कोरोना वायरस का इलाज घर पर कैसे करें?

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 शायर शकील आज़मी लिखते हैं….

हार हो जाती है, जब मान लिया जाता है!

जीत, तब होती है जब ठान लिया जाता है!!

कोरोना या अन्य किसी भी तरह के
मारक संक्रमण से बचने हेतु और
उपचार के लिए मनुष्य की रोगप्रतिरोधक
क्षमता अथवा अपने प्रतिरक्षा प्रणाली का
मजबूत होना सर्वश्रेष्ठ उपाय है।
हिम्मत भी बहुत बड़ी ओषधि है।

इम्युनिटी बढ़ाने के लिए अमृतम कम्पनी द्वारा निर्मित आयुष की काढा पूरे परिवार को पिलाएं।

ये तरीके हैं कोरोना इलाज के—

■ शरीर में कफ सूखने न देंवें।

■ हल्दी, सोंठ, अदरक की मात्रा अधिक न लें।

■ फेफड़ों को साफ रखने के लिए रोज अधिक से अधिक गहरी सांस लें।

■ स्वच्छता का ध्यान रखें।

■ रात में दही, अरहर की दाल का सेवन न करें।

■ नमकीन दही न लेवें। छाछ पी सकते हैं।

■ सुबह उठे ही ज्यादा पानी पिये।

■ कब्ज न बनने दें

■ काया की तेल से धूप में बैठकर अभ्यंग करें।

■ प्राणायाम, योगा, ध्यान की आदत बनाएं

■ शिव कवच का पाठ करें।

■ राहुकाल में राहु की तेल का दीपक जलाएं। क्योंकि यह प्रकोप राहु की वजह से फैल रहा है।

■ सप्ताह में एक बार लंघन यानि उपवास करें।

जीवन को झंझट मुक्त कैसे बनाये…

■ प्रातः सूर्योदय के समय की धूप लेवें
■ काया की तेलं मालिश कर स्नान करें।
■ नीम के जल से स्नान करें
■ कालीमिर्च, लालमिर्च खाने की मात्रा
बढ़ाएं, इससे रक्त साफ होगा जिससे
संक्रमण का भय नहीं होगा।
■ सुबह नाश्ते में मीठा दही लेवें।
■ सूर्य को जल देवें।
■ बिना स्नान के अन्न ग्रहण न करें।
■ शिंवलिंग पर दूध अर्पित करें।
■ घर में गंगाजल का छिड़काव करें।
■ घर में हवन करें।
■ ॐ नमःशिवाय मन्त्र का जाप करें
■ नॉनवेज भोजन न लेवें।

अभी तक देखा गया है जिस जगह
माँस का सेवन अधिक हो रहा है
वहीं कोरोना ज्यादा फेल रहा है।
और भी सावधानी-समझदारी बरतें-

■ नियमित रूप से हाथ धोवें।
■ खाँसने और छींकने पर मुंह और
नाक को ढंके।
■ खांसी और छींकने जैसी सांस
की बीमारी के लक्षण दिखने वाले
किसी के भी निकट संपर्क से बचें।
■ सुबह और शाम नहाने की आदत डालें।

कोरोना वायरस का स्थाई हल और

इलाज, चिकित्सा, हर्बल मेडिसिन

या आयुर्वेदिक दवा जानने के लिए अमृतम पत्रिका गुग्गल पर सर्च करें।

कोरोना के शुरुआती लक्षण….
कोरोना संक्रमण के सामान्य संकेतों में

{१} गले में खराश,
{२} कफ का सूखना,
{३} श्वास लेने में परेशानी, कठिनाई
{४} बार-बार छींक आना,
{५} छाती में खरखराहट,
{६} लगातार जुकाम बने रहना,
{७} नाक बहना आदि ये सब विकार

