पिछले ब्लॉग में ॐ के बारे में बताया था इस लेख में जाने माँ चण्डिका कौन है-

    ।। ‘ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे‘ ।।
 

भाषाशब्द कोष और संस्कृत व्याकरण

टीका के अनुसार चण्ड का अर्थ-

प्रचण्ड, उग्र, आवेश
युक्त, उष्ण, फुर्तीला और सक्रिय बताया गया है। अतः माँ चण्डिका का यह रूप स्मरण करने का उद्देश्य यह भी है कि माँ अपने भक्त के कष्ट का निवारण कर अभीष्ट साधन में फुर्ती के साथ सक्रिय हो।
चडि धातु से चण्ड शब्द बनता है जिसका अर्थ है- अत्यंत क्रोध करने वाला होता है।
क्रोध भय उत्पन्न करने में प्रधान कारण होता है, इसलिए सन्सार की उस नियामिका यानी नियंत्रण करने वाली शक्ति को चण्डिका:
चण्डी कहा गया है।
व्याकरण के हिसाब से स्वार्थे कन् प्रत्यय लगने से चण्डी ही चण्डिका बन जाता है।
उपनिषद का कथन है कि-
भीषास्माद् वात: पवते भीषोदेति सूर्य:
भीषास्माद्ग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावती पंचम:
अर्थात-
जगन्नियन्ता माँ चण्डी के भय से ही वायु सदैव गतिशील रचति है। माँ चण्डिका के भय से सूर्यदेव समय पर उदय होते हैं। माँ के भय से अग्नि, इन्द्र और मृत्यु के देवता अपना-अपना काम समय पर करते हैं।
शाक्त प्रमोद नामक पुस्तक तथा सिद्ध अघोरी परमहँस श्री श्री कीनाराम के मुताबिक
 तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र, मारण, उच्चाटन की देवी चण्डिका ही है। महाकाली अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलती है। माँ चण्डिका तमोगुणी देवी है।
देवी महात्म्य के मुताबिक
इच्छा, ज्ञान, क्रिया की प्रधानता के अनुसार
अथवा सत, रज और तमोगुण के अनुसार एक ही शक्ति के तीन रूप हो जाते हैं।
तीन देवियां…
【१】सत्वगुण प्रधान को महासरस्वती कहा गया है।
【२】रजोगुण प्रधान को महालक्ष्मी बताया गया है।
【३】माँ महाकाली तमोगुण प्रधान है।
इन तीनों के सयुंक्त रूप को चण्डी कहा गया है। मतलब यही है कि- माँ चण्डिका की उपासना से ज्ञान, बुद्धि और धन-सम्पदा की वृद्धि होती है।
चामुंडा शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बंध में इन्हीं तीनों शक्तियों की चिदरूपा सरस्वती, सदरूपा महालक्षमी और आनंद रुपा महाकाली को कहा गया है जिनका समष्टिरूप में चामुंडा नाम दिया गया है।
इसीलिए वाराही तन्त्र में “चण्डिका त्रितयं तथा कहा गया हैै।
तन्त्र ग्रंथों में तुरीया शक्ति का नाम चण्डिका दिया गया है।
वर्णबीज कोष और वर्णनिघण्टु में
उल्लेख है कि…सृष्टि के सारे कार्य किसी अदृश्यसत्ता अर्थात माँ चण्डिका के निर्देश पर ही चल रहे हैं।
अतः हम जगत्जननी माँ चण्डिका को नमस्कार:प्रणाम कर, उनका हृदय में, प्रत्येक श्वांस में !!ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे!!
 मन्त्र का स्मरण करते हैं।
यह नवाक्षर मन्त्र नवग्रहों का दोष दूर कर
जीवन का नवनिर्माण करता है।
                    !!अमृतम!!
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