- प्राचीन सूत्र है- जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन। मन का अन्न से सघन सम्बन्ध है।
- अमृतम पत्रिका, amrutam ग्वालियर से साभार यह लेख महादेव के अत्यंत ज्ञान विज्ञान से भरपूर है।
- ईश्वरोउपनिषद के अनुसार तन को अन्न ही चलाता है और मस्तिष्क, मन से चलता है।
- पंचमहाभूतों में से एक गगन के कारण ही अन्न उतपन्न होता है। पुराने समय के लोग अन्न से सम्पन्न हिने के कारण धनी माने जाते थे।
- दुनिया में कितने लोगों को समझ में आता होगा कि अन्न के हर दाने से एक जीव हमारे शरीर में जा रहा है।
- ब्रह्माण्ड में भी सात महासागर हैं। ‘यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे’ का नियम सर्वत्र लागू होता है।
- सम्वत्सर में पृथ्वी भ्रमण करते हुए चार महासागरों से गुजरती है –
- दधि सागर,
- घृत सागर,
- मधु सागर और
- अमृत सागर। उन चारों महासागरों का प्रभाव हमारे अन्न पर पड़ता है।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।
(गीता 3.14 )
- इस श्लोक में सृष्टि का गहरा विज्ञान निहित है। यह जीव के पृथ्वी पर अवतरण का श्लोक है।
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अन्नाद्भवन्ति भूतानि यानी अन्न से भूत (प्राणी) उत्पन्न होते हैं। जैसे मेरे अध्यात्म के चार अंग- शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा हैं। उसी तरह अन के भी चार अंग होने चाहिए। तभी वह मेरे शरीर को, मेरे अध्यात्म को या मेरे अधिभूत को पुष्ट करता है, अन्यथा नहीं कर पाएगा।
- उस अत्र को पुष्ट करने वाले जो तत्व हैं, प्रकृति में, उनके भी चार ही रूप होने चाहिए। गेहूं के खेत में किसान से पूछें कि गेहूं का यह दाना पका है या नहीं? तो, उसका उत्तर होगा कि इसमें जीव पड़ गया, अब हम इसको काट सकते हैं, खा सकते हैं।
- दधि, घृत, मधु और अमृत इन चारों तत्त्वों का सम्बन्ध क्रमशः शरीर, स्नेहन, मिठास और रस से है। इसी तरह अन्न में भी चारों तत्त्वों मौजूद रहते हैं।
- गेहूं को पीसेंगे तो उसका चापड़ (छिलका) निकलता है, वह दधि भाग है। जब आंटे को गूंधते हैं तो उसमें जो स्नेहन या लोच आ रहा है, वो उसका घृत भाग है।
- गेहूं में जो मिठास है, वह मधु भाग है। गेहूं का जो रस भाग है, उसको हम अमृत कहते हैं। रसो वै सः। रस ब्रह्म का पर्याय है अर्थात अन्न ही रस को हमारे शरीर में ला रहा है।
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अन्न से शरीर के सात धातु बनते हैं।
- रस,
- रक्त,
- मांस,
- मेद,
- अस्थि
- मज्जा और
- शुक्र बनते हैं।
- शुक्र सोम है। वृषा है। वो बीज (शुक्राणु) को संरक्षित रखने का कार्य करता है। शोणित (रज) आग्नेय है, योषा है।
- शुक्र (पुंभ्रूण) योषा के महःलोक में जाकर आहूत होता है। अर्थात् ब्रह्म अन्न के माध्यम से सम्पूर्ण चौरासी लाख योनियों में व्याप्त है। शरीर में जीव प्रवेश करता है।
- शरीर की समाप्ति के बाद जीव वहां से निकल कर चला जाता है। उसके आगे शरीर की उपयोगिता जीव के लिए नहीं है।
- वह कपड़ों के जैसे शरीर बदल लेता है। गीता भी कहती है
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय,
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा,
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।। (श्रीमद्भागवत 2.22)
- तब, शरीर का रिश्ता, जीव के साथ क्या बना? केवल यात्रा मार्ग वाला ही हो गया। सारे लोकों को अगर हम अन्न के साथ जोड़ते चले जाएंगे, तो हमारे अध्यात्म का अन्न, हमारे अधिभूत का अन्न और हमारे अधिदेव का अन्न मिलकर एक सूत्र से जुड़े दिखाई देंगे।
- हम अनुष्ठान करते हैं, देवताओं का मंत्रों से आह्वान करते हैं। भोग सामग्री अर्पित करते हैं कि आप यह अन्न ग्रहण कीजिए।
- श्रीमद्भागवत गीता कह रही है कि अन्न से हम देवताओं को तृप्त करें, तो वे हमको.
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
- अभिप्राय यह है कि सृष्टि अन्न के आदान-प्रदान पर ही आगे बढ़ती है और व्यवस्थित चलती है। अगर हम देवताओं को अन्न अर्पित नहीं करेंगे, तो उनको उपवास करना पड़ेगा। असुर ही पुष्ट होंगे।
- कलयुग में आज अन्न की परिभाषा पूरी तरह बदल गई है। कोई भी रामकथा वाचक या भागवताचार्य अन्न के बारे में चर्चा नहीं करता।
- जिस तरह के अन्न नई पीढ़ी के सामने आ रहे हैं, उनमें तो ये सारी परिभाषाएं लुप्त ही हो गई हैं।
- प्रकृति के नियमों के अनुसार तो चारों वर्गों के अन्न अलग-अलग हैं।
- यह गीता के 17वें अध्याय में बहुत स्पष्ट रूप से कहा है। भिन्न वर्णों के साथ शरीर भी भिन्न होते हैं।
- अगर ब्राह्मण का अन्न क्षत्रिय खाए और क्षत्रिय का अन्न ब्राह्मण खाए, तो इसका परिणाम उनके शरीर के माध्यम से समझ सकते हैं।
- अतः अन्न को और गहराई से समझने की जरूरत है। प्रश्न है कि अन्नप्राशन संस्कार क्यों करते हैं?
- वर्ण को समझने के लिए। वर्ण प्रकृति से प्राप्त होता है। ईश्वर स्वयंवर्ण का निर्माण कर रहे हैं –
चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं…।
- शास्त्र तो यहां तक भी कहते हैं कि जिस प्रकार हमारे उत्तर और दक्षिण गोलार्द्ध हैं, वैसे ही पूर्व और पश्चिम गोलार्द्ध भी हैं।
- पूर्व का गोलार्द्ध इंद्र प्रधान है। आग्नेय है। पश्चिम का गोलार्द्ध वरुण प्रधान है।
- वरुण का मतलब सोम, भोग्य सामग्री यानी अर्थ और इंद्र का तात्पर्य है अग्नि, आत्मा।
- आत्मा की चर्चाएं पूर्व में मिलेंगी, पश्चिम में नहीं। पूर्व का व्यक्ति पश्चिम के अन्न से पुष्ट नहीं हो पाएगा। व्यक्ति जिस भूगोल के अंदर पैदा होता है, वहां उत्पन्न होने वाला अन्न ही उसकी पुष्टि में सहायक होता है।
- अन्न को पचाने जरूरी है अन्यथा जमा हुआ मल, मन में मलिनता पैदा कर बीमारी देता है और देवी देवताओं का प्रकोप होने से धन की कमी होने लगती है।
- भोजन ठीक से पचे इसके लिए महर्षि चरक ने आयुर्वेदक लिवर टॉनिक हमेशा लेते रहने की सलाह दी है।



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