श्वास नलिकाओं एवं फेफड़ों की खराबी
या संक्रमण को इंगित करता है।

इसके अलावा
{८} सांस/श्वसन संबंधी लक्षण,
{९} बुखार, खांसी और
{१०} प्राणवायु लेने में कठिनाई शामिल हैं।
और अधिक गंभीर मामलों में
{११} संक्रमण से निमोनिया,
{१२} गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम,
{१३} गुर्दे [किडनी] की विफलता।

{१४} सूंघने की क्षमता कम या खत्म होना।
{१५} पैर में अगर छोटे-छोटे लाल या
गुलाबी घाव दिखने लगे, तो तुरन्त
समझ जाना चाहिए कि-
कोरोना वायरस का हमला होने
वाला है। इसके पश्चात वो सारे सिम्टम्स
दिखने लगेंगे, जो कोरोना वायरस के
संक्रमण पर प्रकट होते हैं।
{१६} यहां तक ​​कि तत्काल मृत्यु भी हो
सकती है। इस तरह के किसी भी लक्षण
हों, तो उसे छुपायें नहीं, तुरन्त शासकीय
चिकिसक से सलाह लेवें और

आयुष मंत्रालय

द्वारा जारी आरोग्य सेतु एप्प
गूगल से डाउनलोड कर भारत सरकार को
जानकारी भेजें।

अमृतम च्यवनप्राश या फ्लूकी माल्ट का सपरिवार सेवन करते रहें

विश्व वैज्ञानिक अब प्राचीन चिकित्सा द्वारा प्रतिरक्षा प्रणाली वृद्धि हेतु बढ़ावा दे रहे हैं।
यह स्वस्थ्य रहने के लिए जरूरी है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO ने भी सुझाया
है कि-भविष्य में वही व्यक्ति स्वस्थ्य और
सुरक्षित रह पायेगा, जिसका इम्युन सिस्टम स्ट्रांग होगा। क्योंकि अब दुनिया में कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक वायरस फैलने वाले हैं। जिन मनुष्यों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होगी, उन कर यह पुरानी कहावत चरितार्थ
सिद्ध होगी कि- चट मंगनी-पट ब्याह।
मतलब इधर बीमारी आई, उधर एक या दो दिन में जय सियाराम…..

कायदे से चलने पर होंगे-फायदे…
अभी से ही सभी सामान्य या बड़े खानदान के लोग अपने खानपान में आयुर्वेद को जोड़े…

कोरोना की खोज–

हाल ही में डब्ल्यूएचओ-WHO
(विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने कोरोना वायरस
को 2019-एनकोवी/COVID-19
नाम दिया है यह अध्ययन पत्रिका
मेडिकल वाइरोलॉजी में प्रकाशित
हुआ है।

इस शोध में कोरोना वायरस से हाल
ही में फैले निमोनिया की उत्पत्ति के
बारे में जानकारी दी गई है।
कोरोनावायरस (nCoV) एक नया
संक्रमण है, जो आज से पहले मनुष्यों
में पहचाना नहीं गया है।

इसे पढ़ो-ना, कोरोना के लिए….
कोरोना वायरस (Corona Virus)
एक RNA वायरस है। डब्ल्यूएचओ ने
खोजा कि-पल में प्रलय लाने वाला यह
कोरोना संक्रमण का असर एक से दूसरे
इंसान को छूने, छींकने या खांसने से फैल सकता है। एक प्रकार से कोरोना छुआछूत की बीमारी है। प्राचीन समय में भारत की संस्कृति में छुआछूत का बहुत पालन किया जाता था। जैसे-

【1】बिना स्नान रसोई

में प्रवेश वर्जित था।

【2】प्रत्येक तीज-त्यौहार पर दरवाजे पर गाय के गोबर से लेप किया जाता था।

【3】स्नान के पश्चात ही भोजन भक्षण की अनुमति थी।

【4】बीमारियों से बचने के लिये आदिकालीन उपनिषद, सहिंता, ग्रन्थ ज्योतिष, आयुर्वेद आदि में छुआछुत का बहुत महत्व बताया है।

विद्वानों की वाणी….

