- भगवान शिव के नेत्र से प्रकट ज्योतिष का अर्थ है ज्योति+ईश यानि ज्योतिष
- ज्योतिष शास्त्र के अविष्कारक, रचयिता, प्रणेता भगवान शिव हैं। ज्योतिष ज्ञान को सबसे पहले शिव ने नंदी को दिया नंदी ने मां जगदम्बे को बताया फिर सप्त ऋषियों को और आगे जाकर त्रिकाल दर्शियों ने इस विद्या के रहस्य खोजे।
Amrutam से साभार
- ज्योतिष को काल-शास्त्र भी कहते हैं। इसका प्रादुर्भाव अपौरुषेय वेदों से है। वेद के मुख्यतः ६ अंग हैं। ज्योतिषशास्त्र वेदों का नेत्र है। महर्षि कश्यप के अनुसार १९ महर्षियों ने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान इस शास्त्र की अभिवृद्धि में दिया है।
सूर्यः पितामहो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिः पराशरः।
कश्यपो नारदो गर्गो मरीचिर्मनुरङ्गिराः।।
लोमशः पौलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः।
शौनकोऽष्टादशाश्चैते ज्योतिःशास्त्रप्रवर्तकः।।
- मनु को भी सम्मिलित किया जाय तो संख्या १९ हो जाती है। वास्तव में महर्षियों ने अपनी तीसरी आँख से, जिसे मानसिक नेत्र कह सकते हैं, प्रकृति के रहस्यों का भेदन किया और मानव जाति के लिए ज्ञान सुलभ कराया।
- रामायण के रचयिता बाल्मीकि एवं वेदव्यास ने अपनी रचना तीसरे नेत्र के सहारे की। ये सभी परम शिव भक्त थे और आज भी शिव के साधकों के पास ये विद्या सिद्ध रूप में स्थित है।
- स्वयम्भू मनु ने अपनी राजधानी हरिद्वार बनायी, वैवस्वत मनु ने इलाहाबाद को राजधानी बनाया।
- इसके उपरान्त ४५०० बी. सी. तक, दशरथ के समय तक को वैदिक काल माना जाता है। इसी काल में वेदों की रचना हुई। राम से युधिष्ठिर तक रामायण काल की संज्ञा दी गयी है, (३००० बी. सी.) ।
- वस्तुतः ब्राह्मणों का वर्चस्व महाभारत काल तक समाप्त हो गया और क्षत्रियों ने कर्मक्षेत्र रूपी संसार को भोग – क्षेत्र बना दिया। इसीलिए कृष्ण का अवतार हुआ तथा महाभारत युद्ध की घटना घटी।
- महाभारत, रामायण में शकुन शास्त्र या लक्षण (ज्योतिष) की घटनाओं की अनेक स्थानों पर चर्चा की गयी है। इससे सिद्ध होता है कि दोनों महर्षि महान् ज्योतिषी थे।
- १४०० बी.सी. के पहले के ज्योतिष को वेदांग ज्योतिष की संज्ञा दी गयी है।
- ऋग्वेद में ३६० दिन के संवत्सर का उल्लेख है। उत्तरायण एव दक्षिणायन संवत्सर के दो भाग हैं।
- १४-१५ जनवरी को सूर्य मकर में प्रवेश करता है। इसी से उत्तरायण का आरम्भ होता है । ६ मास का उत्तरायण एवं ६ मास का दक्षिणायन होता है।
- पूर्ववर्ती काल में १३० के २८ नक्षत्र थे, बाद के वर्षों में १३ १/३ के २७ नक्षत्र में विभाजन किया गया, जो आज तक प्रचलन में है।
- अगस्त्य ऋषि विन्ध्य के गुरु थे। विन्ध्य पर्वत हिमालय से भी ऊँचा उठने लगा, लोगों ने सोचा सूर्य का रथ रुक जायेगा एवं पृथ्वी पर जीवन सम्भव नहीं होगा।
- अनुनय-विनय पर अगस्त्य ऋषि विन्ध्य को पार कर दक्षिण गये और आदेशित कर गये कि इसी प्रकार प्रतीक्षा करो जब तक मैं पुनः वापस न आ जाऊँ।
- कावेरी नदी के क्षेत्र में तमिल भाषा एवं संस्कृति का जनक अगस्त्य ऋषि को माना गया है। महर्षि लौट कर नहीं आये।
- द्रविड संस्कृति एवं आर्य संस्कृति का समन्वय उन्होंने किया। आकाश में उन्हीं के नाम से अगस्त्य तारा जाना जाता है। ये राम के समकालीन थे, अर्थात् ५००० ईसा पूर्व भारतीयों को तारों का ज्ञान था।
- ऋग्वेद के मुताबिक रुद्र ज्योतिर्मय देवता हैं। चान्द्रमास कृष्ण चतुर्दशी को प्रातः पहले चन्द्र का उदय होता है फिर सूर्य निकलता है।
- ऐसा प्रतीत होता है कि सूर्यदेव चन्द्र को भाल पर रख कर उदित हो रहे हैं। इसी आधार पर शिव के मस्तक पर चन्द्र की कल्पना की प्रतीति होती है।
- यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता में २७ नक्षत्रों की सूची है। यह सूची कृत्तिका शुरू होती है। कालान्तर में अश्विनी से आरम्भ हुई।
- चन्द्रमा को तारों का चक्कर लगाने में एक चान्द्रमास या २७१/३ दिन लगता है, अर्थात् एक दिन में एक नक्षत्र को पार कर जाता है।
- मेष राशि अश्विनी के ०° से आरम्भ होती है। प्रत्येक राशि में नक्षत्रों के ९ चरण होते हैं।
- पश्चिम अरब एवं चाइनीज ज्योतिष में २८ नक्षत्र हैं। भारतीय ज्योतिष में भी अभिजित् की गणना कुछ विद्वान् करते हैं।
- हमारा मुहूर्तज्योतिष सच कहा जाय तो नक्षत्रों पर ही आधारित है। दिन, नक्षत्र, तिथि, राशि, करण, योग को पंचाग से देखकर शुभाशुभ समय की गणना शुभ, अशुभ कार्यों हेतु की जाती है।
- मुहूर्तज्योतिष अपने आप में अलग एवं बृहद् शास्त्र है। हमारे दैनिक जीवन में इसका आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्त्व है। हमारे १६. संस्कार इसी शास्त्र पर आधारित हैं।
- २७ नक्षत्रों की सूची पहले दी जा चुकी है। इनका विभाजन गुण, लिङ्ग एवं व्यवहार के अनुसार निम्न है।
- प्रत्येक नक्षत्र के एक अक्षर है। बालक जब जिस नक्षत्र में जन्म लेता है उसी नक्षत्र के चरण अक्षर से उसका राशि नाम रखा जाता है।
- इसी नक्षत्र को जन्म नक्षत्र कहते इसी नक्षत्र से शादी में मेलापक बनाया जाता है।
- आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, रेवती, अश्विनी में जन्म होने पर कहा जाता है कि बालक मूल में पड़ा है। उसी के पुनः आने पर मूल की शान्ति करायी जाती है।
- उक्त नक्षत्रों के विभिन्न में जन्म होने पर निम्न फल प्राप्त होता है—




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