५००० पुराने आयुर्वेदिक योग, जो नामर्द को भी मर्द बनाने की क्षमता रखते हैं।

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काम के क्षेत्र में कायदे से चलें, तो बहुत फायदे होते हैं। ज्यादा खट्टी चीजें, आचार आदि सेक्स शक्ति को कमजोर बनाती हैं।

काम को रोकने से भी नपुंसकता का उदय होने लगता है।

क्या है कामवासना और सेक्स के कायदे?

कामवासना स्वाभाविक है। यह प्रकृति की भेंट, परमात्मा का दान है, जो मनुष्य को महान बनाती है। बीमार, कमजोर, नपुंसक व नामर्फ़ पुरुषों के लिए वासना, सेक्स भावना अभिशाप है।

काम के बिना सब बेकाम है। सृजन का सूत्र काम है। राम-श्याम भी काम से जन्मे।

काम से उत्पन्न सन्तति के द्वारा इंसान का जगत में नाम होता है। जगत में आने का पहला सूत्र काम है।

दुनिया के सारे ताम-झाम, शराब के जाम, ट्रैफिक का जाम, जीना हराम की वजह काम को बताया है। काम के कारण ही हर चीज का दाम है।

अगले लेख में नंपुसकता का नाश नामक 140 वर्ष पुरानी हस्तलिखित कृति- लेख आगे पढ़ें

नपुंसकता नाशक आयुर्वेदिक के प्राचीन घरेलू उपचार 

नपुंसकता केवल पुरुषों की बीमारी है। आयुर्वेदिक ग्रंथ माधव निदान, चरक संहिता, अष्टांग ह्रदय आदि में स्‍तंभन दोष, क्लैब्य, ठंडापन, लिंग की शिथिलता, नामर्दी, वीर्य क्षय इन सबको नपुंसकता  विकार बताया गया है।

अंग्रेजी में  इरेक्टाइल डिस्फंक्शन का मतलब पुरुषों में नपुंसकता से होता है।

नपुंसक पुरुषों को किसी भी स्त्री के साथ यौन संबंध बनाने या सेक्स करने के लिए लिंग में उत्तेजना पाने या उत्तेजना को बनाए रखने में समस्‍या आती है।

नपुंसकता की समस्‍या किसी भी उम्र पुरुषोंमें  हो सकती है। तनाव, ब्‍लड प्रेशर से संबंधित समस्‍याएं या डायबिटीज की वजह से स्‍तंभन दोष यानि मर्द भी नामर्द हो सकता है।

  • आयुर्वेद ग्रंथों के ये उपाय इतने जटिल एवं श्रमशील हैं कि आदमी नपुंसक बना रहना ज्यादा उचित समझता है। यह जानकारी केवल ज्ञान हेतु दी है। इसलिए अमृतम द्वारा आयुर्वेद की पुरानी पांडुलिपियों का गहराई से अध्ययन एवं ओषधियां का अनुसंधान करके दो विशेष देशी दवाओं
  • बी फेराल गोल्ड माल्ट तथा
  • B Feral Gold कैप्सूल को तैयार किया है, जो जोश, जवानी, शक्तिवर्धक और नपुंसकता, नामर्दी नाशक हैं। इन्हे कम से कम तीन महीने तक सेवन करें, तो बुढ़ापे में भी योवनता आने लगती है।

1. मस्तगी, माशा, बैंगन का बीज 3 माशा, अगर का चोया 12 माशा- इनको मिलाकर खूब घोटें। घुट जाने पर कालीमिर्च के समान गोलियाँ बना लें। रति के बाद इसमें से दो से चार गोलियाँ खाकर एक पाव गाय का दूध पीयें।

2. मुलहठी का चूर्ण 10 माशा, घी 10 माशा, अमृतम मधु पंचामृत शहद 5 माशा – इन्हें मिलाकर चाटने एवं ऊपर से मिश्री मिला दूध पीने से नष्ट हुई शक्ति पुनः प्राप्त हो जाती है।

3. संभोग कर लेने के बाद, यदि जरा-सी सोंठ’ डाल कर औटाया हुआ दूध पिया जाए, तो बड़ा लाभ होता है। इस दूध के पीने से खोई हुई ताकत पुनः लौट आती है। गाय, भैंस और भेड़ का दूध संभोग – शक्ति बढ़ाने में परमोत्तम है।