कश्यप, वशिष्ठ, पराशर, देवल आदि
महर्षियों ने पवित्रता, शुद्धिकरण के अनेक
फायदे बताएं हैं।

गर्ग संहिता, चरक संहिता में भी छुआछूत
के अनेक ऐतिहासिक सूत्र विद्यमान हैं।
हमारे भारत में छींक भी विकार बढ़ाने में कारगर माना है, इसलिए छींक को भी अपशकुन बताया है। क्योंकि छींक के विषाणु से बीमारी फैल सकती है।

छींक भी छुआछूत क्यों?

इसका कारण जानने के लिए अमृतमपत्रिका का सूतक वाला ब्लॉग पढ़ें।

छुआछूत के बारे में बताते हैं यह ग्रन्थ…
शूद्रक चरित, साहसांक चरित, हर्षचरित, विक्रमांकचरित, पृथ्वीराज रासो तथा बुद्धचरित आदि में लिखा है कि- शरीर को जितना चरित्रवान रखोगे, वह उतना ही आत्मविश्वास से भरा रहेगा। तन की तंदरुस्ती के लिए पवित्रता पहला प्रयास है, इसी से मन हल्का और शान्त रहेगा।

साफ-सफाई, पवित्रता के कारण ही दक्षिण भारत के किसी भी शिवालय और देवालयों में मूर्ति तक अंदर जाने की अनुमति नहीं है।

केवल बाहर से ही दर्शन करने की इजाजत है। मन्नते हैं कि-प्रतिमा को छूने से वह अशुद्ध हो सकती है।

आयुर्वेद में छुआछुत के बारे में पर्याप्त
मात्रा में संस्कृत के श्लोक तथा
सामग्री सुलभ है।

कोरोना वायरस (सीओवी) वायरस
अछूत विषाणुओं का एक बहुत बड़ा
परिवार है, जो छूने से फैलता है। सामान्य
सर्दी-खांसी, जुकाम से लेकर गंभीर बीमारियों जैसे मध्य पूर्व रेस्पिरेटरी सिंड्रोम
(MERS-CoV) और सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (SARS-CoV) को जन्म देता है।

कैसे-कैसे तर्क और कुतर्क पर विज्ञान का वर्क……

कोरोना से केवल बचोना
इससे भी ज्यादा खराब स्थिति है
अन्य कारणों से मरने वालों की।

इम्पीरियल कॉलेज लंदन के चिकित्सा
वैज्ञानिकों का अनुमान है….
कोरोना काबू में नहीं आया, तो अमेरिका
में 22 लाख ब्रिटेन में 5 लाख और पूरी
दुनिया में 20 लाख से
ज्यादा मौतें हो सकती हैं।
डब्लूएचओ का आंकड़ा है कि- पूरे वर्ष विश्व में

@ भुखमरी से 80 लाख,
@ मोटापे या ज्यादा खाने से 90 लाख

@ एक्सीडेंट 11 लाख और

@ 8 लाख के करीब लोग आत्महत्या यानि सोसाइड करके खत्म हो जाते हैं।

@ 55 लाख लोग प्रदूषण की वजह से
@ 88 लाख लोग केंसर जैसी घातक बीमारी से मर जाते हैं।

@ 55 लाख मात्र स्वाभाविक
मौत मरते हैं। कुल मिलाकर सब तरीके से लगभग 4 से 5 करोड़ लोग हर साल इस भौतिक दुनिया से अलविदा हो जाते हैं। इसकी संख्या अभी ओर अधिक भी हो सकती है।
मतलब हर महीने 35 से 40 लाख मनुष्य मौत के मुख में समा जाते हैं।

कहीं बेजुबानों का रोना, तो नहीं है कोरोना….

