तारापीठ को शक्ति से भरने वाले और सिद्धि जागृत करने वाले वामा खेपा, जो मां को अपना झूठा खिलाते थे।

अमृतम पत्रिका, ग्वालियर की प्रस्तुति

  • भारतीय धर्मशास्त्रों के अनुसार ब्रह्माजी के दाएं स्कंध से पुरुष और वाम स्कंध से स्त्री की उत्पत्ति हुई है। यही कारण है कि स्त्री को वामांगी कहा जाता है और विवाह के बाद उसे पति के वाम भाग की ओर बैठाए जाने की परंपरा है।
  • भारत में बहुत कम लोगों का मालूम होगा कि एक सिद्ध अघोरी वामा खेपा के बारे में। अवधूत संप्रदाय में इनका बेहद सम्मान है। क्योरा या गुगल पर भी वामा खेपा जैसे महासिद्ध के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
  • सद्गुरू संतों की यह बात 16 आने सत्य है कि भक्त वश में ही भगवान होते हैं। ऐसे ही अघोरी संत वामा खेपा थे, जो अपनी जूठन मां को खिलाते थे।
  • वामा खेपा की कठौर भक्ति के कारण दुनिया की सर्वश्रेष्ठ तांत्रिक पीठ मां तारा माई इन्हीं के कारण विश्व विख्यात है।
  • हिंदुस्तान की दश महाविधाएं ब्रह्माण्ड प्रसिद्ध हैं। काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला। इन देवियों को दस महाविद्या कहा जाता हैं।
  • 10 महाविद्या का संबंध भगवान शिव की दस इंद्रियों से है। दुर्गा सप्तशती में भगवान श्रीकृष्ण को काली का अवतार बताया है।

महासिद्ध वामा खेपा के अलौकिक चमत्कार

  • वामा खैपा हर काम उल्टे हाथ से करते थे। लिखना, खाना या सभी कार्य बाहें हाथ से करने के कारण गांव में इन्हें वामा के नाम से पुकारते थे।
  • प्रारम्भ से ही बंग प्रदेश यानि आज का बंगाल की पावन धरा वैष्णव संतों, तांत्रिकों और अघोरमार्गी साधकों की रही है।
  • नित्यानन्द महाप्रभु चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, रामप्रसाद, वामा खेपा जैसे साधकों ने अपनी साधना से सम्पूर्ण विश्व को नयी राह दिखाई है।
  • अघोरमार्गी साधकों में वामा खेपा का स्थान सर्वोपरि है। इनका जन्म पश्चिम बंगाल के वीरभूमि जनपद में तारा शक्ति पीठ के निकट आटला ग्राम में संवत् 1891 में आज से लगभग 190 साल पूर्व हुआ था।
  • वीरभूमि जनपद आकार में अत्यन्त छोटा है लेकिन अपने पाँच सती पीठों के लिए सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है। इसके अतिरिक्त शक्ति साधना का महातीर्थ तारापीठ और कल्याणेश्वरी का पवित्र पीठ भी यहीं पर है।
  • तारापीठ पहुँचने के लिए पूर्वी रेल्वे के रामपुर हाट स्टेशन पर उतरकर छोटी मोटर गाड़ी से पहुँचा जाता है। मार्ग की दूरी लगभग पाँच मील है।
  • दारूका नदी को पार करते ही सर्वप्रथम वामा खेपा का समाधि मन्दिर दिखलाई पड़ता है, जो लाल रंग का है। आगे बढ़ने पर माई के विशाल प्रांगण और मन्दिर के दर्शन होते हैं।
  • मां तारामाई के मन्दिर के पास एक मठ में वामा खेपा की मानवाकार शिलामयी प्रतिमा है। वामा अपनी स्वाभाविक मुद्रा में हैं और उनके पार्श्व में ही उनका प्रिय कुत्ता (कालू) बैठा है।