स्त्री वशीकरण रस नपुंसकता की चिकित्सा

  • बंसलोचन 1 तोला, धुली भाँग का चूर्ण 4 तोले, शुद्ध पारा 3 माशे, शुद्ध गन्धक 3 माशे, लोहभस्म 1 माशे, निश्चन्द्र अभ्रक भस्म शतपुटी 3 माशे, चाँदी की भस्म 3 माशे, सोने की भस्म 3 माशे और सोनामक्खी की भस्म 3 माशे- इन सबको खरल में पीस कर, ऊपर से भाँग का काढ़ा डाल-डाल कर घोटें। घुट जाने पर एक से दो रत्ती तक की गोलियाँ बना लें।
  • इनमें से, अपने बलाबल अनुसार, एक या दो गाली रोज खाकर, ऊपर से दूध पीने से शुक्र या वीर्य का पतलापन नष्ट होकर, रुकावट बढ़ती और नामर्दी नष्ट होती है। चालीस दिन सेवन करने से ध्वजभंग-रोगी नामर्द से मर्द हो जाता है।

अपुर्व स्तम्भनकारक चूर्ण

  • 5000 साल पुराना योग इस ओषधि को अकरकरा 3 माशे, काली तुलसी के बीज 24 माशे और मिश्री या मिश्री के नीचे जमा हुआ कन्द 27 माशे, इन तीनों को कूट-पीसकर छान लें और मैथून करने से दो घण्टे पहले फाँक कर मैथून करें। यदि आपका वीर्य एकदम पतला और गर्म न होगा, तो आप जब तक ‘नींबू का रस ‘ न पियेंगे, कदापि स्खलित न होंगे। इस नुस्खे में अफीम नहीं है, यह अफीम वालों से अच्छा होता है।

स्तम्भनकारक गरीबी नुस्खा

इमली के चीएँ (बीज) तोले भर ले कर, चार दिन तक पानी में डाल दें।

उसके बाद छील कर लें।

जितने चीएँ (बीज) हों, उनसे दूना ‘पुराना गुड़’ उनमें मिला लें और पीस कर एक दिल कर लें।

चने- समान गोलियाँ बनाकर स्त्री के पास जाने से घण्टे या दो घण्टे पहले दो गाली खा लें।

अगर वीर्य स्खलित न हो तो ‘नींबू का रस पी लें।

हर्षोत्पादक लेप

कवाबचीनी, दालचीनी, अकरकरा और लाल मुनक्के-बराबर-बराबर ला कर महीन पीस लें। इसमें से कुछ चूर्ण लेकर अमृतम मधु पंचामृत शहद में मिला लें और सुपारी छोड़ कर लिंगेन्द्रिय के ऊपरी हिस्से पर इसकी लेप कर लें। घण्टे या आध घण्टे बाद इस लेप को कपड़े से पोंछ कर, मैथून करें। अत्याधिक आनन्द आता है।

अश्वगन्धादि चूर्ण

नागौरी असगन्ध और विधारा – इन दोनों को बराबर-बराबर ला कर, पीस-कूट कर छान लें और घी के चिकने बर्तन में रख दें। इसमें से ‘दस माशे’ या तोले भर चूर्ण सवेरे खा कर, ऊपर से मिश्री मिला गर्म-गर्म दूध पियें।

यदि पच जाये तो गाय का तत्काल दुहा ‘धारोष्ण दूध’ पियें; पर जिस दूध को दुहे हुए पाँच मिनट भी हो गये हों उसे बिना औटाये न पियें। इस ‘अश्वगन्धादि चूर्ण’ का चार मास सेवन करने से मनुष्य दोष-रहित हो जाता है और बालों के सफेद होने का रोग जाता रहता है। हर साल, चार महीने सेवन करने से 50 साल का वृद्ध भी जवान जाता है और वह किसी भी युवती और मदमाती स्त्रियों को संतुष्ट करने में सक्षम बन जाता है। यदि इसके साथ-साथ ‘amrutam kayakey oil’ की मालिश कर स्नान करें, तब और भी उत्तम है।

आमलक्य रसायन

सूखे आमलों को पीस-कूट कर चूर्ण कर लें।

फिर उस चूर्ण में ताजा आमलों के स्वरस की सात भावना दे-दे कर सुखा लें और शीशी में भर दें।

इस चूर्ण को अपने बलाबल – अनुसार, अमृतम मधु पंचामृत शहद और मिश्री के साथ खाने से, एक मास में बूढ़ा भी जवान हो जाता है।

जालीनस वाला चींटियों का तेल

सात बड़े-बड़े चींटे पकड़ कर एक शीशी में डाल दें और ऊपर से ‘नरगिस का तेल भर दें। बाद में, शीशी में काग लगाकर शीशी को 24 घन्टे तक बकरी की मैंगनियों के बीच में दबा दें। बाद में तेल को निकाल कर छान लें। सुपारी बचाकर शेष इन्द्रिय पर तेल को बराबर कुछ दिन मलें। कुछ दिनों में इन्द्रिय बढ़ जायेगी और साथ ही कामेच्छा भी बलवती हो जायेगी।

