प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों में बहुत से संस्कृत श्लोक हैं, जो स्वास्थ्य के महत्व को बताते हैं- इस लेख में सरल भाषा में प्रस्तुत हैं-

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 !!आयुर्वेद का हर शब्द अमॄतम..

【】अच्छा स्वास्थ्य सफलता की पहली सीढ़ी है।
【】नाड़ी की शुद्धि होने से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी सफलता की सीढ़ी चढ़ती है।
【】स्वास्थ्य है, तो 100 साथ हैं।
जिंदगी में स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है
【】स्वस्थ्य तन-स्वच्छ वतन यही हमारे भारत की प्राचीन परम्परा है!
【】दुनिया में हिट होने के लिए,
फिट रहना बहुत जरूरी है।इलाज
से बेहतर है-बीमारियों से बचाव
【】ज्यादा समृद्धि के फेर में स्वास्थ्य
खराब न करो, नहीं तो खराब स्वास्थ्य
सारी सम्पत्ति-समृद्धि बर्बाद कर देगा।
【】दूषित-सड़े खानपान से बड़े-बड़े खानदान भी जल्दी श्मशान पहुंच गए।
【】स्वस्थ्य शरीर के साथ से ही,
सबका विकास सम्भव है।
【】आत्मविश्वास से ही आत्मा की
शुद्धि होकर तन-मन प्रसन्न रह सकता है।
【】इच्छा शक्ति ही आपको रोगों से
लड़ने की ताकत प्रदान करती हैं।
【】बीमारियों को जड़ से भगाने के
लिए रोज नहाना जरूरी है।
【】सारँगधर सहिंता के अनुसार
नहाने के बाद भोजन करने से प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है। अतः बिना
स्नान के अन्न-भोजन, बिस्कुट आदि
बिल्कुल भी न लेवें।
【】माधव निदान पुस्तक में लिखा
है कि-स्नान से पहले अभ्यंग अवश्य
करें।
बॉडी मसाज तेल की पूरे शरीर में
मालिश करके, नहाने से सभी
कोशिकाएँ, नाड़ियाँ मुलायम रहती है।
बुढ़ापा जल्दी नहीं आता।
【】दिन भर में 50 बार गहरी-गहरी
श्वास जरूर लें-
श्वास-सांस पर शिव कहो,
वृथा श्वास जन खोई।
अघोरी कहते हैं-श्वास को व्यर्थ नहीं
जाने दें।हर सांस में “शिव” नाम लेने
से तन-मन प्रसन्न रहेगा।
【】तंदरुस्ती के लिए मन्त्र जाप
भी जरूरी है। मन्त्र जाप से मन,
चित्त एकाग्र होता है। चिंताओं की
चिता जल जाती है। सभी धर्म में मंत्रो
का विशेष महत्व है।
मंत्र एक विज्ञान है, जो आपको
सीधा, मंत्र के मालिक से जोड़कर
शरीर को ऊर्जावान बनाये रखता है।
मन्त्र के बारे में जानने हेतु नीचे लिंक
क्लिक करें-
 
【】योग-प्राणायाम, खेल-कून्द,
ध्यान-धर्म, शिवसाधना और मन्त्र
जाप के लिए भी समय निकालो
अन्यथा बाद में बीमारियों के लिए
समय गंवाना पड़ेगा।
【】जिसके पास एक स्वस्थ शरीर है,
वही मनुष्य कई गुना अमीर होता है।
【】 स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही
करना, बीमारियों को न्यौता देना है
【】100 की एक बात….क्रोध भी
जरूरी है-अच्छे स्वास्थ्य के लिए-
महादेव शिव, 
सभी रुद्र गण, 
ऋषि दुर्वासा, 
गुरु द्रोणाचार्य, 
महर्षि परशराम, 
गुरु कृपाचार्य 
बहुत क्रोधी स्वभाव के होने के बाद
भी जगत में पूज्यनीय हैं। क्यों कि क्रोध
से सब विकार निकल जाते हैं। आत्मा
पवित्र हो जाती है। भले ही इन लोगों
का बहुत विरोध होता है,
पर ये सदैव स्वस्थ्य रहते हैं।
【】रसोई अर्थात जहां (रस-होई)
यानि किचन में किच-किच और
कीच/गन्दगी न करें…
रसोईघर को साफ-सुथरा, स्वच्छ रखना आवश्यक है। बीमारियों की शुरुआत
किचन से, शुरू होकर गंदे हाथो से होते
हुए, आपके शरीर में भोजन के साथ
प्रवेश करती है।
हमारे पूर्वजों की परम्पराएं
पुराने जमाने में रसोई के अन्दर हाथ-मुहँ धोकर यहीं बैठकर खाने का इंतजाम होता था। रसोई की किसी भी वस्तु को झूठा
करना बहुत अपशकुन मानते थे।
वैदिक मान्यता है कि- 
किचन में माँ अन्नपूर्णा का वास होता है।
यहां किसी भी तरह के झूठ-मिठारा करने
से बचना चाहिए।
भोजन पकाने-खाने, बचाने के नियम-
 यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् !
