सत्य असत्य में क्या अंतर है ?

  • नकारात्मकता भले ही कितनी तेजी से फेले। लेकिन सकरात्मकता के आगे टिक नहीं सकती। क्योंकि निगेटिव चीज का आधार नहीं है।
  • असत्य और निगेटिव चीज को लम्बे समय तक रखा नहीं जा सकता। जैसे आप पकाने में अधिक से अधिक 10 या 15 मिनिट ही रुक सके हैं। लेकिन मंदिर में 10 से 15 घंटे तक।

ॐ असतो मा सद्गमय।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्मामृतं गमय॥

ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः।। – बृहदारण्यकोपनिषद्

  • मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।
  • वेद से गुंजित सत्य से साधा हुआ यह स्तुति दर्शाता यह पवमान मन्त्र या पवमान अभयारोह बृहदारण्यक उपनिषद में विद्यमान एक मन्त्र है। यह मन्त्र मूलतः सोम यज्ञ की स्तुति में सत्य की शक्ति के आव्हान के लिए यजमान द्वारा गाया जाता था।
  • जिनका आधार नहीं होता, वे तेजी से फेलकार विदा या नष्ट भी हो जाती हैं। तभी, तो शिवजी के लिए लिखा गया सत्यम शिवम सुंदरम।
  • जहां सत्य या स्क्रातमकता है वही सत्य है और जिस स्थान पर सत्य है, वही शिव का निवास है। इसीलिए शिव मंदिर में सुंदरता और शांति का अहसास होता है।
  • निगेटिव सोच वाले लोगों के जीवन में कोई हलचल, सफलता या उन्नति नहीं देखी जाती।

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्याऽभ्यासेन रक्ष्यते।
मृज्यया रक्ष्यते रुपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते।।

  • अर्थात धर्म का रक्षण सत्य से, विद्या का अभ्यास से, रुप का सफाई से, और कुल का रक्षण आचरण करने से होता है।

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वायवो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम।।

  • अर्थ : सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलता है, सब सत्य पर आधारित है।

नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम् ।
न हि तीव्रतरं किञ्चिदनृतादिह विद्यते।।

  • भावार्थ : सत्य जैसा अन्य धर्म नहीं । सत्य से पर कुछ नहीं । असत्य से ज्यादा तीव्रतर कुछ नहीं।

सत्यमेव व्रतं यस्य दया दीनेषु सर्वदा ।
कामक्रोधौ वशे यस्य स साधुः – कथ्यते बुधैः।।

  • ‘केवल सत्य’ ऐसा जिसका व्रत है, जो सदा दीन की सेवा करता है, काम-क्रोध जिसके वश में है, उसी को ज्ञानी लोग ‘साधु’ कहते हैं

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