  • मूर्ति अत्यन्त ही चित्ताकर्षक है, देखने के बाद वहाँ से हटने की इच्छा नहीं होती है। आज भी पहले वामा के प्रतिमा रजत के आवरणों से आवृत्त है, केवल स्नान के समय सारे आवरण हटाये जाते हैं।
  • सम्पूर्ण प्रतिमा के अक्षोभ्य भगवान् सर्पाकार होकर लिपटे हुये हैं। शिशु रूप में शंकर भगवान् माई की गोद में वक्षस्थल से क्षीरपान करते दिखाई देते हैं।
  • यथा शक्ति पत्र पुष्प से अर्चन कर भक्त लोग चरणामृत पान करते हैं। चरणामृत का स्वाद कारणमय (शराबयुक्त) होता है।
  • बचपन से ही उन्हें महादेव की उपासना के अलावा उन्हें कुछ नहीं अच्छा लगता था। उन्हीं दिनों तारापीठ के महाशमशान में तंत्रसाधक कैलाशपति और मोक्षदानन्ट आये थे। कैलाशपति ने देखते ही वामा खेपा के अन्दर निहित शक्ति को पहचान लिया।
  • बचपन में वामा खेपा की अभिरुचि अध्ययन में नहीं थी। देवी-देवताओं की प्रतिमा बनाकर खेलने में लगे रहते थे।
  • जब जिस देवता का त्यौहार आता तब उसी देवता की प्रतिमा बनाकर अपने साथियों के साथ धूप, दीप, नैवेद्यादि से पूजन करते थे।
  • यह देखकर धर्मनिष्ठ पिता प्रसन्न होते और उन्हें शाबासी देते थे किन्तु पिता की स्नेहिल छाया बहुत जल्द उपर से उठ गई और परिवार का पूर्णभार इनके कंधों पर आ गिरा।
  • परिवार के सामने आई समस्या को देखकर उनकी माँ ने कहा कि यदि कमाओगे नहीं, तो घर के इतने लोग क्या खाकर जीवित रहेंगे। इन्होंने उत्तर दिया कि माँ तारा के रहते क्या कोई भूखा रह सकता है? जिन्होंने जन्म दिया है, वे ही खाना भी देंगी। उन्हीं माँ को पुकारो | वही अन्न और वस्त्र देंगी।
  • वामा खेपा श्री तारा माँ के दर्शन हेतु जाते थे और उन्हीं का नाम जप किया करते थे। जब कभी पारिवारिक समस्याओं से व्याकुल होते, सीधे माँ के पास जाते और कहते माँ तारे! तुम तो सबका दुःख दूर करती हो, क्या हमारा दुःख दूर नहीं करोगी।
  • बस, चमत्कार हो जाता। माँ के पास से लौटकर जब तक वे घर आते. परिवार के सम्मुख आई समस्या का समाधान हो जाता।
  • ग्रहर्निश माँ तारा, माँ तारा मंत्र जपा करते थे और माँ का दर्शन किया करते थे। सांसारिक चिन्ता उन्हें बिल्कुल नहीं थी। जब वे विवाह योग्य हो गये, उनकी माँ ने कहा तुम काम-धाम खोजो, कब तक ऐसे रहोगे।
  • माता की इस बात को सुनकर उन्होंने निश्चय किया कि अब कुछ काम-धाम करना चाहिये। माँ की इच्छा से एक मन्दिर में नौकरी मिल गई किन्तु कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी कारण कि उन्होंने मन्दिर के पुजारी में वास्तविक श्रद्धा का अभाव देखा।
  • बाल्यावस्था में उन्हें साधु-संतों का अभिनय अत्यन्त प्रिय था। रामकृष्ण परमहंस का अभिनय वे हमेशा ही करते थे। इस असार संसार में तारा मन्दिर के अतिरिक्त कुछ भी अच्छा नहीं लगता था।
  • एक दिन अचानक उनकी माँ का देहान्त हो गया। तारापुर द्वारका नदी के उस पार था, जहाँ वे स्वयं रहा करते थे। उन्हें माँ की मृत्यु का पता तब चला जब द्वारका नदी के तट पर लोग उनका शव लेकर आए।
  • वामा खेपा मां के अन्तिम दर्शन के लिए व्याकुल हो उठे। उस समय नदी वेगवती थी और ऊँची-ऊँची लहरें उठ रही थीं। माँ तारा का नाम लेकर वे उफनती नदी में कूद पड़े। लोग अवाक् रह गये।