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् !!
भावार्थ:-
भोजन से तीन घंटे पूर्व पकाया गया,
स्वाद हीन, वियोजित एवं सड़ा, जूठा
तथा अस्पृश्य वस्तुओं से युक्त भोजन
तामसी लोगों को प्रिय होता है।
भारतीय सूक्तियां-कहावतें है….
जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। 
जैसा पिये पानी, वैसी बने वाणी। 
जैसा करे संग, वैसा चढ़े रंग। 
अन्न से ही शरीर में सन्न यानी खून
बनता है। अन्न शुद्ध, तो मन शुद्ध
हो जाता है।
मन भोजन के सूक्ष्म भाग से बनता
है। मन हमारे शरीर की दूसरी परत है। इसलिए जो भी हम खाते हैं, वह हमारे
मन पर असर डालता है।
श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय
6 के 17 वें श्लोक में भगवान कृष्ण
ने निर्देशित किया है कि-
युक्ताहारविहारस्य युक्ताचेष्टस्य कर्मसु!
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा!!
अर्थात-
जिसका आहार-आचार और विचार
अच्छा हो। चाल और बोलचाल
संतुलित हो, जो नियमतानुसार
से सोता-उठता हो।
ध्यान एवं भगवान का ज्ञान हो,
ऐसा मार्ग उसके सभी  दु:ख-दारिद्र
समाप्त कर देता है।
श्रीमद्भगवतगीता में भोजन के चार
 प्रकार बताये गये हैं-
पेय,
चर्वण,
लेहा,
चोष्य आदि।
भोजन को गुणों के आधार पर,
तीन प्रकार का बताया गया है-
सत गुणी
रजो गुण,
तमोगुणी,-
आयु:सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः!
रस्या स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः!!
अर्थात-
सात्त्विक शाकाहारी भोजन आयु
बढ़ाने वाला, जीवन को शुद्ध करने
वाला होता है। सत्वगुणी अन्न
बलवृद्धिदाता, स्वास्थ्य, सुख तथा
तृप्ति प्रदान कर रसमय, स्निग्ध,
स्वास्थ्य प्रद तथा जीभ, मन-मस्तिष्क,
 हृदय को भाने वाला होता है ।
अतः खाना खाने से पहले दोनों
हाथ-पैर और मुख को पानी से धोकर
भोजन करना स्वास्थ्य हितकारी है।
मृत्यञ्जय महादेव कोरोनाख्याद्विषाणुतः!
मृत्योरपि महामृत्यो पाहि मां शरणागतम्!!
इस दुनिया में है बहुत सारे साधु-सन्त,
जैन मुनि, सन्यासी, हठयोगी, साधक
अघोरी-अवधूत हैं, जो अनेक दिनों
तक लंघन करते हुए अन्न-जल ग्रहण
नहीं करते।
कुछ लोग, तो खाना-पीना, वस्त्र,
निवारा त्याग चुके हैं, यह सात्विक
प्रवृत्ति के होते हैं।
माँ की महानता….
नवरात्र के दिनों में 9 दिन एक लौंग
या जल अथवा दूध में गुजार देते हैं।
दरअसल सनातन धर्मी मानते हैं
 कि-मजबूत इच्छाशक्ति एवं मनोबल
की दम पर व्यक्ति काफी समय तक
निराहार रह सकता है।
मुस्लिम धर्म में, तो एक महीने का
रोजा होता है। रोजा रखने वाला रो-जा
यानि रोने भी लगता है। रोजे के समय
 पूरे दिन थूक भी नहीं निगलना हराम
मानते हैं। यह सब चित्त को
वश में करने की साधना है।
इच्छा मारो-खुद को उभारों…..
