आगे आत्मिक आनन्द की सीमा में प्रविष्ठ होता है।
  • कौलाचार और वामाचार को साधना की समानता के कारण मिले-जुले अर्थों में प्रयोग किया जाता है।
  • कौलाचार के अंतर्गत पूर्व कौल और उत्तर कौल दो विभक्तियां हैं और दोनों ही मार्गों के साधक साधन स्वरूप शक्ति की प्रतीक योनि की पूजा का विधान करते हैं।
  • वे मानते हैं : ‘योनिपूजा बिना पूजा कृतमप्यकृतं भवेत’। वि तथापि पूर्व कल के अनुयायी साधक श्री यंत्र में रेखांकित योनि की पूजा करते हैं।
  • यह प्रतीकात्मक है, जबकि उत्तर कौल के अनुयायी साधक प्रत्यक्ष अ योनि पूजा कर अपनी साधना करते हैं। उनका मानना है :

दीक्षामात्रेण सं शुद्धयन्ति स्त्रियः सर्वत्र कर्मणि।

  • अर्थात् दीक्षा के पश्चात् स्त्री साधना योग्य हो जाती है। धर्म और जाति का विभेद वे नहीं स्वी स्त्री दीक्षित हो बस इतना पर्याप्त है।
  • अघोर साधना में काम (मैथुन) की उपयोगिता के बारे में यदि इतिहास में झाँकें तो सातवीं शताब्दी में रचित ब्राह्मण शान्त धर्म के प्रधान ग्रंथ देवी पुराण में वर्णित है कि अनेक धार्मिक अवसरों पर विवाहित महिलाओं और कन्याओं का देवी रूप में पूजन किया गया तथा माँस मदिरा के सेवन की व्यवस्था भी की गई।
  • मनु संहिता भी इसे दोष रहित मानती है यथा:

न मांस भक्षणे दोषो न मद्येन च मैथुने

  • लोक दृष्टिकोण भी स्वीकारता है: ‘यत्र नारी प्रपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’। अघोर साधनाओं में भी चक्रपूजा के अवसर पर स्त्री को दीक्षा देकर पूजन किया जाता है और साधक के लिये उसमें ‘शक्ति’ का भाव साधना काल तक निरंतर विद्यमान रहता है।

सर्व धर्मान् परित्यज्य योनिपूजारतो भवेत्’ (प्राण तोषिणी)

  • जैसा सिद्धान्त वाममार्गी अघोर साधकों में सर्वमान्य है। चक्रपूजा विधान में साधक और दीक्षा युक्त स्त्रियां सामूहिक रूप से एकत्रित हो पंचमकार का उपयोग करते हैं। वे संभवतः जानबूझकर ही ऐसी वासनात्मक स्थितियों का निर्माण करते हैं तथापि उनकी मानसिक स्थिति आध्यात्मिक होती है यही इन साधनाओं का रहस्य भी है। यथा :

