आयुर्वेद की किस विधि और नियम द्वारा रोगों को केसे ठीक करें!

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  1. ग्रहशान्तिपूर्वक चिकित्साग्रहेषु प्रतिकूलेषु नानुकूलं हि भेषजम्।

    ते भेषजानां वीर्याणि हरन्ति बलवन्त्यपि॥३२॥

    प्रतिकृत्य ग्रहानादौ पश्चात् कुर्याच्चिकिसितम् ॥३३॥

    • अर्थात जिस रोगी के सूर्यादि ग्रह प्रतिकूल हों, उनमें औषधि प्रयोग लाभप्रद नहीं होता है, क्योंकि वे प्रतिकूल ग्रह औषधियों के अत्यन्त बलवती शक्ति का अपहरण कर लेती हैं। अतः सर्वप्रथम ग्रहशान्ति करा कर उन ग्रहों को अनुकूल करके तब चिकित्सा करनी चाहिए
    • 1. आयुर्वेद विश्व की सबसे प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। आयुर्वेदिक ओषधियां रोगों के साथ साथ शरीर की सम्पूर्ण तंत्र प्रणाली को ठीक करती हैं।
  2. देह में किसी भी आधि-व्याधि से क्षतिग्रस्त कोशिकाएं, तंतु स्नायुमंडल आयुर्वेदिक चिकित्सा द्वारा मरम्मत किया जा सकता है और बीमारी पुनः नहीं पैदा होती।
  3. आयुर्वेद चारों वेदों में से एक अथर्ववेद का उपवेद है। यह विज्ञान कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ का अर्थ है ‘जीवन का सार, जीवन के पार।
  4. संक्षेप में कहें तो आयुर्वेद अध्यात्म के ज्ञान से जोड़कर मन को प्रसन्न और जीवन को समृद्धशाली बनाता है। आयु का मान (प्रमाण) और उसके लक्षणों का वर्णन जिसमें हो यही आयुर्वेद का सार है।आयुर्वेदावतरणम्

चरक संहिता का यस संस्कृत श्लोक जगत प्रसिद्ध है –

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।

मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते।।

  • हितकारी या अहितकारी, सुख दुःख को संतुलित करे उसे आयुर्वेद कहा गया।

आचार्य सुश्रुत के अनुसार आयुर्वेद की परिभाषा

आयुरस्मिन् विद्यतेऽनेन वा आयुर्विदन्तीत्यायुर्वेदः (सु.सू.१।३३)

  • अर्थात् आयु के हित का विचार जिसमें हो, जिसके उपदेशों से दीर्घायु की प्राप्ति हो, उसे आयुर्वेद कहते हैं।

पुरुषार्थचतुष्टय का श्रेय

धमार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।

रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च।।

  • अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये जो पुरुषार्थचतुष्टय है । इनकी प्राप्ति के लिए शरीर का नीरोग होना ही प्रधान (मूल) कारण है । व्याधियाँ उपर्युक्त पुरुषार्थचतुष्टय एवं प्राण का नाशक है । अर्थात् रोग सुखायु, हितायु एवं जीवन को नष्ट करने वाला है।
    • श्रेयसो जीवितस्य चेति— श्रेयो वज्जीवितं हितत्वेन, सुखत्वेन चार्थे।

व्याधियों के प्रकार

व्याधयो द्विविधाः प्रोक्ताः शारीरा मानसास्तथा।

शारीरा ज्वरकुष्ठाद्या उन्मादाद्या मनोभवाः॥१२॥

  • व्याधियाँ दो प्रकार की होती हैं । ज्वर, कुष्ठ आदि व्याधियाँ शारीरिक हैं तथा उन्मादादि मानसिक आधि कहलाती हैं।

विमर्श – इस सन्दर्भ में अन्यत्र कहा गया है—‘शारीरमानसागन्तुसहजा व्याधयो मता:।

शारीराज्ज्वरकुष्ठाद्या: क्रोधाद्या मानसा मता:।। आगन्तवोऽभिशापोत्था: सहजा क्षुत्तृषादयः।।

  • अर्थात् व्याधियाँ या बीमारियां शारीरिक, मानसिक, आगन्तुक एवं सहज भेद से चार प्रकार की होती हैं; यथा –