आदिकालीन ऋषि-मुनियों की इस
प्राचीन परंपरा को विश्व के सभी
सम्प्रदायों में बहुत से लोगो ने उत्परिवर्तन शक्ति को विकसित भी किया है, अंग्रेजी
में “म्यूटेशन” कहते हैं, अर्थात कठोर
इच्छाशक्ति के बल पर खुद के शरीर में उपयुक्त खाने की उत्पत्ति करना।
बाहर से कुछ ना खाना। सजीव प्राणियों
के सभी प्रकार के आकार, आकृति, रासायनिक संरचना, रोग आदि गुणों (characters) में  उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) किया जा सकता है।
वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि 
25 से 30 उम्र के बाद हमारे शरीर में 
इतनी चर्बी होती है कि-हम 10 से 15 
दिनों तक बिना भोजन के निराहार 
रह सकते हैं। 
भोजन के सन्दर्भ में एक बात ध्यान
जरूर दें कि भोजन यदि अच्छी
मनःस्थिति से बनाया जाता है, तो वह स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है अन्यथा
वह केवल पेट भराऊ हो जाता है। ऐसा भोजन पाचक नहीं होता।
मन चंगा, तो भोजन ढंग का
आपने देखा होगा कि-जिस दिन गृहणी
का मन शान्त नहीं हो या फिर घर में कोई
ग्रहक्लेश हो, महिलाओं को मानसिक
संताप हो, तो उस दिन का भोजन स्वादिष्ट और पौष्टिक नहीं बनता है।
दुर्गा सप्तशती में लिखा है••••
विद्या समस्ता स्तवदेवी भेदा:!
स्त्रियां समस्ता सकला जयस्तु!!
है जगदम्बा! हे माँ! इस धरती-आकाश
में, सभी विद्याओ में आप ही आप है।
सभी नारियों में आपका ही निवास है।
माँ अन्नपूर्णा की कृपा से अन्न
उपजता है।काशी के अन्नपूर्णा मंदिर में आदि शंकराचार्य ने अन्नपूर्णा स्तोत्र
की रचना कर ज्ञान वैराग्य प्राप्ति की
कामना की थी। यथा।
अन्नपूर्णे सदापूर्णे 
शंकरप्राण बल्लभे!
ज्ञान वैराग्य सिद्धर्थं 
भिक्षां देहि च पार्वती!!
भोजन ग्रहण करने से पूर्व यानि खाना
खाने से पहले इस मंत्र को बोलने से
अच्छी सेहत के साथ पैसों की भी
कमी कभी घर-परिवार में नहीं रहती..
श्रीमद्भागवत गीता उल्लेख है-
अनन्तः भवन्तु पार्जन्या:दन्न संभव:!!
अन्न को देवता कहा है। जीव का निर्वाह
अन्न से ही होता है। पृथ्वी पर जितनी भी वस्तु उपलब्ध हैं, जिनसे शरीर में खून
और शक्ति का स्त्रोत होता हैं।
सात्विक, राजस या तामस हो,
 वह सब अन्य कहलाते हैं ।
कितना मजबूत है-आपका इम्युनिटी पॉवर बार-बार बीमार होना- 
जाने इस लेख में…
चरक, सुश्रुत सहिंता, भेषजयरत्न, 
धन्वंतरि कृत आयुर्वेदिक निघण्टु 
में रोगों के लक्षण और उपायों का
विस्तार से वर्णन है।
■सर्दी-खांसी, ■जुकाम, ■न्यूमोनिया,
■बार-बार छींक आना,
■नाक से लगातार पानी बहना,
■हमेशा सांस लेने दिक्कत और
■जल्दी हॉफनी भर जाती हो,
■बराबर श्वास नहीं चलती हो,
तो निश्चित आप कफ दोष से पीड़ित है।
उपरोक्त समस्या के अलावा आप
अन्य लोगों की अपेक्षा सदैव रोगी
बने रहते हैं, तो आपकी प्रतिरोधक
क्षमता बहुत कमजोर हो चुकी है।
आयुर्वेदक ग्रन्थ योगरत्नाकर …
के मुताबिक शरीर को सबसे पहले
कफ रोग पकड़ता है।
कफ ही शरीर की सम्पूर्ण शक्ति और इम्युनिटी सिस्टम को कमजोर बनाता
है।
सूर्य का प्रकोप है-कफ दोष….
