“पर्यावरण दिवस”
की अन्तर्मन से शुभकामनाएं —
संस्कृत का एक श्लोक है कि:
【】दस कुओं के बराबर
एक बावड़ी होती है ।
【】दस बावड़ियों के बराबर
एक तालाब है,
【】दस तालाबों के बराबर
एक पुत्र है,
【】दस पुत्रों के बराबर
एक वृक्ष है!
अतः वृक्षों को वन-जंगल,
नदी-तालाब किनारे,
शहर-ग्रामों, घर-भवन
में तथा
खेत-खलियान की
मेढ़ पर पेड़ लगाएं।
वृक्षों में जीवन
हम वृक्षों को बचाएंगे
रखेंगे, तो ही हम
भविष्य में जीवित
रह पायेंगे।
एक विनम्र निवेदन-
कृपया पेड़ों की पुत्र
जैसी देखभाल करें।
पेड़ हमें अधेड़
बनाने से बचाते हैं।
पेड़ों के गुच्छे
बेलों की झालर
डॉलर से कम नहीं हैं।
“तमः प्राया:अव्यक्तचैतन्या:,”
मतलब है, वृक्षों को अव्यक्त
चेतना शक्ति होती है ।
“अन्तः स्पर्शा:”
इन्हें स्पर्श का ज्ञान होता है ।
इसप्रकार वृद्ध वृक्ष वैज्ञानिक
१- गुणरत्न,
२- कणाद,
३- उदयनाचार्य
आदि वृक्षाचार्यों ने वृक्षों में जीवन है
यह खोज कर दुनिया को चोंका
दिया कि पेड़ भी प्राणी
की तरह प्रकृति के
हर भाव- प्रभाव,
स्वभाव को समझते हैं ।
वृक्ष बस बोल नहीं पाते ।
इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है!
“लाजवंती“
इसे छूने, स्पर्श करने
से ही यह पत्र-डाली
सहित सिकुड़ जाती है ।
“अमृतम आयुर्वेदिक निघण्टु“
नामक ग्रन्थ
में, तो इतना तक कहा कि
रजः स्वला स्त्री
पेड़, पौधों को
छूले, तो वे सूख जाते हैं ।
अशोक व बकुल वृक्ष
पर युवती के स्पर्श से
पुष्पपल्लवित, प्रकट हो जाते हैं ।
कुष्मांड इसी से पेठा बनता है ,
इसे उंगली दिखाने पर तुरन्त मुरझा
जाता है।
फिर, हम जो
अमृतम हर्बल दवाएँ जैसे-
बालों के लिए
“कुन्तल केयर हर्बल हेयर स्पा”
एवं
दिमाग की शान्ति तथा
घबराहट,बैचेनी मिटाने व
याददास्त बढ़ाने हेतु-
“ब्रैन की गोल्ड माल्ट“
अत्यंत उपयोगी ओषधियाँ हैं,
ये सब वृक्षों की ही देंन हैं।
“गिलोय की बेल“
बरसात के दिनों में
वृक्षों का श्रृंगार करती है।
हरे-भरे वृक्ष जिंदगी
हरी-भरी कर देते हैं।
श्री हरि हों या हर हर महादेव
ये हरियाली में ही निवास करते हैं।
■ शिवलिंग स्वरूप वृक्ष में
श्रीहरि का वास है।
■ वृक्ष अल्लाहताला
की सौगात है।
■ पारदियों व फारसियों
का प्रेम है।
■ ईसाइयों की जान है।
■ जीव-जंतुओं का जीवन है।
■ बच्चों का बचपन है।
■ पशुओं के लिए परमात्मा है।
■ और विश्व-ब्रह्मांड की
आत्मा हैं वृक्ष।
आचार्य चतुरसेन के अनुसार
वृक्ष का ज्ञान रखने वाले लोग
हर काम में दक्ष होते हैं।
“देवरहा बाबा”
ने एक बार कहा था कि —
वृक्षों ने हमें निरोगी बना दिया।
“स्कन्द पुराण” में एक अद्भुत श्लोक है
अश्वत्थमेकम् पिचुमन्दमेकम्
न्यग्रोधमेकम् दश चिञ्चिणीकान् ।
कपित्थबिल्वाऽऽमलकत्रयञ्च
पञ्चाऽऽम्रमुप्त्वा नरकन्न पश्येत्।।
अर्थात-
अश्वत्थः = पीपल
पिचुमन्दः = नीम
न्यग्रोधः = वट वृक्ष
चिञ्चिणी = इमली
कपित्थः = Wood apple
बिल्वः = बेल
आमलकः = आंवला
आम्रः = आम
उप्ति = पेड़/पौधे लगाना
धर्मग्रंथों के अनुसार
जो भी इन सारे वृक्षों का वृक्षारोपण करता है उसे जीवन में कभी दुःख-दुर्भाग्य नहीं देखने पड़ता।
वह व्यक्ति नरक रहित स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है।
अमरनाथ की अमरकथा का महत्व और रहस्य जानने के लिए
ग्रुप जॉइन करें।
भगवान विष्णुजी को सुदर्शन चक्र किस स्थान पर मिल था और किसने दिया था
यह सब जानने की लालसा हो, तो लॉगिन करें अमृतमपत्रिका
Leave a Reply