- फाँसी की सज़ा अमल होने से २-४ दिनों पहले, जल्लाद को जेल आना पड़ता है। वहां, वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में उन्हें फाँसी का अभ्यास करना पड़ता है। इसमें उन्हें फंदे और तख्ते की जाँच करनी होती है ताकि फाँसी देते समय कोई अड़चन नहीं आए।
जल्लाद कैदी के कान में क्या कहता है?
- भारत के प्रसिद्ध और अनुभवी जल्लाद, नाटा मालिक ने एक पत्रकार वार्ता में यह बात कहीं थीं कि वे अपराधी के गले में फांसी का फंदा डालने से पहले उसके कान में कहते हैं कि वे सिर्फ कानून का पालन कर रहे हैं। मुझे क्षमा करना।
ये हैं नाटा मलिक जल्लाद
फंदे की तैयारी
- फांसी देने से पूर्व जल्लाद, फंदे पर आरोपी के वज़न से डेढ़ गुना ज़्यादा वज़न का पुतला रेत की बोरी का बनाकर अनेक बार अभ्यास करता है।
- फाँसी का फंदा मनीला रस्सी का बनाया जाता है, जो भारत में केवल बक्सर जेल में बनता है।
- फांसी की रस्सी या फंदे को चिकना बनाने के लिए, उस पर घी और पका हुआ केला लगाया जाता है ताकि वह आरोपी को कम से कम तकलीफ़ दे।
- फांसी देने का समय|
- आमतौर पर, फाँसी सुबह ५:३० से ७:३० के बीच दी जाती है। क्योंकि उस समय ज़्यादातर जेल के अन्य आरोपी अपने अपने कारावास में होते हैं। इस दौरान, आरोपियों को अपने कारावास से बाहर जाने की अनुमति नहीं होती है और ना ही किसी को जेल के अंदर आने की अनुमति होती है। पूरे जेल में कर्फ्यू का माहौल होता है।
- लगभग ३:३० बजे आरोपी को जगाकर, उसका हालचाल पूछा जाता है।
- तभी जेल अध्यक्ष, मजिस्ट्रेट, जेलर उसके कैदखाने में आकर, न्यायालय द्वारा उसकी सज़ा का फरमान सुनाते हैं।
- इसके बाद, आरोपी को सिपाहियों की निगरानी में नहाने को कहा जाता है और उसे नए, काले कपड़े पहनने के लिए दीए जाते हैं।
- इसके बाद, उसे चाय नाश्ते के लिए पूछा जाता है।चाय नाश्ते के बाद, आरोपी से उसकी आखरी इच्छा पूछी जाती है या उसे उसकी वसीयत बनाने के लिए कुछ समय दिया जाता है।
- इसके बाद, उसे कुछ समय अपने ईश्वर को याद करने के लिए दिया जाता है। यदि आरोपी की इच्छा हो, तो उसके धर्म के ज्ञानी व्यक्ति को उसके धर्म के ग्रंथ में से उपदेश पढ़कर सुनाते हैं।
- फाँसी के निर्धारित समय से कुछ समय पहले, अपराधी के हाथों को उसकी पीठ पीछे हथकड़ियों से बांधे जाते हैं और उसके सर के ऊपर काली टोपी पहनाई जाती है ताकि वह आगे की गतिविधियों को ना देख सकें।
- इसके बाद, जेल अधयक्ष के साथ कुछ सिपाही आते हैं और आरोपी को उसके कारावास से फाँसी दिए जाने वाले स्थान पर ले जाया जाता है, जो लगभग १०० गज की दूरी पर होता है।
- फाँसी स्थान पर जल्लाद के अलावा जेलर, जेल अध्यक्ष, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, डॉक्टर, सफाई कर्मचारी और १० सिपाही मौजूद होते हैं।
- फाँसी देने का तख्ता एक १० फ़ीट ऊँचे चबूतरे पर बनाया जाता है। आमतौर पर, तख्ते की दाईं ओर एक लीवर होता है, जिसके खींचने पर, आरोपी के पैर के नीचे के तख़्ते को हटाकर, आरोपी को लटका देता है।
- तख़्ते पर खड़े होने के बाद, आरोपी की हथकड़ियों को निकालकर, उसके हाथ और पैर दोनों को बांधा जाता है।
- हाथ-पैर बांधने के बाद, आरोपी के गले में फंदा लगाया जाता है। फंदे को गले पर, आरोपी के दायिने कान की ओर, फंदे की गाँठ को बिठाया जाता है।
- न्यायालय के निर्धारित समय पर, जेलर अपने हाथ में रखे सफेद रूमाल को नीचे गिराता है, जो जल्लाद के लिए लीवर खींचने का निर्देश है।
- यहाँ, जल्लाद को लीवर बड़ी सफाई से खींचना पड़ता है क्योंकि यदि तख्ता ज़ोर से अलग हो गया तो आरोपी की दर्दनाक मृत्यु हो सकती है या फिर उसकी गर्दन उसके शरीर से भी अलग हो सकती है।
- इस प्रतिक्रिया के १५ मिनटों बाद, डॉक्टर जाकर आरोपी को जांचकर, उसे मृत घोषित करते हैं।
- लगभग ४० मिनटों बाद, आरोपी के पार्थिव शरीर को फंदे से नीचे उतारा जाता है और उसे पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाता है।
- पोस्टमार्टम के बाद, पार्थिव शरीर को परिवार के हवाले किया जाता है। यदि परिवार वालें शरीर को स्वीकारते नहीं है, शरीर का अंतिम संस्कार, आरोपी के धर्म संस्थान को दिया जाता है या फिर जेल अधिकारी उसे सम्मानपूर्वक उसका अंतिम संस्कार करते हैं।
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- आरोपी को उसके कारावास से बाहर निकाले जाने से उसके पार्थिव शरीर को फंदे से उतारने तक, फाँसी स्थान पर कोई किसी से बातचीत नहीं करता। यदि कोई भी बातचीत करनी भी हो तो वह इशारों में होती है।
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