आयुर्वेद के नियमानुसार सूर्य का प्रकाश
न लेने से सबसे पहले शरीर कफ दोष से पीड़ित होता है। इसका समय पर इलाज
न करने पर विटामिन डी की कमी होने लगती है, जो वात विकार उत्पन्न
करने का कारण बनता है।
विटामिन डी की कमी से हानि..
यदि हड्डियों में दर्द की समस्या हो,
तब यह विटामिन डी के लक्षणों में
से एक है।
विटामिन डी की आपूर्ति न होने से
जल्दी थकान होने लगती है। शरीर में ∆आलस्य बने रहना, ∆नींद न आना, ∆अवसाद, डिप्रेशन, ∆88 प्रकार के वातरोग, ∆थायराइड और ∆हमेशा
शरीर में दर्द बने रहना आदि तकलीफों
को झेलना पड़ सकता है।
विटामिन डी की कमी के कारण
आपका इम्युनिटी सिस्टम कमजोर
होने लगता है, जिससे आप जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते हैं और बदलती ऋतु की
वजह से सक्रिय रहने वाले संक्रमण या वायरस से शीघ्र घिर जाते हो।
शरीर में विटामिन D का स्तर बढ़ाने के लिए, गर्मी के मौसम में, एक दिन में 15 – 30 मिनट तक, सूर्य के सामने, बगैर सनस्क्रीन लगाये, खड़े रहें।
महर्षि वाग्भट्ट रचित आयुर्वेद
अष्टाङ्ग हृदय सू-११/२६ में लिखा है कि-
!!तत्र अस्थि स्थितो वायु:!!
अर्थात-
अस्थि धातु अर्थात हड्डियों की कमजोरी,
थायराइड (ग्रंथिशोथ) आदि तकलीफ
तभी होगी जब उसमें वात दोष बढ़ेगा।
सभी ८८ प्रकार के वात-विकार
जड़-मूल से मिटाने के लिए केवल
आयुर्वेदिक चिकित्सा ही लाभप्रद है।
अमॄतम द्वारा निर्मित ऑर्थोकी गोल्ड माल्ट तथा ऑर्थोकी गोल्ड केप्सूल दोनों को यदि तीन महीने नियमित लिया जाए,
तो यह बहुत ही हितकारी एवं निरापद है।
इस औषधि के कोई भी साइड इफ़ेक्ट नहीं है, अपितु बहुत सारे साइड बेनिफिट हैं। यह दवा पूर्णतः केमिकल रहित है।
अन्य उपायों में
शक्ति मिश्रित दूध, डेरी उत्पाद और सन्तरे का रस।
शक्ति मिश्रित अनाज और मक्खन।
शक्ति मिश्रित सोया उत्पाद (टोफू और सोया दूध)
पनीर
मशरुम
हमारी हड्डियों  में कैल्शियम की आपूर्ति  सही रूप से करने के लीए विटामिन डी अति आवश्यक है | हम जो आहार लेते है उसमें से कैल्शियम , फोस्फरस आदि मिनरल्स को आंत में से अवशोषण कर उसे हड्डियों तक पहोचाने के लीए विटामिन डी जरूरी है। जिस से हड्डियों की घनता (Bone Mineral Density) बनी रहती है
40 वर्ष से अधिक आयु की महिलाएँ यदि विटामिन D की कमी से ग्रस्त हैं, तो उनमें ओस्टियोपोरोसिस होने की संभावना ज्यादा होती है। कमी की स्थिति में उन्हें विटामिन D के पूरक आहार लेने चाहिए।
प्रतिरोधक क्षमता की कमी से…
★चेहरे पर काले निशान, ★झुर्रियां,
★डार्क सर्कल, ★उम्र की अधिकता
भी कमजोर इम्युनिटी या प्रतिरक्षा प्रणाली की निशानी है। इन सब समस्याओं की चिकित्सा नियमित सूर्य प्रणाम है।
भविष्यपुराण के सूर्य शान्ति कल्प
में असाध्य रोगों को दूर करने हेतु अनेक
उपायों का उल्लेख है।
कोरोना वायरस, ने सम्पूर्ण सन्सार को संक्रमण के संकट में डाल दिया है।
 अब किसी के वश में नहीं है।