१. शारीरिक (Somatic) यथा- ज्वर, कुष्ठ, अर्शादि।

२. मानसिक (Psychic) यथा – उन्माद, अपस्मार, क्रोधादि।

३. आगन्तुक (Traumatic) यथा – अभिशापज, सर्पदंष्ट्रादि ।

४. सहज (Natural) यथा – भूख, प्यास, जरा आदि।

दोषसाम्य एवं दोषवैषम्य का फल

दोषाणां साम्यमारोग्यं वैषम्यं व्याधिरुच्यते ।

सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च ॥१३॥

  • अर्थात वात, पित्त एवं कफ (तीनों दोष) का सम अवस्था में रहना ही आरोग्य कहलाता है और इन तीनों दोषों की विषमता अर्थात् विषम अवस्था में रहना रोग कहलाता है। आरोग्य का दूसरा सुख है और विकार का दूसरा नाम दुःख है।

व्याधि के भेद

साध्योऽसाध्य इति व्याधिर्द्विधातौ तु पुनर्द्विधा।

सुखसाध्यः कृच्छ्रसाध्यो याप्यो यश्चाप्रतिक्रियः।।१४।।भैषज्यरत्नावली

  • अर्थात व्याधियाँ साध्य एवं असाध्य भेद से दो प्रकार की होती हैं । साध्य व्याधियाँ भी सुखसाध्य एवं कृच्छ्रसाध्य भेद से २ प्रकार की होती हैं। याप्य एवं अप्रतिक्रिय भेद से व्याधियों के और प्रभेद होते हैं।
  • याप्य व्याधियाँ वे हैं, जिनकी चिकित्सा होते रहने तक दबी रहती हैं और चिकित्सा (औषधि) छोड़ देने पर पुनः तीव्र हो जाती हैं।
  • अप्रतिक्रिय व्याधियाँ वे हैं जिनका प्रतिकार इलाज या चिकित्सा से सम्भव नहीं, जैसे आजकल कैंसर, एड्स आदि ।

पापज और कर्मज भेद से व्याधियाँ

तत्रैकः पापजो व्याधिरपरः कर्मजो मतः।

पापजः प्रशनं याति भैषज्यसेवनादिना॥१५॥

यथाशास्त्रविनिर्णीतो यथाव्याधिचिकित्सितः।

न शमं याति यो व्याधिः स ज्ञेयः कर्मजो बुधैः॥१६॥

पुनः व्याधियाँ दो प्रकार की होती हैं—

१. पापज, २. कर्मज।

  • पापज व्याधियाँ इसी जन्म में मिथ्या आहार-विहार आदि मिथ्याचरणस्वरूप उत्पन्न होने वाली होती है। इन्हें वात- पित्त- कफसमुद्भव दोषज व्याधियाँ भी कहते हैं तथा
  • दूसरी व्याधियाँ कर्मज कही जाती हैं। इनमें से पापज व्याधियाँ औषध सेवनादि उपचार एवं युक्ति आदि से शान्त जाती हैं तथा जो व्याधि निदानादि रोगनिर्णयानुसार व्याधिसात्म्य चिकित्सा करने पर भी शान्त नहीं हो तो उसे कर्मज व्याधि समझना चाहिए।

मृत्यु की दुर्निवारता

न जन्तुः कश्चिदमरः पृथिव्यामेव जायते।

अतो मृत्युरवार्य्य स्यात्किन्तुरोगो निवार्यते॥१७॥

  • अर्थात इस पृथ्वी पर कोई भी प्राणि (व्यक्ति) अमर नहीं है, मृत्यु अनिवार्य है। किन्तु औषधि एवं युक्ति आदि चिकित्सा से रोगों का निवारण किया जा सकता है।

रोग की उपेक्षा का फल

याप्यत्वं याति साध्यस्तु याप्यो गच्छत्यसाध्यताम्।

जीवितं हन्त्यसाध्यस्तु नरस्याप्रतिकारिणः॥१८॥

  • अर्थात जो मनुष्य रोग की उपेक्षा करता है अर्थात् रोग के प्रारम्भ काल से ही उसकी चिकित्सा आदि उपचार (चिकित्सा) नहीं करता है तो वह साध्य रोग कुछ समय में ही याप्य हो जाता है और याप्य रोग असाध्य हो जाता है।
  • यदि असाध्य रोग की उपेक्षा की जाय अर्थात् चिकित्सा न की जाय तो वह रोग उस व्यक्ति (रोगी) को मृत्यु को प्राप्त करा देता है ।