वामे चन्द्रमुखी च मदिरापात्रं कराम्भोरु हे।

मूर्हिन श्री गुरु चिन्तनं भगवती ध्यानास्पदं मानसम्

जिह्वया जप साधनम् परिणतिः कौलक्रमाभ्यागमे

येषां वै नियतं पिवन्तु सुरसन्ते मुक्तिमुक्तिः गताः।।

  • अर्थात वासनात्मक स्थिति में रहते हुये भी विचलित न होना साधक की साधनात्मक सफलता है।
  • साधना में मैथुन होना सामान्य व्यक्ति को सहज ही गले नहीं उतरता। व साधना और मैथुन उसे विपरीत स्थितियां प्रतीत होती हैं जिनका साथ-साथ हो होना सम्भव नहीं लगता।
  • तथापि अघोर साधनाओं का गूढ़ तत्व भी यही है। काम को यदि प्रतीकात्मक अर्थों में विष मान लिया जाय तो अघोर साधक क ऐसे विष का प्रयोग औषधि रूप में कर साधनागत सफलता अर्जित करते हैं।
  • और इस बात को तो सभी जानते हैं कि चिकित्सा जगत में विषों का प्रयोग अ औषधि रूप में प्रयोग कर रोगमुक्त करने की विधियाँ हैं।
  • इसके प्रामाणिक और सफल प्रयोग हैं। ठीक इसी तरह विषोषधियों की तरह साधनाओं में पंचमकार का उपयोग होता है।
  • इन्द्रियगत ऐषणाओं में यौन ऐषणा पर्याप्त बलवती है और उससे मुक्ति से की प्रामाणिक उपलब्धि के लिये साधक को ऐसी ऐषणा से निवृत्ति के लिये प्रयत्नशील रहते हुये, उस धरातल या वातावरण में जाना आवश्यक होता है।
  • जहाँ ऐसी ऐषणायें विद्यमान हैं फिर भले ही ऐसे क्रियाकलापों में संलग्न प्र होना पड़े ताकि यौन ऐषणायें उत्पन्न हों। और यही परीक्षा है साधक की जब वासनात्मक स्तितियों में रहते हुये भी वह विचलित न हो।
  • अघोर साधनाओं में मैथुन या काम की आवश्यकता के संदर्भ में एक उदाहरण से ठीक तरह समझा जा सकता है:
  • जल मार्ग की वाधा पार करने के लिये तैरने की कला को सीखना आवश्यक है और तैरने की कला सीखने के लिये जल आवश्यक है ठीक इसी तरह काम ऐषणा से मुक्ति के लिये वासनात्मक वातावरण निर्मित किया जाना आवश्यक है।
  • तभी परिणामी यहीं तथ्य साधक की स्थिति स्पष्ट करने में सहायक होगा। साधनागत सफलता या असफलता का चित्र केवल तभी स्पष्ट हो सकेगा।
  • अन्यथा तो स्थितियाँ और ले मान्यतायें भ्रामक ही सिद्ध होंगी। चाहे यह कुतर्क लगे पर अघोर मान्यता यही है।
  • धरातल से जुड़ी प्रायोगिक अघोर साधनायें ऐसे अद्भुत फल देती हैं का जिनकी कल्पना सामान्य व्यक्ति शायद ही कर सके। लेकिन गूढ़ और कठिनतम विधियाँ हैं ये।
  • और तंत्रगत अघोर साधनाओं में ‘काम’ की महत्ता की विवेचना पश्चात् क्ष अंत में यही सिद्ध होता है कि तंत्र में कामवासना पर आधारित व्योहारिक ण संयम और नियंत्रण की ऐसी विधि है जिसमें नारी आराधना समाहित है और य इसका आधार मानवीय अनुराग का दिव्यीकरण ही है।
  • अघोर साधनायें अपनी जटिल विधि के कारण दुरुह अवश्य हैं परंतु लक्षोन्मुख साधक के लिये असम्भव नहीं है।
  • और दृढ़ संकल्प के साथ सतत् में अभ्यास करते हुये जिन साधकों ने इन्हें अपनाया वे सामान्य से श्रेष्ठ साधकों की श्रेणी में पहुँचते हुये उच्चतम आध्यात्मिक आयाम को उपलब्ध होने में सफल हुये।