दुनिया भर में 600 करोड़ तरह की
जीव-जंतु, पशु-पक्षी की प्रजातियां थी,
जिसमें 500 करोड़ प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं अर्थात अब वे, इस पृथ्वी पर बचीं ही नहीं हैं।

शम्भू त्याग बिना नहीं मिलता,

चाहे कर लो लाख उपाय….
क्या केवल मनुष्यों की रक्षा करने से
सृष्टि चल पाएगी। लोग इस पर भी विचार करें।
लोगों की लूूूटमार-लोलुपता, लोभ ने सब लील लिया। दुनिया के सभी मुखिया मृत्यु के मार्ग को रोकने की कोशिश कर रहे है। क्या यह सम्भव है?

धर्मशास्त्रों के मुताबिक मृत्यु क्या है…
मौत का कारण मुख्य 8 प्रकार का होता है!
जैसे-@बुढ़ापा, @रोग, @दुर्घटना,
@अकस्मात आघात, @शोक, @चिंता
@लालच मृत्यु के मुख्य रूप है।

गरुड़पुराण में मृत्यु के 101 स्वरूपों का वर्णन है।

महाकाल सहिंता में बताया है-किसी भी जीवात्मा अर्थात प्राणी के जीवन के अन्त को मृत्यु कहते हैं।
वृद्धावस्था, लालच, मोह, रोग, कुपोषण, भुखमरी, दुर्घटना भी मृत्यु का ठोस कारण होता है।
जन्म व मृत्यु की यथार्थ स्थिति को समझने
हेतु श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करें-

जातस्य हि धु्रवो मृत्युध्र्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।

श्रीमद्भागवत !!२७!!
अर्थात- मनुष्य जैसे पुराने वस्त्रों को छोड़कर नये वस्त्र धारण कर लेता है वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरे नये शरीर में चली जाती है।

गीता 2-27 के मुताबिक

जातस्य ही ध्रुवो मृत्यु,
ध्रुवम् जन्म मृतस्य च,
तस्माद् अपरिहार्येर्थे,
न त्वम् शोचितुमर्हसि…..
मृत्यु शाश्वत सत्य है।
दुनियाभर के लोग दैविक काल से देख रहे हैं

जो जाके न आए, वो जवानी भी देखी!
जो आके न जाये, वो बुढापा भी देखा!!

जगन्नाथ का ऊपर से हाथ हो,
उसका सदैव साथ हो, इस बात को
कोई झुठला नहीं सकता।

यह ज्ञान भी कभी काम आएगा….

ईश्वर जीवात्माओं को नाना प्रकार की योनियों में जन्म देता है। जिन-जिन योनियों में जिसको जन्म मिलता है, उन-उन योनियों में रहकर जीवात्मा अपने पूर्वजन्मों के कर्मों का भोग करते हैं। भोग करने के बाद मृत्यु आने पर जो कर्म भोग करने के लिए शेष रह जाते हैं उनके अनुसार फिर नया जन्म होता है।

मनुष्य योनि एकमात्र ऐसी योनि है जिसमें मनुष्य पूर्वजन्मों के कर्मों को भोगता भी है और नये शुभ व अशुभ कर्मों को करके उनका संचय कर आत्मा की उन्नति व अवनति करता है। इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि धर्मात्मा मनुष्य जन्म में आत्मा की उन्नति करते हैं और धर्महीन लोग अवनति कर दुःखों के भागी बन परजन्मों में दुःखों को भोगते हैं।

जीवात्मा को मनुष्य जन्म में यह सुविधा भी दी गई है कि वह ईश्वरीय ज्ञान वेदों का अध्ययन करे, वेद विहित कर्मों ब्रह्मचर्य पालन, ईश्वरोपासना अर्थात् ईश्वर के गुणों का ध्यान व चिन्तन, यज्ञादि कर्म, माता-पिता-आचार्य आदि की सेवा व सत्कार, सभी प्राणियों के प्रति दया, हिंसा का पूर्ण त्याग, समाज व देश का उपकार आदि कार्य करे।

विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
रुग्णस्य चौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च।।

अर्थात : प्रवास की मित्र विद्या, घर की मित्र पत्नी, मरीजों की मित्र औषधि और मृत्योपरांत मित्र धर्म ही होता है।