कोरोना के नाम से सारा सन्सार-हाहाकार करता नजर आ रहा है।  बीते दिसम्बर चीन के बुहान शहर में एनसीओवी-19 जिसे अब कोविड-19
का नाम दिया है। कोरोना वायरस अत्यंत घातक
विषाणु है। यह श्वसन तन्त्र का विषाणु है।
जो श्वास तन्त्र की कोशिकाओं में अतिशीघ्र
विकसित होता है।
भारतीय संस्कृति में धार्मिक धारणा है कि-
त्रिदेव यानि ब्रह्मा-विष्णु-महेश ये तीनो देवता क्रमशः निर्माण-पालन-संहार के कारक हैं।
हमारा शरीर भी यत पिंडे तत ब्रह्माण्डे अर्थात
जैसा हमारा पिण्ड (शरीर) है, वैसा ही ब्रह्मांड है।
 इस श्लोक के हिसाब से शरीर में नवीन कोशिकाओं, इम्युनिटी का निर्माण श्री ब्रह्माजी करते हैं, तो इनके पालन की जिम्मेदारी श्रीहरि विष्णुजी की है-
“विश्व भरण-पोषण कर जोई”
विष्णुपुराण में वर्णन है कि-
जब विश्व पूरी तरह विषयुक्त-विषयी होकर विषाक्त (संक्रमित,जहरीला) हो जाता है,
“विषयी को शिव कथा न भावा”
तब ऐसी
विषम परिस्थितियों में श्री विष्णु- बाबा विश्वनाथ
 की शरण जाकर त्राहिमाम करने लगते हैं। यथा “अमृताब्द शिवं मधुमद्विषमे
 विषमे विषमेषु विलास-रते”!
 और शरीर से संक्रमण , विकार-व्याधियों का सफाया महादेव करते हैं।
 इसलिए आप कभी गहराई से गौर करना भोलेनाथ के भक्त अक्सर बीमार कम होकर  भगवान के भरोसे पूर्णायु प्राप्त करते हैं।
 चिकित्सा विज्ञान का आंकलन है कि-
 समस्त शरीर में फैले हुए स्वसंचालित
 नाड़ीमंडल ऑटोनामस सिस्टम  (स्वतन्त्र
 तंत्रिका तन्त्र -इसके अंतर्गत वे सभी तंत्रिका सम्मिलित है। जो अनैक्छिक क्रियाओं तथा ग्रंथियों की क्रियाओं को नियंत्रित करती है।)
एवं ऐच्छिक नाड़ीमंडल वालेंटरी मोटर नर्व्स
दोनो पर मस्तिष्कीय नाड़ीमंडल सेन्सरी
नर्व्स का नियंत्रण है।
भौतिक विज्ञान यन्त्रों यानि मशीनों पर आधारित है, वहीं आध्यात्मिक विज्ञान मंत्रों के अनुसार चलता है। भारतीय महर्षियों की मानसिकता
थी कि- जैसे अग्नि के आसपास जाने से गर्माहट महसूस होती है, वैसे ही मन्त्र जप से शरीर में स्पंदन होकर ऊर्जा का संचार होने लगता है।
जो स्वस्थ्य रखने में सहायक है।
भौतिक यन्त्र विज्ञान जीवन में सुख-सुविधा बढ़ाता है, तो अध्यात्म का मन्त्र विज्ञान सुख-सुविधा भोगने के लिए शरीर को स्वस्थ्य बनाये रखता है। अच्छा स्वास्थ्य हर घात, विश्वास घात एवं दर-दर की लात से बचाकर रात में गहरी नींद लाता है।
महर्षि चरक की चर्चा आयुर्वेद में जरूरी है, वे कहतें हैं-
आहार यानि भोजन, गहरी नींद में अच्छे स्वप्न/सपने  और ब्रम्हचर्य अर्थात चरित्र की पवित्रता इस शरीर के तीन स्तम्भ (पिलर) हैं।
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम ।
अर्थात यह शरीर ही सभी अच्छे-बुरे कार्यों का साधन है। धन-सम्पदा, शक्ति का स्त्रोत स्वस्थ्य शरीर ही है। सारे अच्छे कार्य तन्दरुस्त शरीर के द्वारा ही सम्भव हैं।
वेद-उपनिषद, आयुर्वेदिक ग्रंथो के मुताबिक स्वस्थ्य व्यक्ति की पहचान-
को रुक् , को रुक् , को रुक् ?
