सौन्दर्य-लहरी नामक ग्रंथ में गरीबी, परेशानी, रोग शोक, दुख आदि दूर करने के लिए अनेकों यंत्रों की सिद्धि पाने के योगों का वर्णन है।
श्रीमद आदि शङ्कराचार्य-प्रणीत सौन्दर्यलहरी स्तोत्र-साहित्य में अत्यन्त उत्कृष्ट कृति मानी जाती है। वस्तुतः यह रचना स्तोत्र मात्र न होकर समस्त तन्त्रग्रन्थों का सार अथवा तन्त्रराज्य के भाण्डागार का अनावृत द्वार है।
जहाँ इसके प्रत्येक श्लोक में तान्त्रिक उपासना वर्णित है वहीं इनके द्वारा सामान्य साधकों के लिए विविध दुर्लभ प्रयोग भी सुलभ कराए गए हैं।
निश्चय ही साधकगण इनका प्रयोग कर ऐहिकामुष्मिक कल्याण प्राप्त करेंगे।
साधारणतया इस रचना के शतश्लोकों का प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक किया गया आवर्तन साधक को श्रीचक्राधिष्ठायिनी माता का कृपा पात्र बना देता है। साथ ही साधक के हृदय में महान् सुख, तेज का संचार होता है और वह तत्त्वज्ञान को उपलब्ध हो जाता है।
‘शरीरं चिन्तयेदादौ निजं श्रीचक्ररूपकम्‘ के अनुसार अपने शरीर को ही श्रीचक्र मानकर मन्त्रयोग से कुण्डलिनी को जाग्रत किया जा सकता है।
दारिद्रा निवारण मंत्र.…
अविद्यानामन्तस्तिमिरमिहिरद्वीपनगरी
जडानां चैतन्यस्तबकमकरन्दस्रुतिझरी।
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपुवराहस्य भवति।।
ध्यानपूर्वक समझने वाली बात विशेष यह ही कि-विद्या के दो भेद हैं- अविद्या और विद्या। इन्हीं को परा और अपरा कहा जाता हैं। चारों वेद, छहों वेदाङ्ग, यह अपरा विद्या है और जिस विद्या से ब्रह्म की प्राप्ति होती है उसे परा विद्या कहा जाता है।
इसीलिए मात्र वेद-शास्त्रों का ज्ञान रखने वाले को विद्वान् नहीं कहा जाता प्रत्युत इसका परित्याग कर ही ब्रह्मजिज्ञासु मुमुक्षु परा विद्या का अधिकारी बनता है।
संसारसागर से उबारने -वाली हे मां! आप है।
दारिद्रा निवारण यंत्र….
प्रस्तुत यन्त्र को स्वर्ण पत्र या भोजपत्र में चन्दन से लिखकर ईशानाभिमुख हो (ईशान कोण की तरफ मुंह करके) १५ दिन तक प्रतिदिन १००० मन्त्र का जाप करें।
इस मंत्र का बीजाक्षर ‘अं’ है । जप का दशांश हवन ‘अं स्वाहा’ से, हवन का दशांश मार्जन ‘अं मार्जयामि नमः’ से तथा मार्जन का दशांश तर्पण ‘अं तर्पयामि नमः’ से करें।
तर्पण के पश्चात १० बार मन्त्र का पाठ करें, फिर एक बार मन्त्र से पूर्णाहुति दें। रक्तपुष्प, बिल्व, तिल, यव तथा घृत हवनीय द्रव्य है। उड़द के पुए का नैवेद्य विहित निषेध है।
दारिद्रयनिवारणप्रयोग यन्त्र के प्रयोग से सर्वैश्वर्य एवं सर्वविद्या की प्राप्ति होती है तथा दारिद्र्य दूर होता है।
विनियोग अपने गुरु से पूछकर करें… सीधे हाथ की हथेली पीआर जल लेकर बोलें
अस्य श्रीत्रिपुरसुन्दरीमहाविद्याशताक्षरीबीजमन्त्राणां ‘अविद्यानामन्तस्तिमिर’ इति तृतीयमन्त्रस्य ईशान भैरवो ऋषिः। गायत्र्यनुष्टुप् छन्दसी। श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी देवता। अं बीजं । ह्रीं शक्तिः। ॐ आं ह्रीं कीलकम् । मम सर्वकामनापूर्त्यर्थे जपे विनियोगः।
हाथ के जेल को धरती पीआर डाल दें।
अब न्यास करें। कराङ्गन्यासी
ह्रां …. अंगुष्ठाभ्यां नमः…. हृदयाय नमः।
ह्रीं…. तर्जनीभ्यां स्वाहा।…..शिरसे स्वाहा।
हुं .. मध्यमाभ्यां वषट् … शिखायै वषट्।
हैं….अनामिकाभ्यां…कवचाय हुम्।
ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् . नेत्रत्रयाय वौषट्।
हः….. करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् .. अस्त्राय फट्।
अब महालक्ष्मी का ध्यान करें… ध्यानम् केतकीपुष्पगर्भाभां द्विभुजां हंसलोचनाम्। शुक्लपट्टाम्बरधरां पद्ममालाविभूषिताम्।
चतुर्वर्गप्रदां नित्यमानन्दमयीं पराम्।
वराभयकरां देवीं नागपाशसमन्विताम्। शृणुतत्वमकारस्य अतिगोप्यं वरानने। शरच्चन्द्रप्रतीकाशं पञ्चकोणमयं सदा।
पञ्चदेवमयं वर्ण शक्तिद्वय समन्वितम्।
निर्गुणं सगुणोपेतं स्वयं कैवल्यमूर्तिमान्।
बिन्दुद्वयमयं वर्ण स्वयं प्रकृतिरूपिणी।
ऋष्यादिन्यास करें…
ईशान भैरवाय ऋषये नमः … शिरसी
गायत्र्यनुष्टुप् छन्दोभ्यां नमः… मुखे।
श्रीमहात्रिपुरसुन्दर्यै देवतायै नमः …हृदि।
अं बीजाय नमः …..लिंगे।
ह्रीं शक्तये नमः ….नाभौ।
ॐ आं ह्रीं कीलकाय नमः …पादयोः।
मम सर्वकामनापूर्त्यर्थे जपे विनियोगाय नमः अञ्जलौ सर्वाङ्गे।
पञ्चोपचार पूजन
लं पृथिवीतत्वात्मिकायै ललितादेव्यै।
गन्धं परिकल्पयामि।
हं आकाशतत्वात्मिकायै ललितादेव्यै
पुष्पं परिकल्पयामि।
यं वायुतत्वात्मिकायै ललितादेव्यै. धूपं परिकल्पयामि। रं वह्नितत्वात्मिकायै ललितादेव्यै दीपं परिकल्पयामि। वं जलतत्वात्मिकायै ललितादेव्यै नैवेद्यं परिकल्पयामि। सं सर्वतत्वात्मिकायै ललितादेव्यै
सर्वोपचारान् परिकल्पयामि।




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