ऊपरवाले का उदघोष है, यही अमॄतम का भी स्लोगन है….
।।ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।।

अर्थात : हे ईश्वर (हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

उक्त प्रार्थना करते रहने से व्यक्ति के जीवन से अंधकार मिट जाता है। अर्थात नकारात्मक विचार हटकर सकारात्मक विचारों का जन्म होता है।

मौर्यकाल में जहां नीतिज्ञों में चाणक्य का नाम विख्यात था, वहीं दार्शनिकों और मनोवैज्ञानिकों में पाणिनी और पतंजलि का नाम सम्मान के साथ लिया जाता था। शरीर वैज्ञानिकों में पिङ्गल, वाग्भट्ट, जीवक आदि महान महर्षि थे।

सामवेद 11.5.19 में कहा गया है-

ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत।

र्ब्रह्मचर्य के तप से देवों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की।

अर्थात : मानसिक और शारीरिक शक्ति का संचय करके रखना जरूरी है। इस शक्ति के बल पर ही मनुष्य मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है। शक्तिहिन मनुष्य तो किसी भी कारण से मुत्यु को प्राप्त कर जाता है। ब्रह्मचर्य का अर्थ और इसके महत्व को समझना जरूरी है।

उलझन नाशक उपाय….

यदि हम लगातार नियमित

अमॄतम च्यवनप्राश का सेवन करें, तो जीवन में रोग के कभी रास्ते जाम यानि बन्द होने लगते हैं। यह

निगेटिव विचार व विकार के विष का विनाश कर इम्युनिटी पॉवर बढ़ता है।

अमृतम दवाएं-रोग मिटाएं

अमॄतम च्यवनप्राश में प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत योग-घटकों का मिश्रण है। यह रोगों को दबाता नहीं, अपितु जड़ से मिटाता है।

स्वास्थ्य है, तो सौ साथ हैं–
स्वस्थ्य व्यक्ति के साथ 100 साथी
सदैव रहते हैं। हमें केवल स्वास्थ्य
को यानि शरीर को संभालना है।
शेष सब ईश्वर पर छोड़ देवें- क्योंंकि…

शिव तो जाने को भी दे,
अनजाने को भी दे।
सारे जहां को दे, वो तुझको भी देगा।
बाबा विश्वनाथ पर यह विश्वास, व्यक्ति
को विकार रहित बना सकता है।
विश्वास ही विश्व की शक्ति है-

भविष्य पुराण में उल्लेख है कि-
भगवान सूर्य के प्रति श्रद्धावान न होने
से लोग अनेकों विकारों से पीड़ित होंगे।
★ जो सूर्य को प्रणाम नहीं करेगा,
★ सूर्य की धूप नहीं लेगा।
★ भगवान भास्कर के दर्शन नहीं करेगा,
★ सूर्य को जल नहीं देगा।
★ ऐसे इंसान किसी न किसी संक्रमण
या वायरस से मरेंगे।

★ सूर्य के बराबर सृष्टि में अन्य कोई चिकित्सक नहीं है।

★ प्रातः सूर्य देव की किरणें सर्वश्रेष्ठ दवा है।

★ सूर्य की कृपा से ही सदैव स्वस्थ्य रहा जा सकता है।

आयुर्वेद के अगदतंत्र में इस तरह
के मृत्यु दायक, मौत के मुख में
तुरन्त पहुंचाने वाली बीमारी या
संक्रमण/वायरस को विष/विषैला/विषाणु आदि विकारों सूर्य का प्रकोप
बताया गया है।

★ सूर्य की रोशनी सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्यवर्द्धक ओषधि है।
★ भविष्य पुराण में भी कोरोना वायरस से मिलती-जुलती बहुत सी बीमारियों के बारे विस्तार से वर्णन है।