हितभुक् , मितभुक् , ऋतभुक् ।
अर्थात कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है,
कौन स्वस्थ है ?
हितकर यानी शुद्ध पौष्टिक, प्राकृतिक भोजन करने वाला , कम खाने वाला , ईमानदारी का अन्न खाने वाला।
उपनिषद-शास्त्रों में कहा भी है कि-
‘पहला सुख निरोगी काया,
दूसरा सुख जेब में हो माया।’
तीसरा सुख पुत्र आज्ञाकारी।
चौथा सुख मृदुभाषिणी नारी।
पंचम सुख स्वदेश में वासा
छठवा सुख राज हो पासा
सप्तम सुख भवन हो घर का।
अष्टम सुख न कर्जा हो पर का
नवम सुख खूब चले व्यापार।
दशम सुख सब करें प्यार।
 ग्यारहवाँ सुख न फंसे कुकर्म में।
 बारहवाँ सुख मन लागे धरम में।
सबके ह्रदय निराकुलता हो मन में।
क्रोध-क्लेश न बैर विरोध स्वजन में।
सर्वाधिक सुख संतोषी मन हो
ऐसा कर लें, तो धन्य जीवन हो
दूसरी बात
धन गया, तो समझो कुछ नही गया।
तन गया, तो जानो कुछ गया,
लेकिन चरित्र गया तो मानो
सबका सब कुछ चला गया।
यदि काया अर्थात शरीर रोगी है तो आप धन कैसे कमाएंगे। यदि पहले से ही अथाह सम्पदा है, तो वह किसी काम में नहीं आएगी। धन से कब्जी तन ठीक नहीं होता, न रोग मिटता है।
स्वास्थ्य है, तो 100 साथ हैं। सारा सन्सार
सहयोगी है। स्वस्थ्य आदमी की ही हरेक जात
में सब बात मानी जाती है।
वेद और व्याकरण के अनुसार
विष+अणु=विष्णु अर्थात विश्व के सभी अणु
में भगवान विष्णु का वास है। विष्णुजी सन्सार का पालन करने वाले देवता या शक्ति माने जाते हैं। यह विश्व के अणु….मनुष्यों की मन्त्र शक्ति से ऊर्जावान होकर सन्सार में सकारात्मकता का प्रसार कर, सृष्टि को
पावन-पवित्र बनाये रख पालते हैं।
प्रकृति में जब अन्याय, अत्याचार, अप्राकृतिक कार्य-व्यापार, संहार की वृद्धि होने लगती है, तो यही विष+अणु= विषाणु बनकर सृष्टि में प्रलय लाकर तबाह कर देते हैं।
धार्मिक ग्रंथों में विष्णु और विषाणु का व्याकरण एक जैसा ही है।
कोरोना के विषाणु युक्त वायरस से सांस
लेने में परेशानी होने लगती है और न्यूमोनिया
के लक्षण दिखते हैं।
एक बार निमोनिया विकसित होने पर समस्याओं का अंबार लग जाता है। एलोपैथिक में अभी तक न कोई वैक्सीन, टीका, दवा से स्थाई इलाज नहीं है। लेकिन यदि आयुर्वेद के ग्रन्थ निघण्टु आदर्श, भावप्रकाश निघण्टु, रस तन्त्रसार आदि ग्रंर्थो में बहुत से सर्दी-खांसी, जुकाम, न्यूमोनिया, संक्रमण, वायरस और विषाणु नाशक जड़ीबूटियों एवं ओषधियों का वर्णन है।
आप इनमें उल्लेखित उपायों को अपना कर पूरी तरह सुरक्षित रह सकते हैं।
कैसे बढ़ता है-वायरस…
आयुर्वेदिक ग्रंथो के अध्ययन से पता चलता है कि-
शरीर में जब कोई नया विषाणु प्रवेश करता है, तो इसके विरुद्ध कोई प्रतिरक्षा प्रणाली/इम्युनिटी पॉवर यदि शरीर में कमजोर या नहीं होता, तब
 संक्रमित विषाणु शरीर में प्रवेश के साथ ही
 यह जल्दी ही अपने जैसे अनगिनत अनेक नये विषाणु निर्मित करने लगता है। परन्तु जिन लोगों की रोगप्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है।
