वीर्य की वीरता का बखान करता यह आर्टिकल दिमाग खोल देगा। जाने आठ प्रकार के वीर्य के बारे में !!

  • बिना वीर्य के देह में वीरता नहीं आती। वीर वही है, जिसका वीर्य गाढ़ा है। वीर्य के गाढ़े होने से ही कोई मर्द कामी स्त्री के साथ एक घंटे तक मर्दन कर सकता है।
  • वीर्य के पतले होने से ही तीर यानि लिंग में ढीलापन आने लगता है। वीर्य आठ तरह का होता है।
  • शरीर हो या शास्त्र बताते हैं कि बीबी को वीर्य उतना ही जरूरी है जितना भोजन में अन्न।
  • पर्याप्त अन्न न मिलने से मन खिन्न हो जाता है। ऐसे ही स्त्री की योनि में भरपूर वीर्य न निकले, तो वह असंतुष्ट, दुखी और खिन्न होकर, भिन्न भिन्न मार्ग अपनाकार बहक सकती है।
  • वीर्य की वृद्धि और गाढ़ा करने के लिए शिलाजीत, आंवला मुरब्बा, हरड़ मुरब्बा, अश्वगंधा, शतावार, सफेद मूसली, विदारीकंद, शुक्र वल्लभ रस, कोंच बीज, स्वर्ण मासिक भस्म, बंग भस्म, स्वर्ण भस्म, कुटकुटांतव भस्म आदि ओषधियां लाजवाब हैं।
  • आयुर्वेद का 200 साल पुराने ग्रंथ में अनेक उपाय लिखें हैं, जो मर्दाना कमजोरी का घोड़ा छाप आयुर्वेदिक नुस्खा है। 5 चित्रों में देखें।
  • आयुर्वेद के 5000 वर्ष पुराने 40 शास्त्रों में कम से कम 400 से ज्यादा बाजीकारक योगों का वर्णन मिलता है।
  • प्राचीन पांडुलिपि के आधार पर निर्मित एक मर्दाना ताकत बढ़ाने वाला एक जबरदस्त आयुर्वेदिक ओषधि B-FERAL GOLD MALT और कैप्सूल तीन महीने सुबह शाम दूध के साथ नियमित लेने से वीर्य इतना गाढ़ा हो जाता है कि एक घंटे तप वीर्य का पतन होना मुश्किल होता है। गुगल पर सर्च करें।
  • ध्यान रखें – स्पर्म या शुक्राणुओं की मात्रा बढ़ने पर ही वीर्य गाढ़ा होगा और वीर्य के गाढ़े होने के बाद ही मर्दाना शक्ति की वृद्धि होगी। नपुंसकता, नामर्दी मिटेगी। क्योंकि प्राचीन आयुर्वेद ने पुरुष में वीर्य की प्रवलता पर जोर दिया है।

वीर्य: पुनर्वदंत्येके गुरु स्निग्धहिमं मृदु॥

सबुरूज्ञोणतीदणं च तदेवं मतमष्टधा।।

  • अर्थ- किसी किसी आयुर्वेदचार्य के मत में द्रव्याश्रित गुरु, स्निग्ध, हिम, मृदु, लघु, उष्ण, रूक्ष, और तीचण इन गुणों को ही वीर्य कहते हैं, इस लिये उन के मतानुसार वीर्य आठ प्रकार का होता है |
  • भाष्य – श्राचार्य सुश्रुतने गुरु, लघु के स्थान पर विशद और पिच्छिल दो गुण वीर्य में लिखे हैं, गणना समान ही है।

महर्षि चरक आचार्य का मत है कि

चरकस्त्वाह वीर्यं तद्यन या क्रियते क्रिया॥

नाऽवीयं कुरुते किंचित्सर्वा वीर्यकृता हिसा।।

  • अर्थ–बीर्य के संबबंध में महर्षि चरकाचार्य भी कहते हैं कि जिस द्रव्य के जिस स्वभाव से संभोग की कोई क्रिया करने में आती है उस स्वभाव का नाम ही वीर्य है।
  • द्रव्य से जो कर्म होता है उसी कर्म को वीर्यकृत समझना चाहिये । वीर्यहीन द्रव्य कोई कर्म नहीं कर सकते हैं।