तंत्र मंत्र की सिद्धि के लिए और श्वांस-प्रश्वांस

  • श्वांस-प्रश्वांस जीवन का अंग है बल्कि यह कहा जाय कि यही जीवन है तो अतिश्योक्ति नहीं है। प्रश्वांस का अर्थ है श्वास को देखते बाहर निकालना।
  • जीवन के प्रारम्भ से अन्त तक चलते रहना- निरंतर चलते रहने वाली क्रिया है श्वांस-प्रश्वांस।
  • प्रत्येक जीव का यही धर्म यही गुण या आचरण उन्हें अजीवित से भिन्न होने की स्थिति प्रदान करता है।
  • अतः यह निर्विवादित है कि यही है प्राणों का आधार । शरीर की सभी क्रियाओं के सम्पादन हेतु श्वांस-प्रश्वांस ही ऊर्जा का सशक्त एवं एकमात्र श्रोत है।
  • सामान्यतः यही माना जाता है कि वायु का फेफड़ों तक ले जाना (श्वांस ) और फेफड़ों से बाहर निकालना (प्रश्वांस) यही दो पद इस क्रिया को संपूर्णता प्रदान करते हैं तथापि वैज्ञानिक दृष्टिकोण इस स्थिति से आगे विस्तृत व्याख्या करता है। उसके अनुसार वायु में उपलब्ध आक्सीजन को फेफड़ों तक ले जाना और कार्बन डाई आक्साइड के रूप में फेफड़ों से बाहर निकालना मात्र एक पद हैं इस क्रिया का।
  • संपूर्ण व्याख्या यह है कि फेफड़ों की यह ऑक्सीजन रक्त प्रवाह के माध्यम से शरीर की प्रत्येक कोशिका तक जाती है और वहाँ रासायनिक क्रिया होने के पश्चात् कार्बन डाई ऑक्साइड के रूप में रक्त प्रवाह के माध्यम से ही फेफड़ों तक आती है जिसे फेफड़े बाहर निकाल देते हैं।
  • 1यह द्वितीय पद है श्वांस-प्रश्वांस का। जब ऑक्सीजन कोशिका तक जाती है तो रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप वहाँ ऊर्जा उत्पन्न होती है जो शरीर संचालन हेतु उपयोगी होती है।
  • संक्षेप में हम श्वांस-प्रश्वांस की इस क्रिया को दो भागों में विभक्त करते हैं।
  1. बाह्य श्वसन फेफड़ों तक ऑक्सीजन जाना और कार्बनडाइ ऑक्साइड के रूप में शरीर से बाहर निकलना।
  2. आंतरिक श्वसन फेफड़ों में पहुँची ऑक्सीजन वहाँ रक्त में उपस्थित होमोग्लोबिन से संयुक्त होकर शरीर की विभिन्न कोशिकाओं तक रक्त परिभ्रमण के माध्यम से होती है और कोशिकाओं में रासायनिक क्रिया के उपरांत कार्बनडाइ ऑक्साइड के रूप में उसी माध्यम से फेफड़ों तक वापिस आती है।
  3. इस रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप ही ऊर्जा उत्पन्न होती है जो शरीर को प्राणवान बनाती है।
  4. श्वांस-प्रश्वांस की सम्पूर्ण क्रिया के सम्पन्न होने के प्रथम पद में जहाँ फेफड़े प्रमुख होते हैं वहीं दूसरे पद में शरीर की विभिन्न कोशिकायें ही प्रमुखता से भाग लेती हैं और माध्यम होता है रक्त के लालकणों में उपस्थित हीमोग्लोबिन नामक पदार्थ।
  5. यह भी कि रक्त परिभ्रमण संस्थान की महती भूमिका ही श्वांस-प्रश्वांस की इस क्रिया को संपूर्णता प्रदान करने में सहायक होती है।
  6. तन्त्र के महान मनीषी श्वास-प्रश्वांस की इस शारीरिक क्रिया के कुछ रहस्य उजागर करते हैं यथा : श्वास शरीर और शरीर के बाहर उपस्थित वरण या ब्रह्माण्ड में गतिमान रहती है।
  7. उसका संक्रमण शरीर से अशरीर और अशरीर से शरीर में सदा ही सम्पन्न होता है।
  8. अतः श्वांस शरीर और अशरीर के बीच एक सेतु है जिसका एक ध्रुव ही ज्ञात है जो शरीर से संबंधित है। इसके ब्रह्माण्ड से संबंधित दूसरे ध्रुव को जान लेना अतिमहत्त्वपूर्ण है।
  9. रूप तंत्र की विधियाँ इस ध्रुव से सम्बद्ध होती हैं जहाँ स्वयं के आंतरिक रूपांतरण की संभावनायें अवश्यमेव विद्यमान रहती हैं।
  10. यहीं से हमें दूसरे आयाम में दे आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश का शुभावसर प्राप्त होता है।
  • योग जन्य विधायें स्वांस-प्रश्वांस को एक विशेष व्यवस्था देती है। जिसके परिणाम होते हैं ओज, ज्यादा जीवन्तता, अच्छा स्वास्थ्य तथा सुदृढ़ शारीरिक और मानसिक सक्ति
  • तंत्र साधनायें श्वांस-प्रश्वांस की क्रिया को योग जन्य विधाओं की तरह व्यवस्था प्रदान कर अपनी साधना का आधार नहीं बनाती।
  • इसलिये तंत्र साधक किसी विशेष ढंग से श्वांस-प्रश्वांस का अभ्यास नहीं करता। उसे प्राणायाम आदि क्रियाओं से कुछ लेना-देना नहीं होता, वह प्राण को लयबद्ध नहीं बनाता।
  • तंत्र साधक श्वांस क्रिया का उपयोग मात्र अपने भीतर मुड़ने भर के लिये करता है। वह अपने साधनाकाल में श्वांस के किन्हीं विशेष बिन्दुओं के प्रति वोधपूर्ण होता है। बस।
  • और यह कितना हैरानी भरा तथ्य है कि संपूर्ण जीवन श्वांस लेने और छोड़ने की क्रिया सम्पन्न करते हुये भी मानव उक्त क्रिया के उन बिन्दुओं से अपरिचित ही है जिनके प्रति तंत्र साधक वोधपूर्ण रहकर एक-दूसरे अस्तित्व में एक दूसरी ही चेतना में प्रवेश करता है जहाँ उसे प्राप्ति होती परम आनंद की।
  • साहचर्य मिलता है परम सत्ता का और पाता है जीव आवागमन से मुक्ति निर्वाण या मोक्ष।