 उनका शरीर इस तरह के वायरस का का मुकाबला बेहतरीन तरीके से कर लेता है। कोरोना वायरस के विष-अणु (विषाणु) शरीर में नाक, आंख एवं मुहँ में प्रवेश करता है। हवा के माध्यम से फोमाइट, जो खांसने से एक से 2 मीटर दूर तक जा सकते हैं, संक्रमण का मुख्य कारण
 होते हैं। कोरोना वायरस के प्रवेश के बाद शरीर में इन वायरस के विरुद्ध एंटीबॉडी का निर्माण होता है। तभी ये वायरस शरीर में समाप्त हो पाते हैं, किंतु तब तक ये श्वास के तन्त्र को अत्यधिक नुकसान पहुंच चुके होते हैं।
 कोरोना वायरस के कारण मृत्यु दर 3 से 5 फीसदी तक कई जा रही है।
कोरोना वायरस के कारण अमूमन संक्रमित लोगों में सर्दी-जुक़ाम के लक्षण नज़र आते हैं लेकिन धीरे-धीरे इसके गंभीर लक्षण दिखना शुरू होते हैं. तब तक ये वायरस फेफड़ों पर घातक हमला कर चुका होता है. उसके बाद मरीज की हालत गंभीर हो जाती है. उसे बचाना मुश्किल होता है.
किस रावण की काटूँ बाहें, किस लंका में आग लगाऊँ। दर-दर रावण, दर-दर लंका, इतने राम कहाँ से लाऊँ।
कोरोना वायरस तो क्या जीवन की हर पीडा से रक्षा करेगी श्री रामचरित मानस की यह मन्त्र.चौपाई –
!! दैहिक दैविक भौतिक तापा ,रामराज्य नंही काहुहि व्यापा !! लगातार जाप करें, शरीर का बाल भी बांका नहीं होगा।
श्री राधे राधे 9425309621-7389909621
What is CoronaVirus : कोरोना वायरस के लक्षण, जो फेफड़े पर करता है घातक हमला
What is CoronaVirus, know about symptoms : न्यू कोरोना वायरस अब तेजी से पूरी दुनिया में पैर पसार रहा है. धीरे-धीरे इसे लेकर लोगों में डर भी बढ़ने लगा है. आखिर क्या है ये वायरस, क्या हैं इसके लक्षण, जिसके बाद सावधान होने और डॉक्टर से संपर्क किए जाने की जरूरत है.
पूरी दुनिया में चीन की रहस्यमय बीमारी के नाम से चर्चित कोरोना वायरस ने अब तेजी से पैर पसारने शुरू कर दिए हैं. ये बीमारी भारत में भी पहुंच चुकी है. यहां इसके संक्रमण से चार लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है जबकि दुनियाभर में कुल 17 लोग इससे मर चुके हैं. हालांकि चीन में इससे बीमार लोगों की संख्या हजारों में है लेकिन वो लगातार अपने देश में इससे मरने वाले और बीमार लोगों की संख्या छिपाने में लगा है. जानते हैं कि क्या हैं इस बीमारी के लक्षण.
कोरोना वायरस की फैमिली लंबी चौड़ी है लेकिन इसमें छह वायरस ऐसे हैं जो काफी खतरनाक हैं. निमोनिया भी इसी से फैलता है. लेकिन जो वायरस चीन से पैदा हुआ और अब पूरी दुनिया को चपेट में ले रहा है उसे वैज्ञानिकों ने न्यू कोरोना वायरस या नोवेल कोरोना वायरस नाम दिया है. इसके नमूनों की सबसे पहले पहचान जर्मनी की एक अंतरराष्ट्रीय लैब ने की. इसी वायरस की फैमिली घातक सार्स बीमारी फैलाने की भी जिम्मेदार ठहराई जा चुकी है.