  • माँ तारा के पुत्र उस पार पहुँच गये। तारापीठ के महाशमशान में चिता सजाकर अग्नि लगा दी गई और जलती हुई चिता के सामने नाचने लगे। वहाँ उपस्थित जन समुदाय भी भाव विह्वल होकर नाचने लगे।
  • माँ के श्राद्ध के तीन दिन पूर्व वामा खेपा घर पहुँचे और अपने छोटे भाई श्री रामचन्द्र से कहा कि आस-पास के गाँवों के सभी ब्राह्मणों को निमंत्रण दे आओ, देखना एक भी ब्राह्मण छूटने न पाये। उनकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कारण कि घर में किसी वस्तु का प्रबन्ध नहीं था।
  • खेपा बाबा सभी ब्राह्मणों को ब्राह्मण भूखे रह जायेंगे? तुम तो माँ हो, मेरी बात कभी नहीं टालती। उनका इतना कहना था कि वर्षा बन्द हो गई।
  • सम्पूर्ण वातावरण वामा खेपा और माँ तारा की जय-जयकार से गूंज उठा। निमंत्रण दे आये। श्राद्ध के दिन प्रातः काल से ही न जाने कहाँ से सामान आने लगा। सारा घर घी, आटा, सब्जी आदि से परिपूर्ण हो गया।
  • सभी लोग यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये। सभी ब्राह्मणों के लिए भोजन बनकर तैयार हो गया। जब ब्राह्मण भोजन का समय आया तो अचानक वर्षा प्रारंभ हो गई। सभी लोग घबरा गये कि कहीं मूसलाधार वर्षा हुई तो सारा आयोजन ही समाप्त हो जायेगा। वामा खेपा ने आकाश की ओर देखा और बोले माँ! क्या इतना भी दया नहीं करेगी। तेरा ही, तो भोज है।
  • एक बार जीवन से निराश एक व्यक्ति बाबा के सन्निकट आया। चिकित्सकों ने उसे जवाब दे दिया था। उसके जीने की सम्भावना नहीं थी। वह इनके चरणों पर गिर पड़ा। उन्होंने उसे उठाया और उसकी पीठ पर तीन घूंसे मारकर कहा जा बेटा, दूर हो। बस उसी क्षण उसका असाध्य रोग समाप्त हो गया।
  • वामा खेपा बचपन में एक पुआल के ढेर पर बैठे रहते थे कि अचानक पुआल में आग लग गई। आग बुझाने के लिए जो लोग दौड़े, उन्होंने देखा कि वामा खेपा जलते हुये ढ़ेर के ऊपर बैठे हैं।
  • एक नि:संतान और विधवा युवती मा खेपा को खीर खाने को दी। उसे उन्होंने आशीर्वाद दिया माँ तुम्हें धन और पुत्र की प्राप्ति हो। यह सुनकर वह युवती रो उठी क्योंकि वह विधवा थी। वामा खेपा पुत्र होगा। तुम्हें एक नहीं अनेक पुत्र प्राप्त होंगे। ने कहा माँ रोओं मत। मेरा आशीर्वाद सत्य वाक् सिद्ध वामा खेपा की बात सिद्ध हुई। कालान्तर में उस युवती से एक धनी व्यापारी ने विवाह कर लिया और वह सम्पन्न होने के साथ-साथ पुत्रवती भी हो गई।
  • एक बार की बात है कि किसी क्ति को एक सिद्ध पुरुष ने बतलाया कि विशेले नाग के काटने से सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु जायेगी। वह व्यक्ति अपने प्राणों की रक्षा के लिए खेपा बाबा की शरण में आया।
  • बाबा ने भूमि पर गोलाकार रेखा खींची और उसे उसके अन्दर ही रहकर माँ तारा को पुकारने का परामर्श दिया। आधी रात में अचानक एक साँप वहाँ पहुँचा। उसने उस व्यक्ति को डस लिया और उसकी मृत्यु हो गई। यह देखकर वामा खेपा ने माँ तारा के सामने गिरकर प्रार्थना की और वह व्यक्ति जीवित हो उठा।
