तन्त्र के रहस्य क्या हैं

तन्त्र में मारण, उच्चाटन, वशीकरण और सम्मोहन क्या होता है। इससे क्या

लाभ या हानि है

जाने इस अदभुत लेख में…..
तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र भारत की प्राचीन संस्कृति
का अभिन्न हिस्सा रहा है। आदिकाल से
ही तन्त्रविधा का प्रयोग होता चला आ रहा है। इन सबकी अधिष्ठात्री माँ चण्डिका और महाकाली हैं इन्हीं की अन्य शक्तियां जैसे-
छिन्नमस्ता, बागम्भरी, बगुलामुखी, तारा और माँ कामाख्या हैं।
तेरा तुझको अर्पण….
इस लेख में बताई जा रही जानकारी
सिद्ध सन्तों, माँ के भक्तों, अवधूत-अघोरी,
तांत्रिकों आदि से एकत्रित की गई है। सभी के अपने-अपने विचार हैं इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है। यह लेख 30 से 35 वर्षों का संकलन है। इसलिए कुछ विस्तृत भी हो सकता है।

तनिक सावधानी रखें…
कमजोर दिल वाले या निर्गुरु लोग तन्त्र का कोई प्रयोग कतई न करें। इस लेख में बताई गयी सिद्धियां केवल आत्मविश्वास से भरे सेे साधक ही करें!

तन्त्र क्या है….

तन्त्र शब्द तन से जुड़ा है। ऐसी सिद्धियां, जिन्हें पाने के लिए पहले तन को साधना पड़े, उसे तन्त्र कहते हैं। तन्त्र एक तरह से शरीर की ऐसी साधना प्रणाली है जिसमें मुख्य केंद्र शरीर होता है।

अघोरी कहते हैं….. जिसने शरीर को साध लिया यानि 2 से 3 घण्टे तक एक ही मुद्रा में, पूर्ण एकाग्रता से बैठने की आदत बना ली वही तांत्रिक बन सकता है।

तंत्रसाधना में हठयोग और तन-मन की शुद्धता-पवित्रता जरूरी है। 

हिन्दू बौद्ध एवं जैन धर्म शास्त्रों में तन्त्र की पुरानी परम्पराओं का उल्लेख है। तन्त्र साधना से अभिप्राय “गुह्य, गूढ़ या गुप्त साधनाओं” से है।

महादेव हैं ….तन्त्र के रचयिता….

शैव परम्परा के अनुसार तन्त्र के अविष्कारक भगवान शिव हैं। सबसे पहले महादेव ने यह ज्ञान नन्दीनाथ को दिया फिर, माँ शक्ति को।

श्रीकृष्ण के मामा कंस ने तन्त्र विद्या का जमकर उपयोग किया। तन्त्र की सभी नई खोजे कंस मामा की देन है।

तन्त्र का प्रभाव विश्व स्तर पर है
तन्त्रशास्त्रों की संख्या असंख्य है, किन्तु मुख्य-मुख्य तन्त्र 64 कहे गये हैं। बंगाल का जादू कभी बहुत ही प्रसिद्ध था।

इसलिए कहा गया –

“बायां हाथ बंगाली-कभी न जाय खाली”

बिहार, 36 गढ़ तथा राजस्थान में तन्त्र का काफी बोलबाला रहा है। कहीं-कहीं अभी भी है।

तनोति त्रायति तन्त्र” इसका मतलब है-तनना, विस्तार, फैलाव इस प्रकार इससे त्राण यानि भय या चिन्ता से मुक्ति, भ्रम का निवारण होना तन्त्र है।
त्राण क्या होता है इसकी जानकारी

“अमृतम पत्रिका” की वेबसाइट पर

सात त्राण – बचाएं प्राण

नामक हेडिंग में पढ़े।

रक्षा के लिए, परित्राण के लिए
कलयुग में कलदार का ही कायदा है..
बाराही तन्त्र शास्त्र का सिद्धान्त है कि कलियुग में वैदिक जप-मन्त्र एवं यज्ञादि का तुरन्त फल नहीं मिलता। इसलिए कलयुग में किसी भी कार्य की तत्काल सफलता और सिद्धि के लिये तंत्रग्रन्थ में लिखे मंत्रों और उपायों आदि से ही लाभ होगा।

तन्त्रग्रंथ के नियम….
तन्त्रशास्त्र के सिद्धान्त बहुत गुप्त-गोपनीय रखे जाते है। तन्त्र का ज्ञान पाने के लिए गुरुदीक्षा लेना अनिवार्य है।
वर्तमान में प्रायः मारण, उच्चाटन, वशीकरण एवं अनेक प्रकार की सिद्धियों आदि के साधन के लिये ही तंत्रोक्त मंत्रों और क्रियाओं का प्रयोग किया जा रहा है।

तन्त्र के मन्त्र अर्थहीन होते हैं..
तन्त्र के बीजमंत्र प्रायः अर्थहीन और एक या दो अक्षर के होते हैं। तन्त्र में इन्हें एकाक्षरी मन्त्र भी कहा जाता है। इन्हें जपने में साधक को आसानी रहती  है। तन्त्र के एकाक्षरी बीजमन्त्र इसप्रकार हैं! जैसे-

ऐं, ह्नीं, क्लीं, श्रीं, स्थीं, शूं, ठं, लँ, क्रीं, क्षं
यं, ॐ, रं आदि 108 करीब तन्त्र के बीजाक्षर हैं।

अघोरतन्त्र में तांत्रिकों का पंचमकार…

मुद्रा, मद्य, मांस, मत्स्य और मैथुन। अघोरियों की चक्रपूजा प्रसिद्ध है। अघोर तांत्रिक केवल शिव की पूजन करते हैं। इनका पूजा का विधान सबसे भिन्न और स्वतंत्र होता है। यह हस्त मुद्रा शिंवलिंग बनाकर घण्टों तन्त्र साधना में बैठकर एकाक्षरी मन्त्र सिद्ध कर लेते हैं।

कल्पग्रंथ किसे कहते हैं...
शारदातिलकतन्त्रम” के अनुसार

◆ जिन ग्रंथों में मन्त्र-विधान,

◆ मन्त्र – यंत्रोद्धार,

◆ बलिदान या बलि देने की प्रक्रिया,

◆ 56 तरह के दीपदान,

◆ देवताओं का आव्हान एवं पूजन,

◆ विसर्जन और साधन आदि विषयों का वर्णन हो वे शास्त्र कल्पग्रंथ कहलाते हैं।

तन्त्रग्रंथ क्या होते हैं....
जिन ग्रथं या उपनिषदों में गुरु – शिष्य का संबाद-रूप से और शिव-पार्वती के संवाद रूप से मन्त्र, यन्त्र, तन्त्र और ओषधिवल्ली आदि द्रव्यों का उल्लेख होता है, वे तन्त्रग्रंथ होते हैं।

इसके अलावा पटल ग्रन्थ, पध्दति ग्रन्थ में एक या अनेक देवी-देवताओं की पूजा-विधान, मन्त्र आदि की सम्पूर्ण जानकारी होती है।
बीज-कोष ग्रन्थ में बीजमन्त्र के शब्दों को परिभाषित किया गया है। इसमें  मन्त्रों के समझने की तथा एक-एक बीज मन्त्र की अनेक व्याख्याएं एवं फायदे की जानकारी रहती है।
अतः तन्त्र प्रयोग से पहले किसी शिवभक्त सद्गुरु से मन्त्रदीक्षा लेकर ही बीजमंत्र का जप हितकारी है।

तन्त्र सिद्धि में 4 पीठिका का महत्व…

मन्त्र पीठिका —
अघोर तन्त्र के मन्त्र-शास्त्र में चार पीठिकाओं का वर्णन है। बिना पीठिका के मन्त्र सिद्ध नहीं होता।
{१} श्मशान पीठ.
जिस साधना में रात्रि में प्रतिदिन श्मशान भूमि में जाकर गुरु के द्वारा बताई गई विधि से गुरुमन्त्र का जाप किया जाता है उसे श्मशान पीठ कहते हैं। इसे प्रथम पीठिका भी कहते हैं।
जैन कल्प के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के छोटे भाई गज सुकुमाल मुनीश्वर परमेष्ठी महामन्त्र का जापकर आत्मज्ञानी हुए थे।
{२} शव पीठ...
किसी मृतक कलेश्वर के ऊपर बैठकर या उसके भीतर घुसकर मन्त्रानुष्ठान करना शव पीठिका है।
यह अघोरी और वाममार्गियों यानि तांत्रिकों की प्रधान पीठिका है।
कर्ण-पिशाचिनी, उच्छिष्ट-गणपति, कर्णेश्वरी, उच्छिष्ठ चाण्डालिनी आदि देवताओं की साधना तथा अघोरतन्त्र की साधनाएं शव पीठिका के द्वारा ही होती हैं।

क्या आप भी तांत्रिक बनना चाहते हैं
अतिशीघ्र सिद्ध होने वाली एक तन्त्र सिद्धि…
कृष्णपक्ष की अष्टमी या दशमी को आद्रा नक्षत्र हो, तो एक नई खटिया लेकर रात्रि में 12 से 2.45 के बीच खटियाके चारों पायों पर एक-एक दीपक राहुकी तेल का जलाकर खटिया पर लेटकर शरीर को पूरी तरह ढ़ीला छोड़ देवें। फिर, !!ॐ ह्रीं नमः शिवाय!! का अपने गुरु मन्त्र में सम्पुट लगाकर
यानि गुरु मन्त्र के आरम्भ में और अंत में
!!ॐ ह्रीं नमः शिवाय!! मन्त्र जोड़कर जपने से एक मन्त्र होता है

इस मन्त्र का रोज 16 माला जप करें। यह प्रक्रिया 16 दिन की है।

यह अघोरियों की छोटी पिशाचिनी सिद्धि है। इससे कोई हानि नहीं होती यह केवल कल्याणकारी विद्या है। इस सिद्धि में 10 दिन बाद बहुत ज्यादा हलचल होने लगती है, तब अपने गुरु के चरणों का ध्यान करें। मान्यता है कि जब कोई सिद्धि शरीर में आती है, तो कुछ अटपटा सा लगता है। यदि इस सिद्धि को हासिल कर लिया, तो आगे की सिद्धियों का मार्ग सरल-सहज हो जाता है।

शाबर मन्त्रों के जप से भी अतिशीघ्र सिद्धियां मिल जाती हैं। जैसे-नाग-विच्छू का जहर, पीलिया, उच्चाटन, करा-धरा तथा जादू-टोन को ठीक किया जा सकता है

{३} अरण्य पीठ…
अरण्य पीठ उसे कहते हैं, जहां मानव जाती का आवागमन या संचार न हो। शेर-सिंह, फनधारी नाग, बिच्छू,स्वापद आदि हिंसक पशु-प्राणियों की जिस जगह बहुलता हो, ऐसे निर्जन वन-स्थान में किसी वृक्ष या शिंवलिंग का आश्रय लेकर मन्त्र साधना करना और निर्भयतापूर्वक यानि बिना डरे हुए मन को एकाग्र रखकर मन्त्रजाप में तल्लीन हो जाना ऐसी जगह को अघोरतन्त्र में अरण्य पीठिका कहा गया है।
निर्वाण-मन्त्र की विधि में लिखा है कि…
निर्वाणमन्त्रं यदि साधको

“जपेदररण्यभूमौ शिवसन्निद्यो स्थित:”
अर्थात-अरण्य यानि घने जंगल में जाकर किसी प्राकृतिक या स्वयम्भू में निर्वाण-मन्त्र का जप करने से बहुत ही जल्दी सिद्धि मिलती है।
वैदिक साहित्य में आरण्यक ग्रन्थों की रचना वन में हीँ की गई इसलिए इन्हें अरण्य ग्रन्थ कहा जाता है।
आत्मज्ञान, आत्मध्यान तथा विशेष सिद्धियों के लिए अरण्य सर्वश्रेष्ठ स्थान है। त्यागी जीवन के लिए एकांतवास ही सबसे अच्छा होता है।
{४} श्यामा पीठ..
यह अति कठिनाई युक्त है। कोई बिरला साधक या महापुरुष इस पीठिका से उत्तीर्ण हो सकता है।
एकान्त वन में कोई षोडशवर्षीया यानि 16 वर्ष की नवयौवना सुंदरी स्त्री को वस्त्ररहित कर, सम्मुख बैठाकर साधक मन्त्र-साधने में तत्पर हो और मन को कभी भी यत्किंचित भी विचलित न होने दे तथा कठोर ब्रह्चर्य में स्थिर रहकर गुरुमन्त्र या गुरु द्वारा बताये मन्त्र या बीजमन्त्र का जाप करे। इसे श्यामा पीठिका कहते हैं।
जैन ग्रन्थ में लिखा है कि महर्षि व्यास जिन्हें
द्विपायन भी कहते हैं इनके पुत्र सिद्ध श्री शुकदेव जी ( श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम प्रचारक) और स्थूलीभद्राचार्य एवं हेमचंद्राचार्य ने श्यामा पीठिका का अवलम्बन कर अघोर मन्त्र साधना से सिद्ध हुए थे। अघोर पंथ के आदि गुरु भगवान शिव के बाद यह प्रथम गुरु हैं।

अघोर सम्प्रदाय के कुछ विशेष मन्त्र नीचे दिए जा रहे हैं

मंत्र है-

【1】अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः।।

अर्थात- जो अघोर हैं, घोर हैं, घोरसे भी घोरतर हैं और जो सर्वसंहारी रुद्ररूप हैं, आपके उन सभी स्वरूपोंको मेरा नमस्कार हो । यह वेदमन्त्र है। भगवान शिव के 5 मुखों में से एक अघोर मुख की साधना इसी मन्त्र से की जाती है।

【2】विशेष कार्य की सिद्धि के लिए …..
11 दिन 11 माला रोज शरीर पर 16 स्थानों पर भस्म लगाकर तथा
11 दीपक रोज राहुकी तेल के जलाकर इसका रात्रि में 11.55 से 1.57 तक जाप किया जाता है।

!!ॐ ह्रां ह्रीं हूं अघोरेभ्यो सर्व सिद्धिं देही देही अघोरेश्वराय हूं ह्रीं ह्रां ॐ फट्॥

【3】वशीकरण मन्त्र...
शिवे वश्ये हुम् वश्ये अमुक वश्ये हुम् वश्ये शिवे वश्ये वशय्मे वशय्मे वशय्मे फट्!!


अमुक की जगह उसका नाम ले जिसे वश में करना है!

उपरोक्त मन्त्र की राहुकी तेल के ११ दीपक जलाकर 27 माला प्रातः 3.40 से 5.40 के बीच जपने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है।

【4】राहु-केतु ग्रहों के प्रकोप की विशेष शांति के लिए एक विशेष मन्त्र, जो भय-भ्रम को मिटाकर आत्मबल में वृद्धि करता है।

ॐ नमः शिवाय महादेवाय नीलकंठाय आदि रुद्राय अघोरमंत्राय अघोर रुद्राय अघोर भद्राय सर्वभयहराय मम सर्वकर्यफल प्रदाय हन हनाय ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ टं टं टं टं टं घ्रीं घ्रीं घ्रीं घ्रीं घ्रीं हर हराय सर्व अघोररुपाय त्र्यम्बकाय विरुपाक्षाय ॐ हौं हः हीं हः ग्रं ग्रं ग्रं हां हीं हूं हैं हौं हः क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ॐ नमः शिवाय अघोरप्रलयप्रचंड रुद्राय अपरिमितवीरविक्रमाय अघोररुद्रमंत्राय सर्वग्रहोच्चाटनाय सर्वजनवशीकरणाय सर्वतोमुख मां रक्ष रक्ष शीघ्रं हूं फट् स्वाहा । ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः स्वर्गमृत्यु पाताल त्रिभुवन सच्चरित देव ग्रहाणां दानव ग्रहाणां ब्रह्मराक्षस ग्रहाणां सर्ववातग्रहाणां सर्ववेतालग्रहाणां शाकिनीग्रहाणां डाकिनीग्रहाणां सर्वभूतग्रहाणां कमिनीग्रहाणां सर्वपिंडग्रहाणां सर्वदेषग्रहाणां सर्वपस्मारग्रहाणां हन हन हन भक्षय भक्षय भक्षय विरूपाक्षाय दह दह दह हूं फट् स्वाहा ॥

【5】एक नीलकण्ठ स्तोत्र भी है, जिसके जाप से वाणी सिद्धि होती है। प्राचीन काल में ज्योतिष के विद्वान ब्राह्मण इसे सिद्ध करके भविष्य वाणी करते थे, जो पूर्णतः सत्य होती थी।

【6】इस शिव मंत्र में समाई है गायत्री मंत्र की अचूक शक्ति, जाप से दूर हो जाती है बड़ी से बड़ी बीमारी...

ॐ सर्वेश्वराय विद्महे, शूलहस्ताय धीमहि | तन्नो रूद्र प्रचोदयात्।

अर्थात- हे भोलेनाथ! आपके हाथ में त्रिशूल है | मेरे जीवन में जो शूल है, कष्ट है | वो आपके कृपा से ही नष्ट होंगे | मैं आपकी शरण में हूँ। मुझ पर दया करो।

विशेष- यह परोपकार विद्या किसी की रोग बीमारी, दुःख-तकलीफ मिटाने में चमत्कारी है। उपरोक्त मन्त्र ३२४ माला जपने से सिद्ध हो जाता है। ऐसा साधक किसी के सिर पर हाथ रखकर यह मन्त्र जपता है, तो पीड़ित की परेशानी दूर होती है।

जानिए ज्योतिष और ग्रह-नक्षत्र के मुताबिक कौनसा विशेष मन्त्र देगा आपको लाभ, सुख और समृद्धि के साथ। जीवन में सफलता  के लिए विभिन्न राशि वालों के लिए
अलग-अलग मन्त्र जप का विधान स्कन्द पुराण में उल्लेखित है….

मेष राशि वाले करें यह जाप

!!ॐ अघोरेभ्यो अथघोरेभ्यो, घोर घोर तरेभ्यः. सर्वेभ्यो सर्व शर्वेभ्यो, नमस्ते अस्तु रूद्ररूपेभ्यः!!

वृषभ राशि– !!ॐ शं शंकराय भवोद्भवाय शं ॐ नमः!!

मिथुन राशि–  !!ॐ नमःशिवाय ॐ शिवाय नमः ॐ!!
कर्क राशि–  !!ॐ शं शिवाय शं ॐ नमः!!

सिंह राशि– !!ह्रीं ॐ नमः शिवाय ह्रीं!!

कन्या राशि–   !! ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्. उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !!

तुला राशि– !! ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात !!
वृश्चिक राशि-
!! ॐ दत्‍तात्रेयाय विद्महे अवधूताय धीमहि. तन्‍नो दत्‍त: प्रचोदयात्‌ !!

धनु राशि !! ॐ ऐं ह्रीं क्लीं आं शं शंकराय मम सकल जन्मांतरार्जित पाप विध्वंसनाय श्रीमते आयुःप्रदाय, धनदाय, पुत्रदारादि सौख्य प्रदाय महेश्वराय ते नमः. कष्टं घोर भयं वारय वारय पूर्णायुः वितर वितर मध्ये मा खण्डितं कुरु कुरु सर्वान् कामान् पूरय पूरय शं आं क्लीं ह्रीं ऐं ॐसम संख्याम सावित्रीम् जपेत्  !!

मकर राशि–  !!ॐ शं विश्वरूपाय अनादि अनामय शं ॐ !!

कुम्भ राशि– !! ॐ क्लीं क्लीं क्लीं वृषभारूढ़ाय वामांगे गौरी कृताय क्लीं क्लीं क्लीं ॐ नमः शिवाय !!

मीन राशि–  !!ॐ शं शं शिवाय शं शं कुरु कुरु ॐ !!

तन्त्रसाधना
ओषधि द्रव्यों के द्वारा कार्य सिद्ध करना तन्त्र साधना है। यह मन्त्र शास्त्र का एक अंग है।
तन्त्रग्रंथ ग्रन्थ मन्त्रद्वात्रिंशिका में तन्त्रो का वर्गीकरण इस प्रकार है-
स्तम्भनं मोहमुच्चाटं 

वश्या कर्षणजृम्भणम।
विद्वेषणं मारणं च 

शांतिकं पौष्टिकं तथा।।
विद्याप्रवादपूर्वस्य 

तृतीयप्रभृतादयम्।
उद्धृत: कर्मघाताय 

श्रीवैरस्वामिसूरिभि।।

इस श्लोक का अर्थ है….
स्तम्भन, मोहन, उच्चाटन, वश्याकर्षण,
जृम्भण, विद्वेषण, मारण, शान्तिक  और पौष्टिक
यह नो प्रकार के मन्त्र के प्रयोग हैं।
[[१]]  स्तम्भन प्रयोग…

जिस तन्त्र के करने से चोर, डाकू, सर्प, नाग, जहरीले कृमि, श्वापद और परचक्र यानि शत्रु की सेना के आक्रमण का भय मिटकर वह जहां का तहां अटक जाय, स्थगित रह जाय, उसे स्तम्भन प्रयोग कहते हैं।

[[२]] मोहन तन्त्र…

जिस प्रयोग से साधक किसी को अपने वशीभूत कर ले उसे “मोहन-प्रयोग” कहते हैं।
यह ● राज-मोहन ●● सभा-मोहन और
●●● स्त्री-पुरुष मोहन तीन प्रकार के होते हैं।
इन तीनों की साधनाएं भी पृथक-पृथक हैं।

[[३]] उच्चाटन क्या होता है..
जिस तन्त्र के करने से विद्वेषी रोगाक्रान्त हो जाता है। दुश्मन का मन अस्थिर , उल्लासरहित तथा निरुत्साहित होकर आत्मबल टूट जाता है।
उच्चाटन से पीड़ित व्यक्ति अपने स्थान एवं पद से भ्रष्ट हो जाता है।

[[४]] वश्याकर्षण कैसे होता है..
यह तन्त्र किसी पर करने से वह व्यक्ति साधक के पास स्वयं चला जाता है। उसी की याद में खोया रहता है। उसका विपरीत मन भी अनुकूल होकर साधक की शरण में आ जाय। यह प्रयोग अधिकांशतः सदगुरू अपने परम शिष्यों को सही मार्ग पर लाने हेतु करते हैं। यह तन्त्र आत्मीय सम्बन्धों का भी घोतक है।

[[५]] जृम्भण तन्त्र क्या है..
इस तामसी तन्त्र के प्रभाव से शत्रु परास्त हो जाते हैं, उन्हें मृत्यु का भय और कोई न कोई डर  सताता है। ऐसे लोग किसी न किसी रोग से पीड़ित रहते हैं।
[[६]] विद्वेषण तन्त्र के लक्षण
जिस तामसी प्रयोग बल से देश, कुटुम्ब, जाती या समाज में परस्पर विद्वेष, फूट, कलह, विवाद होने लगता है। मुस्लिम धर्म में इस इल्म का बहुत प्रयोग किया जाता है।
[[७]] मारण तन्त्र...
यह एक खतरनाक तामसी तन्त्र है। इस तन्त्र का प्रयोग करने वाले अधिकांश तांत्रिक माँ कामाख्या या काली भक्त होते हैं। यह बहुत ही भयँकर तन्त्र है, इससे कोई मर भी सकता है।
इसमें साधक अपने मन्त्र-प्रयोग द्वारा तथा बलि देकर किसी को भी मौत के घाट उत्तर सकता है। बंगाल के कुछ स्थानों पर अभी भी मारण तन्त्र का उपयोग किया जाता है।

[[८]] शान्तिक तन्त्र...
इस तन्त्र के प्रभाव से मारामारी, महामारी, राज्यभय, परचक्र आदि शत्रुभय तथा रोग-विकार और विप्लवों की शान्ति हो जाय
उसे शान्तिक तन्त्र कहा जाता है। यह प्रयोग केवल आध्यात्मिक सदनक ही करते हैं।

आयुर्वेद के कुछ काम्य प्रयोगों के वैद्यक-शास्त्रों में लिखा है कि…

 “सिद्धवैद्यस्तु मांत्रिक
अर्थात बिना ओषधियों के मन्त्र के प्रयोग करके बीमारियों को मिटाने वाले जो वैद्य हैं। वे चारों प्रकार के वेद्यो से श्रेष्ठ और सिद्ध वैद्य कहलाते हैं।

[[९]] पौष्टिक प्रयोग तन्त्र…
जिस तन्त्र के प्रयोग के करने से यश-कीर्ति, ऐश्वर्य बढ़े, सुख-शान्ति, मान-सम्मान की वृद्धि हो। भूमि-भवन क्रय हों। शुभाशुभ भविष्य प्रतीत हो।
सब मनोकामनाएं पूर्ण और सिद्ध हों उसे पौष्टिक तन्त्र प्रयोग कहते हैं। यह प्रयोग कोई शिव भक्त या सद्गुरु ही कर सकते हैं।

[१०] सांतानिक तन्त्र प्रयोग..

इस प्रयोग के करने से बन्ध्या यानि बांझ स्त्री को भी पुत्र का लाभ हो जाय, वंश की वृद्धि हो।
मृत-वत्सा रोग आदि का उपाय भी सांतानिक तन्त्र के द्वारा हो जाता है।
अघोरी तांत्रिक उपरोक्त में केवल छः प्रयोगों का ही उपयोग करते हैं।
तन्त्र विद्या का अधिकार केवल त्यागी वर्ग या पुरुषों को ही करना चाहिए।

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