उपेक्षा से रोगों का परिवर्तन

याप्याः केचित्प्रकृत्यैव केचिद्याप्या उपेक्षया ।

प्रकृत्या व्याधयोऽसाध्याः केचित् केचिदुपेक्षया ।।१९।।

  • कुछ रोग स्वभाव से ही याप्य या असाध्य होते हैं और कुछ रोग उपेक्षित होने अर्थात् सावधानी से चिकित्सा नहीं कराने से याप्य एवं असाध्य हो जाते हैं ।

मृत्यु के भेद

एकोत्तरं मृत्युशतमस्मिन् देहे प्रतिष्ठितम् ।

तत्रैकः कालसंयुक्तः शेषास्त्वागन्तवः स्मृताः॥२०॥

  • इस शरीर में १०१ प्रकार की मृत्यु स्थित है, उनमें एक ही काल मृत्यु है शेष १०० मृत्यु अकाल या आगन्तुक मृत्यु है।

काल की प्रबलता

ये त्विहागन्तवः प्रोक्तास्ते प्रशाम्यन्ति भेषजैः।

जपहोमप्रदानैश्च कालमृत्युर्न शाम्यति॥२१॥

पीडितं रोगसर्पाद्यैरपि धन्वन्तरिः स्वयम् ।

सुस्थीकर्तुं न शक्नोति कालप्राप्तं हि देहिनम्॥२२॥

  • अर्थात जो आगन्तुक मृत्यु है वह औषध, जप, होम, दानादि से शान्त (रुक सकती है) हो सकती है किन्तु जो कालमृत्यु है वह किसी प्रकार से शान्त नहीं हो सकती है, अर्थात् कालमृत्यु दुर्निवार है।
  • कालमृत्यु के वशीभूत व्यक्ति चाहे ज्वर से पीड़ित हो या सर्पादि दंष्ट से व्यथित हो, उसे स्वयं साक्षात् भगवान् धन्वन्तरि स्वस्थ करने में समर्थ नहीं हो सकते हैं ।

आयुष्य कर्माभाव से मृत्यु

आयुष्ये कर्मणि क्षीणे लोकोऽयं दूयते यदा।

नौषधानि न मन्त्राश्च न होमा न पुनर्जपाः।

त्रायन्ते मृत्युनोपेतं जरया चापि मानवम् ॥२३॥ वर्त्याधारस्नेहयोगाद् यथा दीपस्य संस्थितिः।

विक्रियाऽपि च दृष्टैवमकाले प्राणसंक्षयः ॥२४॥

  • ज्योतिस्तत्त्व में कहा गया है कि आयु को बढ़ाने वाले कर्मों के क्षय होने पर मैं ही सभी प्राणियों को पीड़ित करता हूँ। उस समय न औषधियाँ, न मन्त्र, न होम और न ही जप आदि कोई भी साधन बुढ़ापा और मृत्यु से ग्रसित मनुष्य को बचा नहीं सकते हैं। जैसे दीपक में स्नेह, बत्ती सब साधन रहते हुए भी वायु के झोंके से दीपक अचानक बुझ जाता है वैसे ही आयु के शेष रहने पर भी रोगादि कारणों से भी असमय में मृत्यु हो जाती है।

वैद्य/चिकित्सक आयु का प्रभु नहीं

व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः ।

एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः॥२५॥

  • व्याधि के तत्त्व अर्थात् व्याधि का स्वरूप, लक्षण और व्याधि का निदान (कारण) का ठीक-ठीक परिज्ञान तथा रोग की चिकित्सा द्वारा रोग का शमन अर्थात् रोग का नाश करना, यही वैद्य (चिकित्सक) का मुख्य कार्य है । इसके अतिरिक्त वैद्य आयु का ईश्वर नहीं है अर्थात् आयु को बढ़ा नहीं सकता है।