  • वामा खेपा के गुरु कैलाशपति वामा खेपा के भी सिद्ध साधक थे। नदी की धारा पर खड़ाऊँ पहन हुये वे चला करते थे।
  • एक बार एक तुलसी के पौधे को देखते हुये उन्होंने वामा खेपा से पूछा- यह पौधा जीवित है मृत।
  • वामा ने उत्तर दिया! गुरुजी यह, तो सुखा है। इसे में हुआ ही कहेंगे। बाबा ने समझाया- बेटा, जीवन और मृत्यु एक ही है। देखो इतना कहकर उन्होंने अपने कमण्डल से जल लेकर उस सूखे पौधे पर छिड़क दिया और वह पौधा हरा हो गया।
  • कैलाशपति के तारापीठ से चले जाने के बाद तारापीठ की पूजा का दायित्व वामा खेपा पर आ गया। वे पूजापाठ के विधानों से अनभिज्ञ थे।
  • मंत्र पाठ, – भू शुद्धि, आचमन, प्राणायाम से कोसों दूर थे। वे माँ के प्रसाद अर्पण करते वक्त कहते, ले माँ, ले इसे खा ले। भोग सामग्री को वे स्वयं चखकर माँ की प्रतिमा के सामने चिल्लाते, ले माँ, ले खा ले।
  • तारा माँ को अपने पागल बेटे की यह क्रिया कलाप अत्यन्त ही अच्छी लगती थी। वह तुरन्त अपनी लपलपाती जिह्वा निकालकर प्रसाद खा जाती।
  • अगर कभी माँ प्रसाद ग्रहण नहीं करती तो उसकी खैरियत नहीं रहती थी। खेपा बाबा क्रोधित होकर उन पर हाथ तक चला देते।
  • एक दिन तो विचित्र घटना घटी। खेपा बाबा के आग्रह और मारने पीटने पर जब उस दिन माँ ने प्रसाद ग्रहण नहीं किया तो नाराज होकर खेपा बाबा ने प्रतिमा पर पेशाब कर दिया। इस घटना की प्रतिक्रिया में वहाँ के पुजारियों ने जमकर उनकी पिटाई कर दी।
  • खेपा बाबा ने कहा “अपनी माँ की गोद में मैंने पेशाब किया तो इसमें बुरा क्या किया। इस दुनिया में भला ऐसा भी कोई है जिसने अपनी माँ की गोद में पेशाब न किया हो।”
  • खेपा बाबा की यह बात किसी को समझ में न आई। वे मन्दिर छोड़कर कहने लगे कि अब वह जिन्दगी भर माँ शमशान में एक वृक्ष के नीचे लेट गये और तारा की पूजा नहीं करेंगे। तीन दिनों तक वे शमशान में पड़े रहे। तीसरे दिन उन्हें आभास हुआ कि कोई उनके शरीर को सहला रही है। उसके बाद शरीर पर पड़े निशान गायब हो गये और शारीरिक वेदना समाप्त हो गई।
  • उस रात नाहौर की महारानी को स्वप्न हुआ कि मैं तीन दिनों से भूखी-प्यासी हूँ। तुम्हारे पुजारियों ने मेरे लाड़ले वामा खेपा को पीटा है और उसकी चोट मुझे सहनी पड़ी है। मैं अब तारापीठ छोड़ कर चली जाऊँगी।
  • महारानी की नींद टूटी। उन्होंने कठोर आदेश देकर अपने प्रतिनिधि को तारापीठ भेजा। राज्य के प्रतिनिधि ने तारापीठ पहुँचकर सारी बातें दरियाफ्त कीं।
  • खेपा बाबा द्वारा माँ के विग्रह पर पेशाब करने की बात उन्हें बताई गई। उन लोगों ने वामा खेपा को खोजने का आदेश दिया और महारानी के आदेश से लोगों को वाकिफ करा दिया गया कि तारा माँ की पूजा खेपा बाबा के अतिरिक्त कोई नहीं करेगा।
  • उनकी पूजा में किसी को हस्तक्षेप करने का आदेश नहीं है। इसके साथ ही माँ के भोग के पहले खेपा बाबा के भोग का आदेश सुनाया गया। आज भी तारापीठ में पहले वामा खेपा को भोग दिया जाता है, इसके बाद माँ तारा को भोग लगाया जाता है।
  • एक दिन अचानक नाहौर के महाराज अस्वस्थ हो गये। महारानी को विश्वास था कि अगर खेपा बाबा चाह गये तो महाराज अवश्य ही स्वस्थ हो जायेंगे।
