नर्मदा नदी के रहस्य, जो लोग कम जानते है

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मान्यता है कि नर्मदा नदी के किनारे पूरे 1312 किलोमीटर के पथ पर केवल शिवलिंग के शिवालय ही स्थिर या स्थित रह पाते हैं।

शेष देवी-देवताओं के मंदिर, देवालय यदि बना दिये जायें, तो मां नर्मदा अपने अंचल में समेट लेती है।

माँ नर्मदा को आदिवासियों द्वारा हर साल चुनरी चढ़ाने की परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है। यह दृश्य अत्यंत आनन्ददायक होता है। देखें यह वीडियो-

नर्मदा नदी भगबान शिव का अर्धनारीश्वर रूप है।

नर्मदा =नर+मादा दो का समावेश है।

शिवपुराण के अनुसार-शिवजी पार्वती को बता रहे हैं कि —

नर्मदा सरितांश्रेष्ठा रुद्रवेदाद्विनी सुता।

तीरमेत्सर्व भूतानि स्या वशणी चराणिच।।

अर्थात-

नर्मदा ही नदियों में श्रेष्ठ है। सदाशिव के देह से उत्पन्न होने के कारण इन्हें शिवपुत्री कहते हैं। नर्मदा की विशेषता है कि इस तट पर सर्वाधिक यानि ८४ लाख शिवलिंग स्थापित है।

आदि शंकराचार्य द्वारा केवल माँ नर्मदा के सम्मान में नर्मदाष्टकम कई रचना की थी। अपने काव्य में नदी की स्तुति की गई है।

एक बहुत ही दुर्लभ जानकारी—

आदिशंकराचार्य के गुरु गोविंदापाद स्वामी से मिलने जब ॐकारेश्वर ज्योतिलिंग पर गए, तो गुरु ने आदेश दिया था, तब नर्माशकम की रचना हुई।

सबिन्दुसिन्धुसुस्खलत्तरङ्गभङ्गरञ्जितं

द्विषत्सु पापजातजातकारिवारिसंयुतम्।

कृतान्तदूतकालभूतभीतिहारिवर्मदे

त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥

ज्ञात हो कि गुरु गोविंदापाद स्वामी ने ॐकारेश्वर मंदिर के नीचे गुफा में शिवजी का घनघोर तप करके यहीं मोक्ष प्राप्त किया था। जब भी इस ज्योर्तिलिंग पर दर्शन हेतु जाएं, तो गुरु गोविंदापाद स्वामी से आज्ञा लेकर शिवलिंग के दर्शन करें। आपके जीवन में चमत्कार होना लगेगा।

नर्मदा का अर्थ है-आनंददायिनी माँ। नर्मदा को रेवा या रीवा भी कहा जाता है। रीवा राजघराना मप्र सदियों तक नर्मदा जी की तपस्या में तल्लीन रहा है। रेवा का अपभ्रंश रीवा ही है। रीवा महाराज गुलाब सिंह माँ नर्मदा के परम भक्त थे। गोदावरी, कृष्णा, गंगा आदि नदियों के नाम पर नगर हैं, ऐसे ही रीवा भी रेवा नदी के नाम पर बसा हुआ जिला है। यहां के निवासी नदी स्नान को बहुत महत्व देते हैं।

रेवा का अर्थ है-,कुन्दना। रेवा धातु से रेपा हुई। अमरकंटक के पास 3500 फुट ऊपर से नर्मदा नदी कुंदती हुई दिखाई पड़ती है। इसलिए इन्हें रेवा कहते हैं।

नीचे क्लिक कर सजीवभक्ति का आनंद लेवें—

Ashok Gupta

स्कंदपुराण के तीर्थ महात्म्य में बताया है कि-

गंगा में एक बार के, जमुना में तीन बार के, सरस्वती में 7 बार के स्नान से जो पुण्य मिलता है, वह केवल नर्मदा के दर्शन मात्र से मिल जाता है। नर्मदा के दर्शन से मानसिक सन्ताप तुरन्त मिट जाते हैं।

मां गंगा जिस जिन नर्मदा के स्नान करती है, उस तिथि को गंगा सप्तमी कहते हैं।

नर्मदा में मील शिवलिंग की प्राणप्रतिष्ठा नहीं कि जाति है। नर्मदा से हर साल लगभग 1 करोड़ से अधिक शिवलिंग निकलते हैं।

खरगोन जिले के सहस्त्रधारा पर स्थित गरीबेश्वर गरीब अदिवादियों, ग्रामीणों के आराध्य हैं। यह कभी कश्मीर निवासी सन्त परमहंस बाबा रहा करते थे। जिन्होंने 11 बार नर्मदा की शिवलिंग सिर पर रखकर परिक्रमा लगाई थी। नर्मदा की एक परिक्रमा 3 वर्ष 13 महीने 3 दिन की होती है। बाबा परमहंस द्वारा एक शिवलिंग को साथ लेकर, जो परिक्रमा लगाई थी। उन्होंने मुझे भी वही एक सिद्ध शिवलिंग दिया था, जिसकी स्थापना हरिद्वार के सूर्य धाम में करवाई गई। यह शिवलिंग पर प्राकृतिक जनेऊ विधमान है।

नर्मदा के हर कहकर को शंकर कहते हैं। गुजरात में “नर्मदे ना कंकटेस्थल शंकरा” कहा जाता है।

पूरे गुजरात में नर्मदा तट पर 130 स्वयम्भू शिवालय हैं। जिस घर में नर्मदा नदी से निकले शिवलिंग होते हैं उस परिवार में कभी धन , सुख-समृद्धि की कमी नहीं होती। ऐसा अगस्त्य सहिंता में लिखा है।

महर्षि अगस्त्यमुनि ने यहां 12 वर्ष मौन रहकर शिवजी की उपासना की थी, तभी से इन्हें मुनि कहा जाने लगा। अभी बहुत से किस्से शेष हैं।

देश का दुर्भाग्य है कि भारत में इतनी आध्यात्मिक शक्ति, अनंत सिद्ध तीर्थ होने के बाद भी हम जहां की तहां है। विश्व कहीं का कहीं पहुंच गया है लेकिन हम वहीं पड़े हैं। इसका एक ही कारण है-

!!मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना!!-

अर्थात सबकी सोच व मति अलग-अलग है। देश में एकजुटता की भारी कमी है। लोग केवल समय पास कर रहे हैं।

संस्कृत की एक सूक्ति है-

!!संघे शक्ति कलियुगे!!

संघटन शक्ति की दम पर ही हम भारत को आत्मनिर्भर बना सकते हैं। आज देश का बहुत सा पैसा फेसबुक, इंस्टाग्राम, गुग्गल जैसी कम्पनियाँ ले जाकर हमें ही आंख दिखाती हैं।

भारत के लोगों में भी इतनी क्षमता है कि हम इससे से अच्छे app बनाकर विश्व को चलित कर सकते हैं।

बस, हमें टांग खींचने की मानसिकता को बदलना पड़ेगा। सब सहयोग करें, तो हर योग बनाया जा सकता है। इसी से कालसर्प दोष का नाश होगा।

आज विदेशों में कबाड़े का बहुत बड़ा मार्किट है। एंटीक आइटम भी 200 से 300 साल पुराने मिल जाते हैं। जिनकी कीमत करोड़ों में होती है। सरकार ने इनके लिए बाकायदा लायसेंस भी दे रखें है।

पुरानी कबाड़ा गाड़ी को भी नया बनाकर करोड़ों का कारोबार कर रहे हैं।

कुछ लोगों को सरकार ने जमीन में खोज करने का लाइसेंस दे रखा है, इसमें मुनाफे में केवल 20 फीसदी रकम ली जाती है। अनेकों शोध संस्थान है, झें पर हजारों वर्ष पुरानी पांडुलिपियां उपलब्ध हैं।

अपने देश मे अभी बहुत सी संभावनाएं हैं, बस युवा पीढ़ी को जागने की जरूरत है।

हमे हर हाल में आत्मनिर्भर बनने

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