७ अक्षर का चमत्कारी मन्त्र

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अनुसरण अवश्य करें!
!!ॐ!! के बारे में दुर्गा सप्तशती में बताये गए हैं- चमत्कारी प्रभाव और रहस्य…
 
इस लेख में केवल !!ॐ!! के विषय में 
लिखा गया है। अगले ब्लॉग में 
 !!नमश्चचण्डीकायै!! के रहस्य जाने–
 

दुर्गा सप्तशती का प्रथम चरित्र अर्थात

पहला अध्याय

     !!ॐ नमश्चचण्डीकायै!!
मन्त्र से आरम्भ होता है।

यह सात अक्षर का माँ महाकाली
जगदम्बा का मन्त्र है।
इस मंत्र के आरम्भ में ॐकार का प्रयोग निम्नांकित कारणों से किया गया है-
“प्रपंचसार ग्रन्थ” में कहा गया है-
अस्य तु वेदादित्वात 
सर्वमनुनां प्रयुज्यतेsथादौ।
 
【१】!!!! में 3 अक्षर हैं- अ, उ और 
ऋग्वेद के आरम्भ “अग्निमीले” के
अकार से शुरू होता है। इसलिए !!!!
को वेदादि भी कहते हैं।
 इसीलिए इसका प्रयोग सर्वप्रथम मन्त्र के आदि से किया गया है।
【२】आगे लिखा है-
सर्वमन्त्रप्रयोगेषु ओमित्ययादौ प्रयुज्यते।
तेन सम्परिपूर्णानि यथोक्तानि भवन्ति हि।
जप्त्वा च प्रणवं चादौ स्तोत्रं वा सहिंता पठेत।
अन्ते च प्रणवं द्द्यादित्युवाचादि पुरुष:।
 
संक्षिप्त में इसका अर्थ यही है कि कोई भी मन्त्र बिना !!ॐ!! के अपूर्ण है। सभी मन्त्रों के आदि यानि शुरू में ॐ का प्रयोग जरूरी है जिससे मन्त्र की पूर्णता और अभीष्ट की सिद्धि होती है।
【३】”नादबिन्दुउपनिषद” में लिखा है-
मंगल्यं पावनँ धर्म्यम सर्वकामप्रसाधनम।
ॐकार परमं ब्रह्म सर्वमन्त्रेषु नायकम।
अर्थात- ॐ मंगलवाची शब्द है। अत्यंत पवित्र है। तन-मन और आत्मा को शुद्ध करने वाला है। सभी कामनाओं की पूर्ति करने में विशेष सहायक है। सन्सार को धारण करने वाला है। ॐ ही ईश्वर, शिव, महादेव अर्थात ब्रह्म का वाचक है तथा सृष्टि के सभी मन्त्रों में प्रधान है।
【४】अवरक्षणे धातु से ॐ शब्द निर्मित होता है। ॐ ही साधक-उपासक की सब प्रकार से रक्षा करने के कारण सर्वप्रथम हर मन्त्र के आरम्भ में ॐ का प्रयोग किया जाता है।
【५】”स्वच्छन्द तन्त्र” में कहा गया है-
प्रणवादया स्मृता मंत्राश्चतुर्वर्गफलप्रदा।
 
ओंकार से प्रारंभ होने वाले मन्त्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष  चारों केे ही 
देने वाले होते हैं अतः किसी भी मन्त्र के शुरू में !!!! का उच्चारण अवश्य करें।
【६】”हठयोगदीपिका” ग्रन्थ में उल्लेख है
मन्त्र के प्रारंभ में ॐ के उच्चारण से साधक उसी प्रकार पाप मुक्त होकर शुद्ध पवित्र हो जाता है कि जिस प्रकार जहरीला नाग केंचुली को त्यागकर फिर से नवीन हो जाता है। पाप केंचुली के समान होता है जिसके छूट जाने पर मानव तन-मन से पाक-साफ हो जाता है।
【७】ॐकार के इन सभी प्रयोजनों के स्मरण करते हुए सदनक का चित्त ध्येय, उद्देश्य या मनोकामना की पूर्ति के लिए एकाग्र होने लगता है।
प्रणवार्थच भाव्यतश्चित्तमेकाग्र सम्पद्यते।
 
【८】श्रीमद्कालितन्त्र में इसी प्रथम चरित्र में देवी को-
सुधात्वमक्षरे नित्ये त्रिधामात्रात्मिका स्थिता-
 कहा गया है।
“शान्तनवी टीका” में इसलिए कहा गया है-
त्रिधामात्रात्मिकेत्येनेन 
ओमात्मकत्वं विवक्षितम।
 
माँ भगवती ॐमात्मक है, इसलिए प्रथम
त्रिधामात्रात्मिका देवी का स्मरण किया गया है।
“भावनोपनिषद” 
नामक पुस्तक में कहा गया है…..
जो साधक ॐ का उच्चारण वैदिक तरीके
से यानि नाभि से  कण्ठ से  का थे ओंठो
से  का प्रतिदिन ५४० बार उच्चारण करने लगे, तो मात्र 15 दिन में बड़ी से बड़ी सिद्धियां पा सकता है। ऐसे साधक पर तन्त्र-मन्त्र-यंत्र, जादू-टोने, टोटके, मारण, उच्चाटन, एवं प्रेत-पिशाच का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता।
!!ॐ!! की साधना करने वालों का कालसर्प-पितृदोष, पितृमातृकाओं एवं मातृमातृकाओं का दोष हमेशा के लिए मिट जाता है।
अधिक जानकारी के लिए सन 2002 में प्रकाशित “कालसर्प विशेषांक” का अध्ययन कर सकते हैं।
विशेष-
ॐ जप की प्रक्रिया हमेशा सदगुरू के
सानिध्य में ही करें।
अगले लेख में काली का सिद्ध मन्त्र
“नमश्चण्डिकायै” 
के बारे में एक बहुत ही दुर्लभ खोज पढ़े।
!!अमृतम!!
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