शिव की दाहिनी आँख से निकला वो तेज़, जो आज भी हमें जीवन दे रहा है -भगवान सूर्य
सूर्य ही आत्मा है, सूर्य ही साक्षी है!
सूर्य ही जीवन का परम रहस्य है।
आदि कालीन विश्वास है कि दिन रात का कारणभूत, वार, तिथि, योग, करण, विकला और चन्द्र की कलाएँ तथा ग्रहाँ की वकृता का मुख्याधार काल गमन का प्रधान कारण श्रीमन सूर्यनारायण प्रत्यक्ष रूप से दर्शन देने वाले भगवान हैं!

जब आकाश मेघावृत होकर सूर्य के दर्शन नहीं होने पर उस दिन को सिद्धगण दुर्दिन मानते हैं।
सृष्टि – पृथ्वी के उद्भव काल से भगवान सूर्य समस्त चर-अचार जगत् को चेतन्यता, प्रदान कर रहे हैं। नीचे शेषनाग की ऊर्जा और ऊपर सूर्य की किरण रूपी उर्जा से ही खाद्य-पदार्थों, स्स्वर्ण- रजत की उत्पति सम्भव है।
भगवान सूर्य के बारे में जून २००६ के अंक में प्रकाशित आर्टिकल अंधकार मिटाएगा-
भगवान सूर्य के दुर्लभ आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य शिव की दाहिनी आँख का तेज़”
आदिकाल से ही भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया है, जिन्हें हम रोज़ देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं जिनकी किरणों से सारा जीवन संभव है।सूर्य केवल प्रकाश के स्रोत नहीं, बल्कि जीवन, बुद्धि और चेतना के भी आधार हैं।
पौराणिक दृष्टि से यह शिव की दाहिनी आँख, और वैज्ञानिक दृष्टि से यह पृथ्वी की ऊर्जा प्रणाली का केंद्रीय इंजन है।
आदित्याय च सोमाय मङ्गलाय बुधाय च।
गुरु शुक्र शनिभ्यश्च राहवे केतवे नमः॥
सूर्यः सर्वगतः तेजस्वी लोकचक्षुर्नमोऽस्तु ते।
त्वया विनान हि लोकेषु तमोऽभिभूयते सदा॥
अर्थात- हे तेजस्वी सूर्यदेव! आप ही समस्त लोकों की आँख हैं, आप बिना यह सृष्टि अंधकार में डूब जाती है।
सूर्य -प्रत्यक्ष देवता और ऊर्जा का स्रोत! ऋग्वेद में कहा गया है !!सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च!! अर्थात सूर्य चल-अचल जगत का आत्मा है।
सूर्य की किरणों में न केवल प्रकाश, बल्कि विद्युत्, ऊष्मा और जीवन-संवर्धक स्पेक्ट्रम भी मौजूद हैं।
वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि Vitamin D, Serotonin Hormone और जैविक चक्र सब सूर्य पर आधारित हैं।
सूर्य की दिव्य आध्यात्मिक शक्ति
सूर्य केवल रोशनी नहीं देता, बल्कि मन और आत्मा को संतुलित करने वाली तरंगें भी भेजता है।
सूर्योपासना से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है, शरीर का तापमान संतुलित रहता है, और मानसिक स्पष्टता आती है।
सूर्यो जगत्प्रकाशाय तापनाय च देहिनाम्।
भक्त्या स्याद्विनियोगश्च रोगनाशाय नित्यशः॥
अर्थात-सूर्य भगवान का नित्य दर्शन और ध्यान शरीर के रोगों का नाश करता है।
सूर्य शिव की दाहिनी आँख क्यों माने गए?
त्रिदेवों में शिव चेतना के प्रतीक हैं। उनकी दाहिनी आँख सूर्य, बायीं आँख चन्द्र और मध्य में अग्नि का तेज़ माना गया है। यही तीनों आँखें ज्ञान, शांति और शक्ति का प्रतीक हैं। जब सूर्य का तेज़ शिव के ध्यान में उतरता है, तो उसे “ज्ञानाग्नि” कहा जाता है। तभी संतों ने कहा-
एक आँख में सूरज साधा, दूजे में चंद्रमा आधा !
दोनों साख से रख शिव ने इस जग की मर्यादा!!
वैज्ञानिक रहस्य -सूर्य और जीवन का तंत्र-
सूर्य की किरणें क्लोरोफिल में ऊर्जा भरती हैं, जिससे पेड़-पौधे भोजन बनाते हैं। यही ऊर्जा पशु-पक्षी और मनुष्य तक पहुँचती है! यह है सूर्य-परक जीवन-श्रृंखला।
नासा के वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि सौर विकिरण के बिना पृथ्वी 24 घंटे में बर्फ़ का गोला बन जाएगी।
सूर्य साधना का प्रभाव
प्रातःकाल सूर्य की प्रथम किरणों का दर्शन करते हुए !!ॐ घृणिः सूर्याय नमः!! जप करने से मस्तिष्क में पीनियल ग्रंथि सक्रिय होती है, मूड और मेमोरी में सुधार होता है और शरीर की प्रत्येक कोशिका को जीवंत ऊर्जा प्राप्त होती है।
सूर्य और मानव कर्म
सूर्य हमारे कर्मफल के दाता माने जाते हैं। जो व्यक्ति आलस्य, असत्य और अंधकार से भरा जीवन जीता है उसे सूर्य का तेज़ सहन नहीं होता। सूर्य सत्य, अनुशासन और प्रकाश का प्रतीक है।
सूर्ये तपति तपत्येव पापं हन्ति निरंतरम्।
यः स्मरेद्भगवान्सूर्यं तस्य नाशो न विद्यते॥
सूर्य न केवल ग्रह है, न केवल प्रकाश! वह जीव, जगत और जीवन की धड़कन है। आध्यात्मिक साधना और वैज्ञानिक सत्य दोनों एक स्वर में कहते हैं! सूर्य ही आत्मा है! सूर्य ही साक्षी है, सूर्य ही जीवन का परम रहस्य है।
brainkey.in से साभार
प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य शिव की दाहिनी आँख है। हमारे प्रत्येक कर्म-कुकर्म पर सूर्य की सूक्ष्म दृष्टि है। नवग्रहों में सूर्य को राजा कहा गया है। नवग्रहों में सूर्यको प्रथम पद प्राप्त है।