  • खेपा बाबा अपने चेलों के साथ नाहौर रवाना हुये। चेलों ने राजमहल से मिलने वाले पुरस्कार के लोभ में खेपा बाबा को पटाना शुरू कर दिया कि वहाँ खेपा बाबा कह दें कि महाराज स्वस्थ हो जायेंगे।
  • खेपा बाबा ने कहा कि आप लोग समय पर यह बात स्मरण दिला देंगे। सभी लोग नाहौर पहुँचे। महारानी ने खेपा बाबा की काफी आवभगत की। जब महारानी ने महाराज के स्वास्थ्य के विषय में पूछा, तो वे सिर खुजलाने लगे और उनके मुँह से निकल गया ‘फट्ट’। तीन दिनों के बाद महाराज ने शरीर त्याग दिया।
  • जब उनके शिष्यों ने खेपा बाबा से पूछा तो वह बोले कि मैं क्या करता। बड़ी माँ ने कहा, कह दे फट्ट। मैंने वही कहा ।
  • खेपा बाबा का परम शिष्य नंदघड़ी था। उसके दोनों हाथों में कुष्ठ हो गया था। वह खेपा बाबा की सेवा तो करता ही था, उनके अट्ठारह कुत्तों के लिए भोजन-पानी का प्रबन्ध भी करता था।
  • अचानक उसका कुष्ठ रोग बढ़ गया और चार-पाँच दिनों तक बाबा के पास नहीं आया। खेपा बाबा ने उसे बुलवा भेजा और उसे फटकारते हुये कहा साला पाप करेगा तू और दण्ड भोगेंगे। हम जैसा कुकर्म किया, तुझे वैसा ही फल मिलेगा।
  • तुम्हारे दोनों हाथ कुष्ठ रोग से गलकर गिर जायेंगे। खेपा बाबा की बात सुनकर नंदघड़ी फूट-फूटकर रोने लगा। खेपा बाबा का क्रोध शान्त हो गया और तब वे कहने लगे, अब गलत काम मत करना, तू ठीक हो जायेगा। बहुत जल्दी ही वह ठीक हो गया। तू
  • एक बार तारापीठ और उसके इलाके में भयंकर अकाल पड़ गया। सभी लोग त्राहि-त्राहि करते खेपा बाबा के पास पहुँचे और कहने लगे बाबा पानी के अभाव में तारा माँ के राज्य में अकाल पड़ गया है।
  • माँ तारा के रहते क्या हम लोग भूखे मर जायेंगे । आप ही कोई उपाय करो बाबा । खेपा बाबा ने उनकी बातें सुन लीं। वे तारा माँ को बोले “राक्षसी लपलपाती जीभ निकालकर दोनों बेला चावल और केले का भोग खा रही है और इधर तेरे बच्चे अकाल में काल के गाल में चले जा रहे हैं?
  • ठहर आज मैं तेरे सिर पर बिजली गिराता हूँ। कुछ क्षणों के बाद आकाश में बादल छा गये। जोरों की वर्षा शुरू हो गई तथा आसमान में बादलों के बीच कड़-कड़ की भयंकर आवाज होने लगी और मंदिर कंगूरे पर बिजली आ गिरी के और कंगूरा गिरकर चूर-चूर हो गया।
  • इसके बाद खेपा बाबा तारा माँ की प्रतिमा के चरणों पर गिरकर रोने लगे “क्षमा करो माँ, मुझे क्षमा करो। तुम्हारे ही भूखे प्यासे बेटों का कष्ट न सह पाने के कारण मैं यह करने के लिए विवश था।”
  • एक दिन खेपा बाबा को नित्यानन्द महाप्रभु के अखाड़ा में वैष्णव भक्तो के साथ भोजन का निमंत्रण प्राप्त हुआ।
  • खेपा बाबा का मुख्य आहार मांस था। वैष्णव संतों के बीच इस बात को लेकर विशेष चर्चा थी कि खेपा बाबा का आहार वैष्णव सम्प्रदाय में कैसे प्राप्त होगा।
  • खेपा बाबा वैष्णव संतों के साथ खाने के लिए बैठे। शाकाहारी व्यंजनों के साथ बाबा परम तृप्ति के साथ आलू बुखारा चबा रहे थे, तब उनके एक शिष्य ने पूछा इतनी तृप्ति के साथ क्या चबा रहे हैं आप?
