जोश से भरे इंसान कभी किसी को दोष नहीं देते और हमेशा होश में रहते हैं वे किसी तरह के Loss से नहीं डरते! सुभाष चंद्र बॉस का भी यही मानना था।

वैसे भी गर्मी न ऊन में होती है न जून में होती है और ना ही खून में होती है न चून में होती है जुनून में ही सर्वाधिक गर्मी होती है
सफलता, समृद्धि पाने तक हमेशा मंच, लंच और टंच प्रसिद्धि यानी पैसा से दूर रहें मेहनत की गुलामी करते रहें! हथेली में अपना भविष्य न खोजें!
परमात्मा गिने चुने लोगों को ही संसार में कुछ कर दिखाने के लिए चुनता है। बुनकर की तरह जीवन का निर्माण करने के क्रम में अनेकों कष्ट, तकलीफ़ इसलिए देता है, ताकि इंसान अनुभवी बने! क्योंकि अनुभवों का पूँजी अमूल्य धरोहर होती है
जब व्यक्ति अनुभवों की पूँजी जुटा लेता है, तो सफलता उसके कदम चूमने लगती है। शिखर चूमने के लिए घूमने की आदत भी डालें और कभी कभी दो पैग लगाकर शाम को झूमने में भी कोई दोष नहीं होता!
बस, ऐसा ही मुझे अहसास हुआ।
हमारे भारत के ऋषियों ने जीवन की संपूर्णता के लिए चार पुरुषार्थ बनायें हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष!
आज के परिवेश में इन चारों का नाम है धर्म यानि श्याम, अर्थ यानि दाम, दोनों काम और शिव धाम अर्थात मुक्ति!
आगे बढ़ने और सफलता पाने के ये चतुर्थ द्वार हैं!
ग़रीब परिवार और माँ बीमार पिता के पास न कोई व्यापार न कोई कमाई का मजबूत जरिया! छोटी सी हलवाई की दुकान थी जो कभी ठीक से चली नहीं! इसी दुकान से नाश्ता मिठाई बनाने का कम उम्र में ही सीख लिया!
खैर ऊपर वाले की लिखी स्क्रिप्ट को कौन बदल सकता है फिर भी भोलेनाथ सबको पार लगाता है
१२/१३ साल की उम्र में मात्र ३०/ रुपये महीने किताब की दुकान पर नौकरी से बचपन आरम्भ हुआ! उम्र बढ़ी, जवान हुआ। दोस्त बने और साथ ही दोस्ती हो गई नशे से।
फिर माँ हमेशा बीमार रहती और सभी तरह की पैथी में इलाज कराया लेकिन एक वैद्य की देशी दवाई से उन्हें काफ़ी आराम मिला हुई और उसके इलाज के दौरान मुझे ऐसा रामबान मिला जिसने मेरी जिंदगी पलट के रख दी। तभी से सोचने लगा कि एक दिन आयुर्वेदिक औषधियों से दुनिया की बीमारी मिटाऊँगा!
लेकिन कहते है न हर कामयाब इंसान के पीछे एक औरत का हाथ होता है, मेरी कहानी में वो औरत मेरी पत्नी थी।
कम उम्र में जब आपके सर पर जिम्मेवारी आती है तो जीवन जीने और उसको देखने का नजरिया आपको सबसे अलग कर देता है।
मैं ग्वालियर का रहने वाला हूँ- पिता हलवाई थे और 6 भाई बहन में मैं बीच का था। घर की जिम्मेवारी आना स्वभावीक थी। छोटी उम्र से काम शुरू किया।
कपड़े, किराने की दुकान पर भी काम किया! किताब प्रिंटिंग का काम सीखा, कंपोजिंग करना और प्रिंटिंग मशीन चलाना सीखा!
तीन चार साल की नौकरी में पब्लिकेशन का काफ़ी ज्ञान हासिल हुआ! किताब की दुकान में कुछ दिनों बाद ज़्यादा मन नहीं लगा, तो रेलवे से बिल्टी छुड़ाने की दलाली शुरू की
लेकिन एक दिन किसी ने रेलवे की बिल्टियों का बेग चोरी कर लिया!
फिर दूसरे पब्लिशर्स के यहाँ जबलपुर ब्रांच में नौकरी करने चला गया ।दो साल वहाँ गुजारे! लेकिन मान का स्वास्थ्य ज़्यादा बिगड़ने के कारण ग्वालियर लौट आया।
इसी दरम्यान एक दिन अख़बार में प्रधान मंत्री योजना का विज्ञापन पढ़ा और २५०००/ loan के लिए एप्लाई कर दिया
दलाली कमीशन काटकर हाथ में १९०००/ रुपये आए और कुछ कर्ज लेकर अनसोल्ड पेपर छाप डाले लेकिन उसी साल शिक्षा नीति में बदलाव हुआ मेरी सारी किताबें रद्दी हो चुकी थीं! सब बर्बाद हो गया। नशे से दोस्ती थोड़ी और बढ़ गई।
लेकिन कहते है न हर कामयाब इंसान के पीछे एक औरत का हाथ होता है, मेरी कहानी में वो औरत मेरी पत्नी थी।
जो लिखेगा, वही भविष्य में दिखेगा और जो दिखेगा सो बिकेगा। व्यापार, कारोबार मार्केटिंग और जीवन का यही मूल मन्त्र है। quora पर करीब ५ करोड़ पाठक हैं मेरे लेख पढ़कर दिमाग़ का फाटक खुल जाता है