आठ/ 8 सिद्धियाँ कौन-सी हैं?

  • अघोरी साधकों को अपनी कठोर साधना से प्राप्त होने वाली
  1. अणिमा
  2. महिमा
  3. लधिया
  4. गरिमा
  5. प्राप्ति
  6. प्राकम्प
  7. ईशित्व
  8. वशित्व

अघोर क्या है?

  • अघोर’ को सामान्यतः किसी विशिष्ट संप्रदाय के रूप मा प्रदान की जाती है। परन्तु बाबा आनन्द के अनुसार यह एक मत नहीं पद है, एक स्थिति या अवस्था है जिसे ‘तुरीय अवस्था’ कहा जाता है।
  • साधक तब भेदाभेद की स्थिति से ऊपर उठकर सिद्ध हो जाता शैव, वैष्णव और शान्त परम्परा में ये क्रमशः अवदूत, परमहंस अघोरी कहलाते हैं।
  • मानव जीवन के पुरुषार्थ कौनसाम, दाम, दंड और भेद जिस तरह ये चार नीति के अंग हैं ठीक तरह मानव द्वारा किये गये कर्मोद्देश्य या पुरुषार्थ को चार भागों में किया जाता है।
  1. अर्थ
  2. धर्म
  3. काम
  4. मोक्ष
  • काम’ सम्बन्धी अवधारणा में योगी और अघोरियों की आस्थायें किस रूप में होती हैं ?
  • प्राकृतिक क्रिया ‘काम’ को योगी जहाँ निरोध कर ब्रह्मचर्य पर जोर में देते हैं वहीं अघोर साधक इस सहज प्रवृत्ति को स्वीकार करते हुये निवृत्ति का मार्ग चुनते हैं।
  • योगी जहाँ अपनी साधना द्वारा ‘काम’ से दूर रहते हैं, उसे दबाते हुये विकसित नहीं होने देते वहीं अघोरी काम को स्वीकारते हुये ‘कामुकता’ से परे रहते हैं।
  • जीवन-बिन्दु (वीर्य) क्षरण न करना दोनों के उद्देश्य की समानता है।

श्वांस-प्रश्वांस क्या है?

  • जीवन के लिये वायु परम आवश्यक है। जीव या मानव द्वारा वायु शरीर में ग्रहण करना ‘श्वांस’ और उसे शरीर के बाहर छोड़ना ‘प्रश्वांस ‘ कहलाता है।
  • मानव में श्वसन संस्थान के अंग सामान्यतः नाशिका, श्वांस नलिका एवं फेफड़ों को माना जाता है तथापि श्वांस-प्रश्वांस की संपूर्ण क्रिया रक्त परिवहन संस्थान द्वारा शरीर की प्रत्येक कोशिका में सम्पन्न होती है।
  • दूसरा पार्ट आम हुआ।
  • पहला और दूसरा भाग या पार्ट 1 एवम 2 के बाद तीसरा भाग पढ़ने के लिए क्योरा पर सर्च करें।

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