हजारों साल पुरानी आस, मुकुट देखना हो, तो कभी तिरुपति के म्यूजियम जरूर जाएं !!
कभी तिरुपति बालाजी के दर्शन करने जाएं, तो वहां के संग्रहालय का अवलोकन करना न भूले।
विजयनगर साम्राज्य आज का हम्पी शहर, जो कर्नाटक राज्य का बहुत ही वैभव शाली राज्य था।
यहां के राजा चक्रवर्ती के रूप में १६वीं शताब्दी में श्रीकृष्णदेवराय ने सात बार तिरुमल का दर्शन किया।
हर बार कई बहुमूल्य आभूषण स्वामीजी को अर्पित किया। लगभग ३० से ज्यादा अपूर्व आभूषणों को हीरों के मुकुट के साथ अर्पित करने की बात आलय के शिलालेखों से ज्ञात होती है।
श्रीकृष्णदेवराय के साथ उनकी दो रानियाँ, पुरोहित रंगदीक्षितुल शिवदीक्षितुलु, नित्यसेवक मल्लरसु, शासन लेखक श्रीपति साथ रहते थे।
राजा के द्वारा समर्पित किये गए प्रभावलि मुकुट, तलवार आदि मंदिर में ही रहे, केवल एक अपूर्व धूपघण्टी एस.वी.म्यूजियम में (संग्रहालय) प्रदर्शित की जा रही है।
इस धूपघण्टी पर स्वयं श्रीकृष्णदेवराय ने धूपघण्टी को तिरुमल श्रीवेंकटेश्वरस्वामी मंदिर में स्थित पूजारी श्रीदेशाय बोल्लित्तु जी के नाम लिखवाया था। सन् १५२४ में धूपघण्टा मंदिर तक पहुँचा।
एस.वी.म्यूजियम (संग्रहालय) की एक और कुतूहलजनक इतिहास श्रीकलम वराहस्वामी का ‘ताम्रशासन’ है। तिरुमल के वराहस्वामी मंदिर में पाया गया यह ताम्र शासन बहुत प्राचीन शासन है। हाल ही में यह शासन एस. वी. म्यूजियम को प्रदान की गई है।
इस शासन पर अंकित अक्षर समूहों का अनुवाद करने के लिए, इस शासन का काल-निर्णय करने के लिए संग्रहालय (म्यूजियम ) के चालकदल जाँच कर रही हैं। फिर भी भक्तों के संदर्शनार्थ इस वराहस्वामी के ताम्रशासन को तिरुमल एस. वी. म्यूजियम में प्रदर्शन के लिए रखा हुआ है।
इन्हीं के साथ एक नमूना मुकुट को भी प्रदर्शन में है। इस मुकुट को ‘स्वर्णमुकुट’ के निर्माण में जो कारीगरी प्रयुक्त की गई हैं, उसके नमूने क प्रस्तुत होता है।
एक इमारत का निर्माण करने के लिए जैसे एक छोटा नमूना तैयार करते है, वैसे ही यह मुकुट एक महान आभूषण बनाने से पहले तांबे (धातु) से निर्मित नमूना है।
सबसे पहले तिरुमल के संग्रहालय में वैकुष्ट एकादशी के दिन से इस मुकुट का प्रदर्शन के लिए रखा गया।
ये तीन अपूर्व ऐतिहासिक वस्तुएँ एस. वी. म्यूजियम में स्थान ग्रहण किए। भक्तलोग इनके दर्शन से आनंद का अनुभव पा सकते हैं। संग्रहालय में स्थित और भी वस्तुवावशेषों को जानने के लिए amrutam सर्च करें
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