चूंकि ये बीमारी भारत और एशियाई देशों में फैल चुकी है, साथ ही ये मानव से मानव में ट्रांसमीट हो रही है, लिहाजा इसके लक्षण जान लेने बहुत जरूरी हैं. इस बीमारी के शिकार लोगों में शुरुआत में सिरदर्द, नाक बहना, खांसी, गले में ख़राश, बुखार, अस्वस्थता का अहसास होना, छींक आना, अस्थमा का बिगड़ना, थकान महसूस करना आदि होता है. बाद में ये निमोनिया की तरह लगने लगती है. मूलतौर पर ये फेफड़ों पर हमला करती है और इसे नुकसान पहुंचाती है. जिसके बाद बचना मुश्किल हो जाता है.
भगवान श्रीराम के पिता-दशरथ के गुरु महर्षि अष्टावक्र गीता में लिखा है कि-
 बीस वर्ष की आयु में व्यक्ति का जो चेहरा रहता है, वह प्रकृति की देन है, तीस से चालीस वर्ष की आयु का चेहरा जिंदगी के उतार-चढ़ाव की देन है लेकिन पचास से 60 वर्ष की आयु का चेहरा व्यक्ति की अपनी कमाई है।–
 जो लोग यह सोच लेते हैं कि,
उनके पास कसरत करने का समय नहीं है,
उन्हें देर-सबेर बीमार पड़ने की आदत हो जाती हैं।।
यदि आप को व हम को अपना व अपने परिवार का अपने हर मानव जन का जीवन बचाना है तो प्रति दिन सुबह खाली पेट केवल 10 मिलीग्राम गौमूत्र अर्क अवश्य पीना चाहिए यह अम्रत है इसके सेवन से लीवर इनफैक्शन,सर्दी जुखाम, मोटापा, किडनी ,हृदयाघात, एवं शरीर के  समस्त रोगों को ठीक करने की क्षमता है और प्रति दिन एक अध्याय श्री मद्भागवत गीता जी का पाठ अवश्य ही करें फिर किसी भी बीमारी से डरने की जरूरत नहीं है अपने खानपान व पहनावे पर अपनी संगत पर भी विशेष ध्यान रखें यह मेरा विनम्र निवेदन है शेष तो फिर आपका शरीर है आपका जीवन है इसीलिए हमारे ठाकुर जी अपने हर भक्त से कहते हैं –कि तू वह करता है जो तू चाहता है पर होता वह है जो में चाहता हूं इसलिए तू वह कर जो में चाहता हूं फिर वह होगा जो तू चाहता है
अच्छा डॉक्टर वही माना जाता है।।
जो दवा कम और सलाह ज्यादा देता है।।
चौथा, नरसिंह अवतार, जानवर से मनुष्यावतार में संक्रमण को प्रतिबिंबित करता है
उपनिशद् काल में यूँ व्यक्त किया गया है,
यदा चर्मवदाकाशम् वेश्टयिस्यन्ति मानवाः
तदा देवम् अविज्ञाय् दुःखस्यान्तो भविष्यति।
अर्थात, जिस दिन लोग इस आकाश को चटाई की तरह लपेट कर अपने हाथ में ले लेंगे यानी ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जान लेंगे, उस दिन ईश्वर को जाने बिना मानवता के दुःखों का अंत हो जाएगा। भावार्थ यह भी हो सकता है कि ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जानना ही, ईश्वर को जानना है और यही मानवता के दुःखों का अंत करने वाला भी है |
माँ मिटायें-कोरोना..
श्योपुर के नीमड़ी क्षेत्र, चंबल कॉलोनी,पाली रोड में माँ खुल-खुली माता मन्दिर बहुत प्राचीन है। मान्यता यह है कि-यहां की भभूत ग्रहण करने से पुरानी से पुरानी सर्दी-खांसी, जुकाम, न्यूमोनिया, गले के संक्रमण, फेफड़ों की खराबी, श्वास लेने की दिक्कत हो, तो एक बार में ही ठीक हो जाती है।
यह फेफड़ों की बीमारी ठीक करने हेतु हॉस्पिटल है।
खुलखुली माता मन्दिर में 2 स्वयम्भू शिंवलिंग जैसी पिण्डी है, जिसकी खोज बंजर समाज के लोगों ने कर चबूतरा बनबा दिया था।

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