आयुर्वेद का वायरस/विष विज्ञान…
विष विज्ञान को आयुर्वेद में अगदतंत्र
कहा गया है। गद का अर्थ रोग,
संक्रमण/वायरस तथा विष होता है
अर्थात् कोई भी विजातीय पदार्थ जो
शरीर के बाह्य या आभ्यांतरिक संपर्क
में आने पर शरीर को हानि पहुँचाता है,
से गद या विष कहते हैं।
वायरस रूपी विष के विभिन्न नाम-
अरबी में इसे जहर तथा आंग्ल भाषा में पॉइजन (Poison) तथा टॉक्सिन (Toxin) कहा जाता है।

नक्षत्रों को नमन-

इसी प्रकार किसी अश्विनी नक्षत्र में जन्मे
हुए व्यक्ति पर कुचला का हानिकर प्रभाव न्यूनतम होगा क्योंकि कुचला अश्विनी
नक्षत्र का वृक्ष है।
अमॄतम आयुर्वेदिक शास्त्रों में कोरोना मिलते-जुलते लक्षणों को फेफड़ों की खराबी, सूर्य नाड़ी बाधक संक्रमण बताया है। कोरोना वायरस के बहुत से लक्षण निमोनिया, सर्दी-खांसी, जुकाम, श्वांस लेने में तकलीफ, गले में लगातार खरास आदि से सम्बंधित है। यह सब परेशानी

जन्मपत्रिका में चंद्रमा ग्रह के कमजोर होने से होती हैं। चन्द्रमा के तीनों

रोहिणी, हस्त और श्रवण

नक्षत्र में जन्में लोगों को भी हो सकती है। इन सब समस्याओं से मुक्ति के लिए सूर्य स्नान की सलाह दी जाती है।

ज्योतिष ग्रंथों में स्वास्थ्य सूत्र

रोगों की रासलीला का रहस्य….
पाप कर्मों का प्रारब्ध मानव को
दु:ख रोग तथा कष्ट प्रदान करता है।
ज्योतिषशास्त्र में

■जन्म कुंडली,

■लग्न कुंडली,

■चन्द्र कुंडली,

■सूर्य कुंडली,

■वर्ष कुंडली,

■प्रश्न कुंडली

■गोचर तथा सामूहिक शास्त्र की विधाएँ व्यक्ति के प्रारब्ध अर्थात पूर्व जन्म के कर्मों का विचार करती हैं। पत्रिका में किसी भी व्यक्ति के पूर्व जन्म का विचार पंचम भाव से किया जाता है।

ज्योतिष धर्म शास्त्र कहते हैं-

जब तक जातक के पुण्य-पाप सम
नहीं होते, तब तक अच्छा स्वास्थ्य
और समृद्धि सम्भव नहीं है।
लग्न, पंचम एवं नवम यह तीनों भाव या हाउस त्रिकोण कहलाते हैं। किसी
भी कुंडली के यह मूल ऊर्जावान
स्थान है। ज्योतिष रहस्योउपनिषद
में लक्ष्मी का प्रतीक भी तरीकों को बताया है।

जन्मपत्रिका के छठवें भाव से जातक
का भविष्य के रोग-शत्रु, कर्जा, उलझन एवं सुख-दु:ख का आंकलन किया जा सकता है। चिकित्सा ज्योतिष में इन्हीं विधाओं के सहारे रोग निर्णय करते हैं तथा उसके आधार पर उसके ज्योतिषीय कारण को दूर करने के उपाय भी किये जाते हैं। इसलिए चिकित्सा ज्योतिष को ज्योतिष द्वारा रोग निदान की विद्या भी कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे मेडिकल ऐस्ट्रॉलॉजी कहते हैं।

प्राचीन समय में चिकित्सा ज्योतिष केे

सभी पीयूषपाणि आयुर्वेदीय चिकित्सक ज्योतिषशास्त्र के ज्ञाता होते थे और वे
किसी भी गम्भीर रोग की चिकित्सा से
पूर्व ज्योतिष के आधार पर रोगी के
आयुष्य तथा साध्यासाध्यता का विचार
किया करते थे।

