सावन मास में अमृतम खोज…

Spread the love
भगवान नाम अथाह गुणों से भरा गुण
 वाचक शब्द है जिसका अर्थ गुणवान होता है।
भगवान शब्द की उत्पत्ति “भग” धातु से
हुई है।
भग के ६ अर्थ है-
[1] ऐश्वर्य
[2] वीर्य
[3] स्मृति
[4] यश
[5] ज्ञान और
[6] सौम्यता
यह सभी 6 गुण महादेव शम्भू में निहित हैं।
इसी कारण केवल शिव को भगवान कहते हैं।
दक्षिण भारत में शिवजी को ईश्वर कहकर
पुकारा जाता है। वहां सभी शिवालय को
ईश्वराकोइल कहते हैं।
अदिभाषा संस्कृत व्याकरण में भगवान शब्द “भंज” धातु से बना है जिसका अर्थ हैं-
सेवायाम् अर्थात जो सभी की सेवा में तत्पर
रहता हो।
चराचर जीव-जगत के साथ ही पंचमहाभूतों
का संचालन करने में दक्ष हो, जो दूषित
होने से बचाये।
सबका मङ्गल सन्सार का भला, दया और कल्याण करके समय आबे पर संहार भी
करें। भोलेनाथ समता और समता का  उल्टा तामस का मालिक है। शिव रूप में कल्याण और
लिंग रूप में भगवान के प्रतीक हैं।
इसलिए शिव-लिंग दोनो ही पूज्यनीय हैं।
शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है। यह सब शिंवलिंग से उत्पन्न हैं।
लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न।  यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न।
शिव की माया तो अनन्त हैं और काया दो हैं।
पहली स्थूल, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की
सर्वाधिक आराधना, अर्चना लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है।
पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे- प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, ऊर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्मांडीय स्तंभ लिंग आदि
शिवजी त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव भी कहते हैं। भोलेनाथ, शिवशंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि इनके
5000 से भी ज्यादा नाम शिवपुराण, स्कंदपुराण में उपलब्ध हैं। सभी सप्तऋषियों ने अलग-अलग शिव सहस्त्रनाम अर्थात शिवजी के 1008 नाम चार वेदों से खोजे थे। इस प्रकार इनके 12000 से भी अधिक नामों का उल्लेख 18 पुराणों में मिलता है।
महर्षि दुर्वासा ने भू यानि प्रथ्वी को सम करने
के कारण इन्हें शम्भू कहा है।
दशानन रावण के बाबा ऋषि पुलस्त्य ने लिखा है कि सृष्टि में सब सम करने के कारण इन्हें शंकर बताया।
सूर्य से भी ज्यादा तेजस्वी होने की वजह से
महर्षि अत्रि ने महातेजसे नमः का जाप कर
शिव से शक्ति प्राप्त की।
महर्षि अगस्त्य ने इन्हें काल का कारक यानि समय निर्माता माना और महाकाल की उपाधि देकर महाकाल ज्योतिर्लिंग मन्दिर कठोर तप
किया था।  उज्जैन में हरसिद्धि मन्दिर के पीछे
अगस्त्येश्वराय शिवालय 84 शिवलिंगों से प्रथम   है। मान्यता है कि उज्जैन के इन 84 शिवलिंगों के दर्शन से 84 लाख योनियों से मुक्ति मिलती है।
शिंवलिंग क्या है…
सिद्ध अवधूत-अघोरी कहतें हैं कि-,
मानव मस्तिष्क की आकृति शिंवलिंग की भांति है। सारा सन्सार शिवमय है।
शिवलिंग का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरूप। शून्य, आकाश, अनंत, ब्रह्मांड और निराकार आदि परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है।
शिंवलिंग की आकृति ब्रह्माण्ड की तरह है।
इसकी आकृति हमारी आत्मा की ज्योति की तरह होती है।
स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसकी पीठ या आधार है और सब अनंत शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है।
सृष्टि रचनाकाल में सर्वप्रथम लिंग की आकृति ही प्रकट होती है। वायुपुराण में इसकी बहुत ही वैज्ञानिक व्याख्या है।
 त्रिलोक की संपूर्ण ऊर्जा लिंग में समाहित है।  वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है।
 बिंदु शक्ति है और नाद शिव। यही सबका आधार है।
शिवजी के अंशावतार-
स्कन्धपुराण के अनुसार हनुमानजी को ग्यारहवा रुद्रावतार बताया है। माँ अंजनी परम शिव भक्त थी। इन्होंने बैंगलोर कर्नाटक के निकट हम्पी
नामक पर्वत पर तप कर हनुमान को पुत्र रूप में पाया था। यह पर्वत पूर्णतः हनुमान मुख की तरह बहुत दूर से दिखता है। इस पर्वत पर आज भी वह शिंवलिंग विराजमान है, जहां माँ अंजनी ने तप किया था।
बजरंगबली के अतिरिक्त भगवान शिव के अन्य अवतारों में ऋषिदुर्वासा,  महेशावत्तार, नन्दीनाथ वृषभ, शनिदेव के पूज्य गुरु ब्रह्मर्षि पिप्पलाद,  द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर अघोरी अवतार, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरातअवतार, नतेश्वर और
वैश्यानाथ हैं।
वेश्यानाथ की कथा-
एक बहुत पापी सुवर्चलोचना नामक वेश्या को अपने पाप से घृणा होने लगी, तब अंतर्ज्ञान जागा और वह भगवान शिव की कठोर साधना करने लगी। महादेव प्रकट प्रसन्न होकर वरदान मांगने के लिए कहा, ….तो वैश्या ने शिव से उत्पन्न पुत्र
का वरदान मांगा। भोलेनाथ ने वेश्या की इच्छापूर्ति के लिए वेश्यानाथ के रूप में अवतार लिया और वेश्या को पुत्र देकर अंतर्ध्यान हो गए।
वैश्या की कोख से जन्म होने के कारण बनियों को वैश्य भी
ये बनियों यानि वैश्यों की उत्पत्ति का किस्सा है।
कभी गौर केरें, तो अनुभव होगा कि बनियों में
आधे गुण शिव की तरह कल्याण, भला, दया करने वाले होते हैं और आधे लक्षण अपनी वेश्या माँ की तरह वक्त के साथ बदलने वाले, कभी-कभी स्वार्थी प्रवृत्ति के होते हैं।
इसलिए बनियों की एक बानगी बहुत प्रसिद्ध हैकि-
बनिया यार दबे का
न्योता करे, सगे का।
बनियों की कथा संक्षिप्त रूप में दी गई है।
यहां तक fb पर सादा पब्लिश
मध्यप्रदेश में जिला खंडवा के जिला बोरगांव बुजुर्ग ग्राम रुस्तमपुर में 12 ज्योतिर्लिंगों के बाद 13 वां ज्योतिर्लिंग यहां पर स्थित है, जो जमीन से 35 फीट नीचे गुफा में स्थित है। यहां संत मल्लिकार्जुन ने यहां जीवित समाधि ग्रहण की थी…
ग्रामीणों के अनुसार यह शिवलिंग सैकड़ों वर्ष पुराना है और स्वयं ही जमीन के भीतर से अवतरित हुआ था। इसलिए इसे स्वयं भू महादेव के नाम से भी जाना जाता है। लोगों की आस्था है। 12 ज्योतिर्लिंग के बाद 13 वां ज्योतिर्लिंग हैं। ग्रामीणों के अनुसार यहां पहले एक गुफा थी, जिसके अंदर गुप्तेश्वर शिवलिंग की पूजा-अर्चना करते थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *