शिव ही संकल्प है, ऐसा क्यों कहते हैं। पूजा, अनुष्ठान में संकल्प लेने का सही तरीका क्या है?

  • संकल्प ही शिव है। असली शिवयोगी, शिव भक्त संकल्प के पक्के और हठी होते हैं। एक बार जो संकल्प ठान लिया उसे पूरा करके ही दम लेते हैं।
  • वेदों की ऋचा या शास्त्र में बार बार आया है !!शिव:संकल्प मस्तु!! अर्थात शिव और संकल्प के बिना जीवन में कुछ भी नहीं है। दुनिया में जिसने संकल्प को ठाना, उसे सर्वोच्च माना। संसार में संकल्प से बड़ी बड़ी शक्ति नहीं है।

शिव प्रदत्त संकल्प सूत्र

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोतातन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।

यस्मिन्नृचः साम यजूंषियस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः।
यस्मिश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानांतन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।

सुसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव।
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठंतन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।

  • परम शिव भक्त हठ योगी महात्मा और अघोरी अवधूत बहुत संकल्पी और जिद्दी होने से अनेक सिद्धि समृद्धि के स्वामी बन जाते हैं।
  • स्कंध पुराण में आया है कि संकल्प के धनी लोग भारी सफलता पाते हैं और उनका मनोबल मजबूत होता है। ये किसी से डरते नहीं हैं।
  • आप भी दृढ़ संकल्प लेकर 11 महीने में 11 लाख जाप !!ॐ शंभूतेजसे नमः शिवाय!! करके देखें। यह अघोर मंत्र ग्यारह माह बाद आपकी किस्मत बदल देगा। क्योरा पर अघोरी क्या हैं। अघोरियों के बारे में 7 लेख लिख दिए हैं।
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संत कीनाराम ? के लिए Ashok Gupta का जवाब

  • पूजा अनुष्ठान के समय भी संकल्प लेने की प्राचीन परम्परा है। इसी से हमें पूर्ण फल प्राप्त होता है। संकल्प के कारण ईश्वर हमारी मनोकामना पूर्ण या पूरी करने के लिए तत्पर एटा है।
  • जाने पूजा, पाठ के दौरान संकल्प करने या लेने की विधि क्या है? और इसी अनुसार आप संकल्प लेने के लिए पंडितजी से निवेदन करें।

केसे लें संकल्प

  • — स्नान, सन्ध्या, दान, देवपूजन तथा किसी भी सत्कर्मके प्रारम्भ में संकल्प करना आवश्यक है। अन्यथा सभी कर्म विफल हो जाते हैं।

संकल्प्य च तथा कुर्यात् स्नानदानव्रतादिकम्।

अन्यथा पुण्यकर्माणि निष्फलानि भवन्ति हि।।

(आचारेन्दु, मार्कण्डेयपुराणका वचन )

  • यदि किसी तीर्थमें स्नान कर रहे हों तो उस रिक्त स्थान में तीर्थका नाम, नगरमें हों तो उस नगर का नाम और गाँव में हों तो उस गाँव का नाम जोड़ दें।
  • पञ्चाङ्गों में पहले पृष्ठपर ही संवत्सर का नाम लिखा रहता है।रिक्त स्थान में संवत्सर का वह नाम जोड़ दें। वर्ष के आरम्भ वाला संवत्सर ही संकल्पादि में जोड़ा जाता है, बाद वाला नहीं।
  • चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन–इन शब्दोंको आवश्यकतानुसार रिक्त स्थानमें जोड़ दे।
  • हाथों में पवित्री धारण कर (कुशा से बनी अंगूठी) तथा आचमन आदि से शुद्ध होकर दायें हाथ में केवल जल अथवा जल, अक्षत, पुष्प आदि लेकर निम्नलिखित संकल्प करे।
  • ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः।ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे . क्षेत्रे नगरे पक्षे…. बौद्धावतारे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे…. ग्रामे ….नाम-संवत्सरे …. मासे” (शुक्ल / कृष्ण) तिथौ’…. वासरे’… गोत्र: शर्मा / वर्मा / गुप्तोऽहम् ‘ प्रातः (मध्याह्ने, सायं) सर्वकर्मसु शुद्ध्यर्थं श्रुति स्मृति पुराणोक्तफल प्राप्त्यर्थं श्रीभगवत्प्रीत्यर्थं च अमुक कर्म करिष्ये।
  • प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या या पूर्णिमा — इन शब्दोंको पहले रिक्त स्थानमें जोड़ दे।
  • – दिनके- रवि सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, रिक्त स्थान में जोड़ दे।
  • – कश्यप, भरद्वाज आदि अपना गोत्र रिक्त , क्षत्रिय अपने नाम के स्थान में जोड़ दे।
  • – ब्राह्मण अपने नामके अन्तमें शर्माअन्तमें वर्मा और वैश्य अपने नामके अन्तमें गुप्त रिक्त स्थानमें जोड़ दे।