कामनी – गर्वहारी रस

अकरकरा 3 माशे, लौंग 3 माशे, केसर 3 माशे, सोंठ 3 माशे, पीपर 3 माशे, जावित्री 3 माशे, जायफल 3 माशे, लाल चन्दन 3 माशे, शुद्ध गन्धक 6 रत्ती, शुद्ध हिंगलू 6 रत्ती और शुद्ध अफीम 1 तोला ।पहले लाल चन्दन तक की आठों दवाओं को 6-6 माशे ला कर और अलग-अलग कूट-पीस कर कपड़े में छान लें। फिर सबको अलग-अलग तीन-तीन माशे चवन्नी भर तोल-तोल कर साफ खरल में डालें।

  • ऊपर से 6-6 रत्ती ‘शुद्ध गन्धक’ और शुद्ध हिंगलू’ डालें। शेष में शोधी हुई पतली-सी अफीम डाल कर, घोटते समय जरा-जरा सा पानी भी देते रहें।

जब गोली बनाने योग्य लुगदी हो जाय, तीन-तीन रत्ती की गोलियाँ बना लें और छाया में सुखा कर रख दें।

अगर स्त्री प्रसंग में रुकावट न होती हो, वीर्य जल्दी निकल जाता हो, तो सोने से पहले, एक गोली खा कर ऊपर से मिश्री मिला दूध पी लें। 21 या 40 दिन इन गोलियों का सेवन करने से वीर्य स्तम्भन शक्ति और मैथुन – शक्ति निश्चय ही बढ़ जाती है।

वीर्य का पतलापन और ध्वजभंग – नामर्दी का नाश करने में यह औषधि बहुत ही लाभदायक है। –

माजून सुकराती

देशी अजवायन 1 सेर, गाजर के बीज 3 माशे,

लौंग 3 माशे, फिटकरी डेढ़ माशे, जावित्री 6 माशे, काली तुलसी के बीज 6 माशे और ऊद गर्को 6 माशे इन सातों चीजों को पीस कर छान लें।

फिर चूर्ण के वजन से तिगुना अमृतम मधु पंचामृत शहद मिला कर माजून बना लें।

यदि स्त्री प्रसंग का वास्तविक आनन्द भोगना हो, प्रत्येक साल, कम-से-कम एक महीने तक इसका सेवन करें।

यह माजून आमाशय को बलवान करती है, संचित कफ को निकालती है, लार गिरने को बन्द करती है, पेट के कीड़ों को नष्ट करती है और गुर्दों को ताकतवर बनाती है। यदि कोई वर्ष में एक हफ्ते भी इस माजून का सेवन कर लिया करे, तो असीम बल पुरुषार्थ की वृद्धि होती है। –

माजून गर्म

सोंठ, सकाकुल मिश्री, कलींजन, अंजरा के बीज, गाजर के बीज, जरजीर के बीज और हिलयून

के बीज इन सातों को बराबर-बराबर ले कर,

पीस-कूट कर छान लें।

फिर अमृतम मधु पंचामृत शहद और

सफेद प्याज का स्वरस दोनों को मिला कर एक कलईदार बर्तन में इतना औटायें कि प्याज का रस जल कर ‘शहद मात्र’ रह जाये।

शेष में, इस उबाले हुए शहद में ऊपर का पिसा-छना चूर्ण मिला दें और एक साफ अमृतवान में रख दें। इस माजून को, अपने बलावल अनुसार सेवन करने से स्त्री-प्रसंग की इच्छा खूब बढ़ती है। जिसे बिल्कुल स्त्री – इच्छा नहीं होती उसमें भी काम भावना जागृत हो जाती है।

अन्य औषधियाँ

डेढ़ माशे हींग और भुने हुए पाँच अण्डों की जर्दी- इन दोनों को मिला कर खाने से स्त्री – प्रसंग की इच्छा खूब बढ़ जाती है।

बी फेराल गोल्ड कैप्सूल स्वर्ण भस्म मिलाने सेइ सके गुणों एवम परिणाम में जबरदस्त वृद्धि कारक हो जाता है।

बरगद के फल का दूध 7 बताशे में भरकर रोज खाली पेट खाने से भयंकर नपुंसकता दूर होती है।

इन फलों को छाया में सुखाकर चूर्ण बनाकर सुबह शाम आधा आधा चम्मच गो दुग्ध से सेवन करने से भी फायदा होता है

अमृतम अश्वगंधा चूर्ण साथ में सुबह शाम आधा आधा चम्मच लेते रहें 1 पूरी लहसुन की कली के समूह को घी में तलकर रोज खाने से वीर्य और स्तंभन (सेक्स करने की क्षमता) में वृद्धि होती है

संदर्भ ग्रंथ के नाम

वनौषधि चन्द्रोदय, भाग १ – १०, श्री चन्द्रराज भण्डारी, ज्ञानमन्दिर, भानपुरा (इन्दौर), १०३८

वनौषधि दर्शिका, श्री ठा० बलवन्तसिंह, आयुर्वेदिक

वि० वि०, वाराणसी, १९४८।

वृन्दमाधव, आनन्दाश्रम, पूना, १९४३।

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