- पार्थिव शिवलिंग निर्माण विधि का वर्णन वशिष्ठेश्वर संहिता में मिलता है। महर्षि वशिष्ठ से घनघोर गरीबी मिटाने के लिए पार्थिवाचन का निर्देश दिया है।
अमृतम amrutam पत्रिका, ग्वालियर से साभार
- पार्थिव शिवलिंग बनाने की विधि बहुत सरल भी है और कठिन भी। इसे मिट्टी, मेवा, पुष्प, मक्खन, नारियल गोले से भी बनाया जा सकता है।
- इससे बड़े से बड़े संकट और गरीबी दूर हो जाते हैं। अघोरी साधु नित्य रोज मिट्टी के शिवलिंग बनाकर ही पूजते हैं।
पार्थिवेश्वर पूजन एवं अभिषेक विधि:
- पार्थिव पूजन हेतु पवित्र हो, पूर्वाभिमुख, पूजन सामग्री, पवित्र मिट्टी (गंगाजी की) समीप रखें। स्वयं को एवं सामग्री को गंगा-जल या अपवित्रः पवित्रो वा। मंत्र से पवित्र करें।
- दीप प्रज्जवलित करें। हाथ में अक्षत, फूल लेकर स्वस्त्ययन एवं गणेश जी का स्मरण करें। इसके बाद हाथ में अक्षत, पुष्प, जल एवं द्रव्य लेकर संकल्प करें:-
- अद्य (देश-काल संकीर्तन सहित) अहं मम (अथवाऽमुकयजमानस्य) त्रिविध दोषोपशमनार्थे सकल अरिष्ट ग्रहजन्य दु:ख ध्वंसनपूर्वक भूत-प्रेत, पिशाच – राक्षस, ब्रह्मराक्षस – बेतालादि निवारणार्थे जवरादिजन्य दुःख कृमि दुःख ध्वंसन पूर्वक, सर्वविधव्याधि परिमोक्ष पूर्वक अभीष्ट फल प्रात्यर्थं श्री साम्बसदाशिव प्रीत्यर्थ पार्थिवपूजन सहित एकादश आवृति द्वारा अभिषेकमहं करिष्ये।
- इसके पश्चात पृथ्वी को प्रणाम करके – मृतिका ग्रहण की आज्ञा लें। तत्पश्चात् ॐ ह्वां पृथिव्यै नमः।। ॐहराय नमः कहते हुए एक मुट्ठी मिट्टी गूथें।
- पुनः ॐ महेश्वराय नमः कह कर अंगूठे के बराबर लिंग बना कर, एक छोटी मिट्टी की गोली (वज्र) लिंग के उपर रखें।
- ताम्रपात्र में विल्वपत्र के उपर मिट्टी के बनाए हुए शिवलिंग को रख कर निम्नलिखित मंत्र द्वारा जल गिराते हुए प्राणप्रतिष्ठा करें- ॐ शूलपाणये नमः, हे अघोरेश्वर ! इह प्रतिष्ठितो भव। इसके बाद महादेव या अपने गुरु का ध्यान करें।
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारूचन्द्रावतंसं रत्नाकल्पोज्जवलागं परशुमृगबरा भीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पघ्मासीनं समन्तात् स्तुतमयरगणैर्ण्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिल भयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।
ॐ पिनाक घृषे नमः, श्री साम्बसदाशिव पार्थिवेश्वर!
यहाँ आयें, प्रतिष्ठित हों, संनिहित हों।
आवाहनार्थे पुष्पं समर्पयामि।
आसनार्थे अक्षतं समर्पयामि।
- इसी प्रकार पाद्य, अर्ध्य, आचमनीय जल, मधु, स्नानं जल, पंचामृत स्नान एवं शुद्ध जल समर्पित करने के उपरान्त–शिवलिंग को विल्वपत्र से ढँक कर ११ बार महर्षि वशिष्ट के स्तोत्र से, अभीष्ट सिद्धि हेतु जलध् •अभिषेक करें | यथाः
ॐ विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय,
कर्मामृताय शशिशेखर धारणाय।
कर्पूर कांन्ति धवलाय जटाधाराय,
दारिद्रय दुःख दहनाय नमः शिवाय॥
गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय,
कालांतकाय भुजगाधिपकंकणाय।
गंगाधराय गजराजविमर्दनाय,
दारिद्रय दुःख दहनाय नमः शिवाय।।
भक्तिप्रियाय भवरोग भयावहाय,
उग्राय दुर्गभवसागर तारकाय।
ज्योर्तिमयायगुणनामसुनृत्यकाय,
दारिद्रय दुःख दहनाय नमः शिवाय।
चर्माम्बराय शवभस्म विलेपनाय,
भालेक्षणाय मणिकुण्डलमंडिताय।
मंजीरपादयुगलाय जटाधराय,
दारिद्रय दुःख दहनाय नमः शिवाय।।
पंचननाय फणिराज विभूषणाय,
हेमांशुकाय भुवनत्रय मंडिताय।
आनन्द भूमिवरदाय लभोभयाय,
दारिद्रय दुःख दहनाय नमः शिवाय।।
भानुप्रियाय भवसागरतारणाय,
कालान्तकाय कमलासन पूजिताय।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय,
दारिद्रयदुःख दहनाय नमः शिवा।।
ॐ रामप्रियाय रधुनाथवर प्रदाय,
नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय।
पुण्येषु पुण्य भरिताय सुरार्चिताय,
दारिद्रयदुःख दहनाय नमः शिवाय।।
मुक्तेश्वराय फलदाय गजेश्वराय,
गीतप्रियाय वृषभेश्वर वाहनाय।
मातंगचर्मवसनाय महेश्वराय,
दारिद्रयदुःख दहनाय नमः शिवाय।।
वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं, सर्वरोग निवारणं।
सर्वसंपत्करं शीघ्र पुत्रपौत्रादिवर्धनम्।।
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं सहि स्वर्गभवाप्नुयात्।
- तदुपरान्त पूर्वोक्त क्रम से ही गंधोदक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उपवस्त्र चन्दन, भस्म, अक्षत, पुष्पमाला, विल्वपत्र, दूर्वा, नाना परिमल द्रव्य धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन, ऋतुफल, धतूरफल, ताम्बूल, दक्षिणा के बाद आरती करके जल गिरायें एवं पुष्पाञ्जलिं समर्पित करें।
- इसके उपरान्त नमः शिवाय या अघोरेश्वराय नमः का १०८ बार जाप करकें –
गुध्याति गुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु में देव । त्वत्प्रसादान्महेश्वरः।।
प्रदक्षिणा: यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे- पदे।।
क्षमा प्रार्थना:
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्पू।
जां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरः।।
विसर्जनः
गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ। स्वस्थाने परमेश्वर।
मम पूजां गृहीत्वेमां पुनरागमनाय च।।
ॐ विष्णवे नमः ॐ विष्णवे नमः ॐ विष्णवे नमः।
- अनेन पार्थिवेश्वरपूजनकर्मणां श्रीयज्ञस्वरूप शिवः प्रीयताम्, न मम्। समर्पण के बाद पूजन-सामग्री को गंगा जी में छोड़ दें।
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