अचिकित्स्य रोगी

यादृच्छिको मुमूर्षुश्च विहीनः करणैश्च यः।

वैरी च वैद्यविद्वेषी श्रद्धाहीनः सशङ्कितः॥२६॥

भिषजामनियम्यश्च नोपक्रम्यो भिषग्विदा।

एतानुपाचरन् वैद्यो बहून् दोषानवाप्नुयात्॥२७॥

  • श्रेष्ठ एवं विद्वान् को चाहिए कि वह इन लक्षणों से युक्त रोगियों की चिकित्सा नहीं करे; यथा – १ . स्वेच्छाचारी, २. मरणासन्न, ३. इन्द्रियशक्ति से रहित, ४. अपने शत्रु, ५. वैद्यों से द्वेष करने वाला, ६. श्रद्धाहीन (वैद्य या आयुर्वेद पर जिसकी श्रद्धा नहीं हो), ७. शंकालु (हमेशा वैद्य, औषध एवं परिजनों से सशंकित) तथा ८. वैद्य की आज्ञा न मानने वाले रोगी की चिकित्सा नहीं करे । इनकी चिकित्सा करने पर वैद्य को अनेक प्रकार के लांछन (दोष) सहने पड़ते हैं। रोग शान्त न होने पर यशोहानि, अर्थहानि, वैद्यनिन्दा, अज्ञान, लोलुप आदि अनेक प्रकार के दोष लगते हैं

चिकित्सा का काल

यावत्कण्ठगताः प्राणा यावन्नास्ति निरिन्द्रियः।

तावच्चिकित्सा कर्तव्या कालस्य कुटिला गतिः॥२८॥

  • अर्थात जब तक कण्ठ में प्राण हो, जब तक इन्द्रियों की शक्ति नष्ट न हो, तब तक रोगी की चिकित्सा करनी चाहिए क्योंकि काल की गति बड़ी टेढ़ी है । कभी-कभी मरणासन्न रोगी भी स्वस्थ हो जाता है। इसे समझना बड़ा ही कठिन है।

रोग की अविलम्ब चिकित्सा

जातमात्रश्चिकित्स्यस्तु नोपेक्ष्योऽल्पतया गदः ।

वह्निशस्त्रविषैस्तुल्यः स्वल्पोऽपि विकरोत्यसौ ॥ २९ ॥

यथा स्वल्पेन यत्नेन छिद्यते तरुणस्तरुः।

स एवाति प्रवृद्धस्तु छिद्यतेऽति प्रयत्नतः॥३०॥

  • रोग उत्पन्न होते ही तुरन्त चिकित्सा करनी चाहिए। रोग को सामान्य कह कर उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि सामान्य रोग भी अग्नि, शस्त्र एवं विष के समान अल्प परिमाण में होने पर भी महान् विकार उत्पन्न करता है। जैसे छोटा पौधा स्वल्प यत्न से काट दिया जाता है, किन्तु बड़ा वृक्ष बहुत परिश्रम से काटा जाता है।

चिकित्सा के भेद

आसुरी मानुषी दैवी चिकित्सा त्रिविधा मता।

शस्त्रैः कषायैर्लोहाद्यैः क्रमेणान्त्याः सुपूजिताः।।

  • अर्थात १. आसुरी, २. मानुषी तथा ३. दैवी; इन भेदों से चिकित्सा तीन प्रकार की है। शस्त्र (चीर-फाड़) द्वारा की जाने वाली चिकित्सा को आसुरी, वनस्पतियों के स्वरस, कल्क, क्वाथ, हिम-फाण्टादि द्वारा की जाने वाली चिकित्सा को मानुषी और देवार्चन-पूजन-जप- होम- दान-प्रवचन- कीर्तन-श्रवण-दक्षिणा आदि द्वारा ग्रहशान्ति कराकर चिकित्सा करना दैवी चिकित्सा | कही जाती है । इन तीनों में दैवी चिकित्सा श्रेष्ठ है।
  • विमर्श – रसशास्त्र में भी चिकित्सा के यही तीन भेद बताये गये हैं। किन्तु दैवी चिकित्सा की परिभाषा में होमाद्यै या लोहाद्यै शब्द या पूजा-पाठ का उल्लेख नहीं किया गया है। वहाँ पर | पारद के द्वारा की जाने वाली चिकित्सा को ही दैवी चिकित्सा कहा है। यथाह आचार्य बिन्दुः –

सा दैवी प्रथमा सुसंस्कृतरसैर्या निर्मिता तद्रसैचूर्णस्नेहकषायलेहरचिता स्यान्मानवी मध्यमा ।

लोहाद्यै इति पाठभेदः ।

अधिक जानकारी के लिए अमृतम पत्रिका पढ़ें।

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