  • खेपा बाबा ने मुस्कराकर कहा “मैं बकरे की टाँग चबा रहा हूँ।” इसके बाद ही बाबा ने उपस्थित लोगों को बकरे की टाँग दिखाई। वैष्णवों ने यह दृश्य देखकर अपनी आँखें मूंद लीं और सोचने लगे कि पंक्ति में से उठ जायें या बैठे रहें।
  • खेपा बाबा को अपने कृत्य का संकट समझ में आ गया और वे शीघ्र ही टाँग निगल गये और लोगों को सुनाते हुये बोले, “कहाँ है रे बकरे की टाँग ? यह देख आलू बुखारा खा रहा हूँ।” वहाँ उपस्थित वैष्णव भक्त बाबा की विलक्षण शक्ति को देखकर मुग्ध हो गये।”
  • महा शमशान में खेपा बाबा अपने बी18 प्रिय कुत्तों के साथ रहते थे। वे अपनी थाली में ही उन्हें खिलाते भी थे। कभीकभी कुत्ते शमशान से मुर्दे की हड्डी लाकर उनके भोजन में मिला देते थे। खेपा बाबा को इन बातों की तनिक भी चिन्ता न थी।
  • एक बार कुछ लोग यही देखने आ थे कि खेपा बाबा इन कुत्तों के साथ कि प्रकार भोजन करते हैं। खेपा बाबा के कह पर लोगों ने जब उन कुत्तों की ओर देख तो पाया कि वहाँ कुत्ते नहीं साधक बैठे है इसके बाद लोगों ने एक दूसरे की ओ देखा तो पाया कि वे सभी मनुष्य से कु हो गये। खेपा बाबा के चमत्कार देखक सभी लोग वहाँ से चल दिये।
  • दरभंगा नरेश वामा खेपा के दर्शनार्थ तारापीठ पहुँचे सुनकर वामा खेपा बोले- यह कैसी बात। मैं शमशान का भिखारी, साधारण मनुष्य, मेरे यहाँ राजामहाराजा का क्या काम ? अब मुझे स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना होगा। दरभंगा नरेश को मालूम हुआ तो वे अपनी राजसी पोशाक उतारकर सामान्य वेश में बाबा की सेवा में प्रस्तुत हुये । वामा खेपा प्रसन्न हुये और उन्हें आशीर्वाद दिया। उनके आशीर्वाद से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई ।
  • सम्वत् 1968 के श्रावण मास की द्वितीया तिथि थी। सुबह से ही आकाश में बादल छाये हुये थे। अपराह्न में वर्षा शुरू हो गई।
  • खेपा बाबा ने अपने प्रिय शिष्यों से कहा “तुम लोग मुझे इस सिंहासन पर बिठा दो। बड़ी माँ, मुझे बुला रही है । ” सभी लोगों ने सिंहासन पर बिठा दिया।
  • खेपा बाबा उस समय ध्यानस्थ हो गये। उनकी ओंठ बीच-बीच में काँप रही थीं और वे माँ तारा, माँ तारा महामंत्र का जप कर रहे थे। इसके बाद उनकी समाधि लग गई।
  • तारा माँ के मन्दिर में उस समय आरती चल रही थी। अचानक पुरोहित के हाथ से प्रदीप छूटकर जमीन पर गिर पड़ा।
  • घंटा और शंख की ध्वनि बन्द हो गई। मन्दिर से सभी लोग निकलकर सिंहासन की ओर दौड़ पड़े। खेपा बाबा उस समय पूर्णतः ध्यानस्थ।ऐसे थे दिव्य गुण सम्पन्न महाराद्ध वामा खेपा।

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2 responses to “तारापीठ को शक्ति से भरने वाले और सिद्धि जागृत करने वाले वामा खेपा, जो मां को अपना झूठा खिलाते थे।”

  1. Bhupendra Karn avatar
    Bhupendra Karn

    Mujhe case on delivery par prodact ki aavshyakta hai

    1. patrika avatar
      patrika

      Amazon se aap purchase kar sakte hai

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