कोरोना वायरस जैसे संक्रमणों का
उल्लेख भी है-प्राचीन उपनिषदों में…..
श्रीमद्भागवत पुराण के द्वादश स्कंध में कलयुग में धर्म-अधर्म, रोग-निरोग के अंतर्गत महर्षि व्यास के पुत्र त्रिकालदर्शी ‘श्रीशुकदेवजी‘- परीक्षितजी से कहते हैं, जैसे-जैसे घोर कलयुग आता जाएगा, त्यों त्यों
भयंकर व्याधि पैदा होंगी। कृमियों, कीड़े-मकोड़ों की तरह मनुष्य मरेगा।

ऋग्वेद (नारदीयसूक्त) 10-129 के अनुसार
जो जन्मा है वह मरेगा- महादेव को
छोड़कर पेड़, पौधे, प्राणी, मनुष्य,
पितर और देवताओं की आयु
नियुक्त है, उसी तरह समूचे ब्रह्मांड की
भी आयु है। इस धरती, सूर्य, चंद्र सभी
की एक निश्चित आयु है।
आयु के इस चक्र को समझने वाले
समझते हैं कि-प्रलय भी जन्म और मृत्यु और पुन: जन्म की एक प्रक्रिया है।

कलयुग का दुष्प्रभाव…..
उत्तरोत्तर धर्म, सत्य, ईमानदारी, सच्चाई पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मरणशक्ति का लोप होता जाएगा।
50000 वर्ष पुराने ग्रंथों में इस तरह की
विष व्याधि “पल में प्रलय” यानी क्षण में
छिन्न करने वाली बताई गई है।

क्या कहते हैं-वेद-पुराण….
जन्म एक सृजन है तो मृत्यु एक प्रलय…
हिन्दू पुराणों में प्रलय के चार प्रकार
बताए गए हैं-
【1】नित्य,
【2】नैमित्तिक,
【3】द्विपार्थ और
【4】प्राकृत।
सृष्टि में निर्माण और विनाश की यह
प्रक्रिया निरंतर चलायेमान है।
इस मायारूपी ब्रह्माण्ड में
पल-प्रतिपल प्रलय होती रहती है…
किंतु जब महाप्रलय या सन्सार का महाविनाश होने वाला होता है, तब प्रकृति संक्रमण या वायरस से लबालब हो जाती है। सन्सार में ऐसे रोग फैलन लगते हैं, जो पल में प्राणी के प्राण हरण कर लेते हैं।
हम लोग भी प्रतिदिन, प्रतिपल अपने शरीर
के प्रति लापरवाही कर रोग प्रतिरोधक
क्षमता को हानि पहुंचाकर स्वास्थ्य का प्रलय कर रहे हैं।
शरीर में जैसे-जैसे प्रतिरक्षा प्रणाली
कमजोर यानि इम्युनिटी पॉवर घटता
चला जाता है, तो वह विकारों से
संक्रमित होने लगता है, जिससे
किसी भी तरह की बीमारी या
वायरस तन को तुरन्त जकड़ लेते हैं।

जब अंदर का रस कम हो जाता है, तो
बाहर के रस जकड़कर तन को वायरस युक्त बना देते हैं…..

कभी-कभी कोई ऐसा अनिष्टकारी समय होता है जिसमें प्राणिज, खनिज अथवा
जीव-जंतुओं से उत्पन्न होनेवाला या
फैलने वाला संक्रमण (जान्तव) किसी
भी प्रकार के विष प्रयुक्त होने पर वह
रोगी के लिये मृत्युकारक अथवा
मरणासन्न स्थिति उत्पन्न करने
वाला होता है।

योग-रत्नाकर के एक मन्त्र अनुसार-

औषधं मंगलं मंत्रो,
हयन्याश्च विविधा: क्रिया।
यस्यायुस्तस्य सिध्यन्ति न
सिध्यन्ति गतायुषि।।