आचमन की विधि विधान

  • प्रत्येक पूजा कार्य में आचमन का विधान है। आचमन से हम केवल अपनी बुद्धि की ही शुद्धि नहीं करते, अपितु ब्रह्मा से लेकर तृण तक को तृप्त कर देते हैं? आचमन न करने पर हमारे समस्त कृत्य, पूजा, अनुष्ठान व्यर्थ हो जाते हैं । अतः शौच के बाद भी आचमन का विधान है।
  • लाँग लगाकर, शिखा बाँधकर, उपवीती होकर यानि जनेऊ पहनकर और बैठकर तीन बार आचमन करना चाहिये।
  • उत्तर, ईशान या पूर्व की ओर मुख करके बैठ जाय। हाथ घुटनों के भीतर रखे। दक्षिण और पश्चिम की ओर मुख करके आचमन न करे।

एवं स ब्राह्मणो नित्यमुपस्पर्शनमाचरेत्।

ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगत् स परितर्पयेत्॥ (व्याघ्रपाद)

यः क्रियां कुरुते मोहादनाचम्यैव नास्तिकः।

भवन्ति हि वृथा तस्य क्रियाः सर्वा न संशयः।। (पुराणसार)

निबद्धशिखकच्छस्तु द्विज आचमनं चरेत्।

कृत्वोपवीतं सव्यंऽसे वाङ्मनः कायसंयतः।। (बृहत्पराशर)

अन्तर्जानुः शुचौ देशे उपविष्ट उदङ्मुखः।

प्राङ् वा ब्राह्मेन तीर्थेन द्विजो नित्यमुपस्पृशेत्।।

(याज्ञवल्क्य, आचाराध्याय, श्लोक १८)

ऐशानाभिमुखो भूत्वोपस्पृशेच्च यथाविधि।। (हारीत)

याम्यप्रत्यङ्मुखत्वेन कृतमाचमनं यदि।

प्रायश्चित्तं तदा कुर्यात् स्नानमाचमनं क्रमात्।।

(स्मृति – रत्नावली, आचाररत्न, पृ० १६)

– आचमन के लिये जलकी मात्रा –

  • जल इतना ले कि ब्राह्मणके हृदय तक, क्षत्रिय के कण्ठ तक, वैश्य के तालु तक और शूद्र तथा महिला के जीभ तक पहुँच जाय’।
  • हथेली को मोड़कर गौ के कान की तरह बना ले कनिष्ठिका और अंगूठे को अलग कर ले। शेष अँगुलियों को सटाकर ब्राह्मतीर्थ से निम्नलिखित एक-एक मन्त्र बोलते हुए आचमन करे, जिसमें आवाज न हो।

(अँगूठेके मूलको ‘ब्राह्मतीर्थ’ कहते हैं।) यथा

आयतं पूर्वतः कृत्वा गोकर्णाकृतिवत् करम्

संहताङ्गुलिना तोयं गृहीत्वा पाणिना द्विजः

मुक्ताङ्गुष्ठकनिष्ठेन शेषेणाचमनं चरेत्।।

(आचाररत्न, पृ० १६ में भरद्वाज, दे० भा० ११/१६/२७)

  • आचमनके समय बायें हाथकी तर्जनी से दायें हाथ के जल का स्पर्श कर ले, तो सोमपान का फल मिलता है।
  1. ॐ केशवाय नमः।
  2. ॐ नारायणाय नमः।
  3. ॐ माधवाय नमः।
  • आचमन के बाद अँगूठे के मूल भाग से होठों को दो बार पोंछकर ‘ॐ हृषीकेशाय नमः’ बोलकर हाथ धो ले। फिर अँगूठे से नाक, आँखों और कानों का स्पर्श करे।

हृत्कण्ठतालुगाभिस्तु यथासंख्यं द्विजातयः।

शुध्येरन् स्त्री च शूद्रश्च सकृत्स्पृष्टाभिरन्ततः॥

(याज्ञवल्क्यस्मृति, आचाराध्याय, श्लोक २१ )

दक्षिणे संस्थितं तोयं तर्जन्या सव्यपाणिना।

तत्तोयं स्पृशते यस्तु सोमपानफलं लभेत्।।

(आचार प्रदीप आचाररत्न, पृ० १६ )

त्रिः प्राश्यापो द्विरुन्मृज्य खान्यद्भिः समुपस्पृशेत्।

(याज्ञवल्क्य, आचाराध्याय, श्लोक २०)

अग्निरङ्गुष्ठस्तस्मात् तेनैव सर्वाणि संस्पृशेत्।

क्षुते निष्ठीवने सुप्ते परिधानेऽश्रुपातने।

पञ्चस्वेतेषु चाचामेच्छ्रोत्रं वा दक्षिणं स्पृशेत्।।

(दे० भा० ११ | ३ | २; आचारेन्दुमें मार्कण्डेय

  • आचमन बैठकर करना चाहिये – यह पहले लिखा गया है; किंतु — घुटने से ऊपर जल में खड़े होकर भी आचमन किया जा सकता है।
  • जब जल घुटने से कम हो तो यह अपवाद लागू नहीं होता, तब बैठकर ही आचमन किया जाना चाहिये।

जान्वोरूर्ध्वं जले तिष्ठन्नाचान्तः शुचितामियात्।

स्ताच्छतकृत्वोऽपि समाचान्तो न शुध्यति।।

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