ब्रह्मांड की सर्वाधिक ऊर्जादायक अक्षर है-“अ”! अमृतम प्रकाश और अमृत दाता शब्द है।

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  • अ” प्रकाश का प्रतीक है और प्रकाश, ऊर्र्जा वहीं है, जहां किसी तरह का शोक नहीं अपितु जीवन जीने का शौक हो। मेरा नाम भी अशोक है और अमृतमपत्रिका भी अमृत से लबालब है।
  • वर्णमाला का प्रथम अक्षर ‘अ’ है। इसके दो रूप हैं। पहला अ( अनुत्तर ) और दूसरा आ—यानि आनन्द है।
  • अनुत्तर और आनन्द दोनों प्रकाश हैं; शक्ति पुंज हैं। स्वातंत्र्य शक्ति के कारण ही अनुत्तर प्रकाश आनंद रूप में प्रसृत होता है।
  • आनन्द शक्ति में उसकी स्वातन्त्र्य शक्ति का विस्फार ही विद्योतित है। प्रकाश और विमर्श रूप अनुत्तर स्तर के संघट्ट से ही ‘आ’ रूप द्वितीय वर्ण, आनन्द के उत्स का उदय होता है।’ इसी से विश्व का निर्माण होता है।
  • भौतिक दार्शनिक चर्याक्रम में स्त्रीपुरुष के संघट्ट में आनन्दवाद का उदय होता है और फिर विसर्ग के होता है।
  • मानव की इच्छा शक्ति प्रकाश का ही चमत्कार है। प्रकाश में एक विशिष्ट धर्म होता है। जिसे अहम्प्रत्यवमर्श कहते हैं। अहम्प्रत्यवमर्श के द्वारा प्रकाश में विभुत्त्व नित्यत्व आदि का आक्षेप हो जाता है। उसी धर्म के चमत्कार मे इच्छा शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। (तं० आ० ११६७, ३।७८-७९)
  • चित् के प्राधान्य के कारण परप्रमाता में सिसृक्षा रूप परामर्श के उदय से ही इच्छा शक्ति उदित हो जाती है। इसीलिये प्रकाश के चमत्कार को ही इच्छा शक्ति कहते हैं।
  • प्रकाश की प्रकाशरूपता ही चित् शक्ति है। चिद् शक्ति प्रकाश रूप ही है। ‘चिति’ भी चित् शक्ति ही है । ‘चिति’ शक्ति तुर्यातीत पदात्मिका पराशक्ति है। यह परमस्वतंत्र है और विश्व सिद्धि की हेतु है। (प्रत्यभिज्ञा हृदयम् सूत्र १)
  • प्रसाद ने कामायनी नामक महाकाव्य में इसे ही महाचिति कहा है ।
  • कर रही लीलामय आनन्द,
  • महाचिति सजग हुई सी व्यक्त ।
  • विश्व का उन्मूलन अभिराम,
  • इसी में सब होते अनुरक्त ।
  • (कामायनी श्रद्धा पृ० ५ पं० १-४)
  • अ’ या ‘आ’, ‘उ’ के संयोग से ओकार तथा पुनः संन्धि से औकार का रूप ग्रहण करते हैं। उसी प्रकार अनुत्तर और आनन्द उन्मेष के सहयोग से और पुनः तन्मयता रूप सन्धि से क्रिया शक्ति के रूप को प्राप्तकर लेते हैं।
  • सर्वाकार योगित्त्व इस दशा में स्पष्ट अवभासित हो जोता है।
  • अकुह विसर्जनीयानां कण्ठः’
  • के अनुसार कवर्ग हकार और ‘ विसर्ग की उत्पत्ति जैसे अकार से ही सम्भव है, उसी प्रकार अनुत्तर प्रकाशात्म शिव से ही यह समस्त विसर्ग समुद्भूत होता है।
  • यह चिदानन्दैषणाज्ञान क्रिया रूप प्रकाश का प्रपंच शिव का ही विस्फार है।
  • प्रकाश रूप परमेश्वर की यही ५ मुख्य शक्तियाँ हैं। इन मुख्य शक्तियों से शिव संवलित है। किन्तु इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों का ही प्राधान्य सर्वत्र है।
  • चिद् और आनन्द यह दोनों अवस्थायें तो शिव और शक्ति की यामल अवस्थायें हैं । यह यामल रूप संघट्ट इच्छा, ज्ञान और क्रिया के त्रिक से ही सम्पन्न होकर अनवच्छिन्न भाव से प्रकाशमान होता है।
  • निजानन्द विश्रान्ति के कारण वह यामलस्वरूप शिव के नाम से ही अभिहित होता है। प्रकाश ही शिव है। अपनी स्वातंत्र्य शक्ति के कारण अपने को ही जब वह संकुचित अवभासित करता है, तब ‘अणु’ नाम से विभूषित हो जाता है।
  • स्वात्मसंकोच ही अणुत्त्व है। अणु ही जीव ‘पुद्गल’ ‘पाशबद्ध’ क्षेत्रवित् और पशु शब्दों से भी अभिहित होता है। ये अणु प्रकाशात्म शिव के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हैं ।

स्वतंत्रतया स्वतंत्रतया प्रकाशयतियेन पुनरपि च। स्वात्मानं, अनवच्छिन्नप्रकाशशिवरूपतयैव प्रकाशते ।।

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