अर्थात …..
औषध, अनुष्ठान, मंत्र-यंत्र,
तंत्रादि उसी रोगी के लिये सिद्ध होते हैं,
जो नियम-धर्म से चलते हैं एवं जिसकी
आयु शेष होती है। जिसकी आयु शेष
नहीं है; उसके लिए इन क्रियाओं से कोई सफलता की आशा नहीं की जा सकती।

संस्कृत का स्वस्थ्य सूत्र है-

व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं
दीर्घायुष्यं बलं सुखं।
आरोग्यं परमं भाग्यं
स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥
अर्थात…
व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल
और सुख की प्राप्ति होती है।
निरोगी होना परम भाग्य है और
स्वास्थ्य से ही सन्सार अन्य सभी
कार्य सिद्ध हो सकते हैं॥

कलयुग में कलदार की धार….
संस्कृत साहित्य में कलयुग के
चिकित्सको के बारे में पहले ही चेता
दिया था कि-
भविष्य में चिकित्सक मरीजों के रोग
मिटाने के लिए चिंतन न करके, रोगियों
में चिन्ता का भाव उत्पन्न कर देंगे।
आयुर्वेद में भी वैद्यों की प्रशंसा
तथा निन्दा दोनों के बारे में लिखा है-
प्रशंसा में ; उन्हें “पीयुषपाणि” अर्थात
हाथ मे अमृत लिये हुए जीवनदाता
कहा गया है और निन्दा में
‘यमराज‘ का भाई तक
लिख दिया। दोनों परिस्थितियों में अतिशयोक्ति का उपयोग किया गया है। अतः इस सुभाषित को तदनुसार अपने अनुभव के आधार पर लेना चाहिये |

सुभाषित रत्नाकर के मुताबिक

प्रवर्तनार्थमारम्भे मध्ये त्वौषधहेतवे।
बहुमानार्थमन्ते च जिहीर्षन्ति चिकित्सकाः।
श्लोक का अर्थ –
चिकित्सक (डाक्टर) प्रारम्भ में अपने प्रचार हेतु और फिर दवाओं की बिक्री तथा आत्मसम्मान के लिये अच्छा इलाज करते हैं और अन्तत: बीमार व्यक्तियों को लूटने की भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। सब कर्मों का फल है…..

कर्मज व्याधि-विकार क्या है…..
आयुर्वेदिक निघण्टु तथा श्रीमद्भागवत
गीता के मुताबिक कर्मज व्याधियां हमारे कर्म-कुकर्मों के कारण उत्पन्न होती हैं।
ग्रह सुख-दु:ख, रोग, कष्ट, सम्पत्ति,
विपत्ति का कारण नहीं होते। इन
फलों की प्राप्ति का कारण तो मनुष्य के शुभाशुभ कर्म ही होते हैं। मनुष्य ने जो
कुशल या अकुशल कर्म पूर्व-जन्मों में
किये होते हैं, जन्म कुंडली में ग्रह उन्हीं
के अनुसार, राशियों एवं भावों में विभिन्न स्थितियों में बैठकर भावीफल की
सूचना देते हैं।
जिस व्याधि का निर्णय चिकित्सकों द्वारा शास्त्रोक्त विधि से किया जाकर चिकित्सा
की जावे फिर भी वह व्याधि शान्त न हो,
तब उसे कर्मज व्याधि जाननी चाहिये। उसकी चिकित्सा भेषज के साथ अनुष्ठानों, मंत्र, तंत्रादि द्वारा करना लाभकारी होता है।

कष्टदायक असाध्य रोगों से मुक्ति के लिए
चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भेल संहिता, अष्टांग संग्रह, अष्टांग हृदय, चक्रदत्त, शारंगधर, भाव प्रकाश, माधव निदान, योगरत्नाकर तथा

कश्यपसंहिता

आदि आयुर्वेदीय ग्रन्थों में अनेक सूत्र दिये गए हैं।

अमृतम आयुर्वेदिक उपाय कोरोना से सुरक्षा अंतिम उपचार है।

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