गुरु की अनन्य भक्ति और सेवा समर्पण करने से गुरु पीढ़ियों तक परिवार को समृद्ध बनाये रखता है।
सूर्य से पीड़ित व्यक्ति कुष्ठ रोग, दृष्टिदोष, धनहीन होकर नष्ट हो जाते हैं। जो लोग माता-पिता, गुरु राजा, शासन और और सरकार को हानि पहुंचाते हैं!
TAX यानि कर दी चोरी करते हैं सूर्य उनके वंश का नाश कर देते है। परिवार को सन्ततिहीन बना देते है।
बच्चों को कुत रोग, अन्धक दोष से परेशान करते हैं। सूर्य के ताप, शाप से परेशान पुरुषों को देवल गुरु की आराधना करनी चाहिए।
प्राचीन शास्त्रों, उपनिषदों में उल्लेख आता है कि प्रत्येक वर्ष में के माघ मास में सप्तमी के दिन सूर्य साधना का विशेष महत्व है!
यस्मान्मन्चन्तरादौ तु रथमापुरदिवाकरा:
माघ-मासस्य सप्तम्या तस्मात सा रथ सप्तमी।

अर्थात- माद्य महीने की शुद्ध सप्तमी को जिसे सूर्य सप्तमी, रथ सप्तमी, अचला सप्तमी, महासप्तमी, सप्त सप्तमी जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। यह सूर्योपसना सूर्यव्रत का विशिष्ट पर्व दिन रथ सप्तमी के नाम से वेदों में विख्यात है।
शिव स्वरूप सूर्य में विश्व के सभी अणु विद्यमान हैं या यो कहें कि सूर्य की प्रत्येक अणु पर पूर्ण दृष्टि है।
आप सूर्य कृपा से ही सृष्टि के सब अणु चलायमान है और जो चलायमान है वहीं ईश्वर है इसलिए कहा जाता है कि कण-कए, में भगवान है। भारत के भारतीयों का अटूट विश्वास है कि सभी अणु विश्व + अणु विष्णु स्वरूप है। श्रीविष्णु पालन कर्ता है अर्थात अणु रूप में वह सम्पूर्ण जीव-जगत और कण- कण की रक्षा कर रहे हैं।

विश्व में विष्णु है, तो विस्णु में विश्व है ऐसी शास्त्रोक्त मान्यता है तथा उन अणु रुपी विष्णु को सूर्य ऊर्जा देवू किरणों से रक्षा कर रहे हैं, ताकि श्री हरि विष्णु के पालन करने वाली स्थिति में व्यवधान उत्पन्न न हो।
मानव शरीर भी अति सूक्ष्म, छोटे-छोटे अणुओं से निर्मित है हमारे शरीर में प्रतिदिन लाखों-करोड़ो अणुओं का नित्य नवीन निर्माण और नाश की प्रक्रिया चलती है।
हमारे शरीर के अणु अर्जावान रहे इसलिए प्रातः काल बुम्हमहुर्त में जागने का निवेदन ऋषियों ने किया। प्रातःकाल के सूर्य दर्शन, सूर्य पूजा आदि से हमारे अंदर स्थित अणुओं को बल प्राप्त होता है।
सारहीन, कमजोर अणु का शरीर से निकास होकर नवीन अणुओं का निर्माण होता है। यह वास्तव में शरीर में जीवनीय शक्ति तथा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की कवायद है।
उपनिषद् का !!तमसो मा ज्योर्तिगमय!! यह मंत्र सारे जीव-जगत् चराचर को निर्देशित कर रहा है कि अन्धकार का नाश कर, प्रकाश की और चलें!
अपने अन्दर अणुओं को जाग्रत बनाकर जीवनीय शक्ति को स्थिर रखना ही प्रकाश है। सूर्य हमारी आत्मा है और आत्मा को प्रकाशित करने वाले एक मात्र सूर्य ही है।
गायत्री मन्त्र का मूल सारतत्व भी यही है करोड़ो किरणों से से प्रकाशित हमारी आत्मा शुद्ध -पवित्र हो।
विष्णु स्वरूप ही सम्पूर्ण विश्व विष्णु माना जाता है इसलिए विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र में सर्वप्रथम विश्वविष्णुः में भौतिक रूप से दिखाई देने विश्व साक्षात् विष्णु स्वरूप का ही बोध कराता है।