गुर्वादिष्वेव वीर्याख्या तेनाऽन्वर्येति वरायते॥

समगुर सारेषु एक्त्युत्कर्षविवर्तिषु गुर्वादियों

वीर्य का प्रतिपादन ।

  • अर्थ–अन्य प्राचार्यों का भी यही मत है कि इन्हीं गुर्यादिक आठ गुणों को ही वीर्य कहना चाहिये। कारण यह है कि संपूर्ण गुण में ये आठ गुण ही सार भूत और अधिक शक्ति शाली होते हैं तथा व्यवहार में भी ये ही मुख्य और श्रग्रगण्य है इसी हेतु से इन आठ गुणों का ही नाम वीर्य है ।

रसादि में श्रवीय त्वप्रतश्च विपरीतत्वात्संभवत्यपि नैव सा ।

विवदयते रसाद्य षु वीयं गुर्वादयोह्यतः ॥१६॥

  • अर्थ– पूर्वोक्त कारणों से विपरीत होने पर रसादि में वीर्य संज्ञा नहीं होसकती है जैसे रस में सारत्व नहीं है क्योंकि जठराग्नि के संयोग से अन्य रस की उत्पत्ति होजाती है परन्तु गुदि में जठराग्नि के संयोग से कुछ अंतर नहीं पड़ता है, ज्यों के त्यों बने रहते हैं इस हेतु से रसादिक में वीर्य संज्ञा नहीं है ।

अन्य आचार्यों का मत ।

उज्यं शीतं द्विधैवाऽन्ये वीर्यमाचक्षतेऽपि च।

  • अर्थ- – अन्य आचार्य वीर्य को शीत और उष्ण दो ही प्रकार का मानते हैं और इस का युक्ति सहित कारण बताते हैं ।

सयुक्ति कारण ।

नानात्मकमपि द्रव्यमग्नीपोमो महावली।

व्यक्तऽव्यक्तं जगदिव नातिक्रामति जावित्

  • अर्थ-जैसे स्थूल या सूक्ष्म कोई पदार्थ जगत का उल्लंघन नहीं कर सकता है इसी तरह सम्पूर्ण द्रज्य नानात्मक होने पर भी महा प्रवद्ध अग्नि और सोम इन दो गुणों का अतिक्रम नहीं कर सकते हैं इसलिये कुछ द्रव्य उशीर्ष और कुछ शीत वीर्ष होते हैं, जैसे दूध के साथ मी नहीं चाहिये। ये दोनों मधुर हैं

अष्टांग ह्रदय गत ग्रंथ वीर्यसूत्रस्थान भापाटीकासमेत से साभार

वीर्य द्रव्यों का अधोर्ध्वगामित्व |

व्यवहाराय मुख्यत्वाद्वइग्रग्रहणादपि॥

इज्यमूर्ध्वगमं तत्र प्राथोऽग्निपवनोत्कटम्।

प्रयोगानि च भूयिष्ठ भूमितोयगुणाधिकम् ।

इति द्रव्यं रसान्भेदैरुत्तरत्रोपदेक्ष्यते।

  • अर्थ-जिन द्रव्यों में अग्नि और वायु का भाग अधिक होता है वे प्रायः ऊर्ध्वगामी होते हैं। जिनमें पृथ्वी और जल का भाग अधिक होता है वे प्रायः श्रधीगामी होते हैं । यहाँ तक द्रव्य के विषय में जो कुछ कहना था कहा गया है, श्रब रसों के तिरेलठ भेदों का वर्णन करेंगे।
  • श्रष्टाहृदये। घोर इनका पाक भी मधुर है परन्तु धीर्य है और दूसरा शीत षीर्य है इस कारण रक्त को दूषित करते हैं एक उष्ण बिरुद्धता के सम्बन्ध में भाष्य -षीय के दो प्रकार के घरक संहिता में अधिक स्पष्ट है यथा- जो वीर्य रस और विपाक में मधुर है।
  • वह श्रेष्ठ वीर्य है जो धन्य रस और पाक में अम्ल है वह उष्ण वीर्य’ है, इसी प्रकार जो हृव्य रस और पाक में कटु हो उसको भी उष्ण वीर्य समझिये।
  • इन मधुर धादि विपाकों धौर रस के कथम मात्र से ही गुणों का ज्ञान होजाता है कभी कभी मधुर कषाय तिक रस भी जो शीत चीय’ (सामान्यतया ) हैं।
  • उष्ण वीर्य हो जाते हैं जैसे विल्ष धादि । महा पंचमूल तिक्त और कषाय होने पर भी उष्ण वीर्य है। जलचर या जलदेशीय मांस मधुर होने पर भी उष्ण है। सैन्धव ( लवण होने पर भी ) ‘ग्रामला (खट्टा होने पर भी) उष्ण वीर्य नहीं है।
  • थाक, धगर, गिलोय ये तिक्त रस होने पर भी वीर्य हैं। बीर्य निश्चय के लिए रसही नहीं चिपाक जाममा भी आवश्यक है। किसी द्रव्य का विशेष गुण अर्थात् छिपी हुई शक्ति बीय है जो इन दोनों से भी परे है।
  • गुणों की विशेषता उसके विशेष प्रभाव से है जैसे धम्ल रस में कोई द्रव्य स्तम्भफ धौर कोई रेचक है, अर्थात् कैथ ( अम्ल होने पर भी) संग्राही।
  • धामला (अम्ल होने पर भी ) रेचक है। पीपल और सोंठ फटुरस (चिरपरा ) होने पर भी वृष्य ( शुक्र वर्द्धक ) है क्योंकि उनका विपाक मधुर मनकारक (मलावरोबक ) और शीत चीय । कषाय रस स्त. होता है।
  • परन्तु हरड़ का कषाय रस रेचक और और उष्ण बीच है। खारांश यह है द्रव्य के गुण का निश्चय रस विपाक और बीच मात्र से ही नहीं है, प्रभाव ही प्रबल है फिर भीरस, विपाक, बीर्थ से सामान्य गुणों का बोध अवश्य होता ही है।

उभयवीय के गुबा तत्रोष्णं भ्रमतृङ्ग्लानिस्वेद

दाहाऽऽशुपाकिताः शमं च वातकफयोः

करोति शिशिरं पुनः ह्रादनं जीवनं स्तंभं प्रसादं रक्तपित्तयोः

  • अर्थ– इन में से उष्ण वीर्य भ्रम, पिपाह ग्लानि, पसीना, दाह, शीघ्रपाक तथा वात कफकी शान्ति करते हैं तथा शीतवीर्य थाहा बल, रक्तादिकी गतिका अवरोध, रक्तपित्त विशुद्धता संपादन करते हैं ।

विपाक का लक्षण |

जाठरेणाऽग्निना योगाद्य दुदेति रसांतरम् ।

रसानां परिणामांते स विपाक इति स्मृतः।

  • अर्थ – जठराग्नि के संयोग से मधुरादि यो का परिपाक होकर परिणाम में जो रसान्तर उत होता है उसे बिपाक कहते हैं ।

रसों का विपाक ।

तिक्तोषणकषायाणां विपाकः प्रायशः कटुः स्वादुः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रम

  • अर्थ – मधुर और लवण रस का विषाक मधुर होता है, अम्ल का विपाक अम्ल, तथा ती चण, कटु और कषाय रसों का विपाक प्राप कटु होता है।
  • प्रायः शब्द से जाना जाता है कि कहीं कहीं विपरीत भी होता है । ब्रीहि मधुर रस युक्त है पर इसका धम्ल है, हरीतकी कषाय रस युक्त इसका विपाक मधुर है। सोंठ अदरख रस युक्त होने पर भी मधुर पाकी हैं।

भिन्न-भिन्न विपाकों के कर्म

रसैरसौ तुल्यफलस्तत्र द्रव्य शुभा किंचिद्रसेन कुरुते कर्म

पाकेन वाऽपरम् में गुणांतरण वीर्येण प्रभावेरीब किचन ।

  • अर्थ-जिह्वा से जानने योग्य मधु कटुकावि स्वाभाविक रस जो कार्य करते है कार्य विशक अनित बेही रस करते हैं। जैसे रसव शर्करा कर धुर रस वायु आदि।

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