कालसर्प, पितृदोष और इसके दुष्प्रभाव क्या हैं? सफलता में रुकावट, धन की तंगी, गरीबी की वजह राहु, केतु और शनि क्यों हैं?

जाने 100 से अधिक राहु के विषय में रोचक और रहस्यमय बातें। क्योंकि राहु की कृपा के बिना जीवन व्यर्थ हो जाता है। ऐसे लोगों की स्थिति कुछ ऐसी हो जाती है कि
न खुदा ही मिले, न बिसाले सनम। 
न इधर के रहे, न उधर के रहे। 
 
अगर जिंदगी में कुछ कर दिखाना चाहते हो, तो नियम से राहुकाल में राहु रूपी शिवलिंग की पूजा करें। इसके अलावा इस धरती पर दूसरा कोई उपाय नहीं है। 
 
कालसर्प विशेषांक से साभार-
इस लेख में राहु, केतु, शनि जैसे क्रूर ग्रहों के बारे में लगभग 35 ग्रंथों से जानकारी जुटाई गई है, ताकि सारे भ्रम, भय मिट जाए।
 
 राहु के दोषों से बचना है, तो इन शिवालय में पूजा-
    1. राहु के ‎इन तीर्थों, शिवमंदिर और शिवालय के नाम
      ‎इस प्रकार हैं -5 लाख वर्ष पुराना शिवालय —
      ‎श्री कालहस्तीश्वर मन्दिर ,यह तिरुपति बालाजी से लगभग 35 km दूर है। मंदिर में सौ स्तंभों वाला मंडप है, जो अपने आप में अनोखा है।
    2. श्रीकालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है कि वह वायुतत्व लिंग है। अंदर सहस्त्र शिवलिंग भी स्थापित है।
    3. श्रीकालहस्ती मन्दिर का उल्लेख शिवपुराण
      स्कंध पुराण तथा लिंग पुराण जैसे पुराने पुराणों में भी मिलता है। यह मंदिर राहुकाल पूजा के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।
    4. राहु की तपस्या में लीन देवी देवता कालहस्ती मंदिर में सभी देवी-देवता, सन्त-महात्मा कल्पों, युगों से राहु की साधना कर रहे हैं श्री कालहस्ती मंदिर में श्री गणेश जी की लगभग 21 प्रतिमाएं है, जो भिन्न-भिन्न नामों से हैं। जैसे-मुक्ति गणेश, बल गणेश, लक्ष्मी गणेश, बुद्धि गणेश आदि।
    5. यहां एक पाताल गणपति का मन्दिर भी है, जो जमीन से 100 फुट गहरा है। नीचे जाने के लिए 1 फिट का जीना है। यहां जाने में बहुत कठिनाई होती है।
    6. कालहस्ती शिवालय में श्रीकृष्ण, श्री राम, लक्ष्मण, सीता, सप्तऋषि, यमराज, नाग, हाथी, शनिदेव, भगवान और कार्तिकेय द्वारा स्थापित शिंवलिंग के दर्शन कर सकते है। इन सभी ने सप्तऋषियों ने भी पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा की थी।
    7. कालहस्ती की कहानी किस्सा है कि इस स्थान का नाम तीन पशुओं के नाम पर किया गया है।
      – श्री का अर्थ है मकड़ी,
      – काल कहते हैं नाग को और
      – तथा हस्ती को संस्कृत में हाथी
    8. कहा जाता है। ये तीनों ही यहां शिव की आराधना करके मुक्त हुए थे। पुराणों के अनुसार श्री यानि मकड़ी ने शिवलिंग पर तपस्या करते हुए जाल बनाया था और नाग ने शिवलिंग से लिपटकर शिव आराधना की और हाथी ने शिवलिंग को जल से स्नान करवाया था।
    9. दुनिया का अनूठा स्वयंभू शिवलिंग यह सृष्टि का एकमात्र राहु केतु शिवलिंग है, जिसका व्यास 8 से10 इंच और ऊंचाई 8 फिट के करीब होगी। स्कंध पुराण के मुताबिक पृथ्वी में सर्वप्रथम वायु तत्व का प्रकटन इसी स्थान से हुआ था।
    10. कालसर्प-पितृदोष मुक्ति का मूल तीर्थ कालसर्प दोष की शांति तथा राहु की पूजा के लिए यह आदिकालीन तीर्थ है। इस शिवलिंग को छूने से व्यक्ति अंधा हो जाता है। शिवलिंग पर 9 ग्रह और 27 नक्षत्रों का समावेश है।
    11. श्लोक शिंवलिंग-
      महर्षि व्यास द्वारा इस शिंवलिंग पर 18 पुराण, चारों वेद का उच्चारण करते हुए रुद्राभिषेक किया था।
      यह मंदिर लगभग 5 km में फेला हुआ है।
      श्री कालहस्ती के आसपास के प्राचीन तीर्थ इस स्थान के आसपास अनेको प्राचीन धार्मिक स्थल हैं।
    12. श्रीकालहस्ति में हैं राहु की हैं दो पत्नियाँ-
      राहु यहां अपनी दो पत्नी नागवली व नागकणि के साथ है। यहां की विशेषता यह है कि यहां राहु मानव चेहरे में है। यहां राहुदेव ने शाप से छुटने
      हेतु भगवान भोलेनाथ की पूजा की थी
      इस मन्दिर परिसर में 12 दुर्लभ पानी के तीर्थ है।
      जिनके नाम हैं-
      1- सूर्य पुष्पकरिणी, 2- गौतमतीर्थ,
      ३- पराशर तीर्थ,
      4- इन्द्रतीर्थ, 5- भृगुतीर्थ,
      6- कन्व्यतीर्थ, 7- वशिष्ठ आदि।
    13. 1100 शिवलिंग हैं-कालहस्ती में यहां नजदीक में दुर्गम मंदिर और दक्षिण काली अपने पति वीरभद्र मंदिर प्रमुख हैं। इसके अलावा विश्वनाथ मंदिर, भक्त कणप्पा मंदिर, मणिकणिका मंदिर, सूर्यनारायण मंदिर, महर्षि भारद्वाज तीर्थम, कृष्णदेवार्या मंडप, श्री सुकब्रह्माश्रम, वैय्यालिंगाकोण (सहस्त्र लिंगों की घाटी), पीछे के पर्वत पर तिरुमलय स्थितहै।
    14. इस शिवलिंग के बारे में जानकर हैरान हो जाओगे त्रिनागेश्वरम- राहु मन्दिर
      जो मूल ‎नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भी है।
      इस मंदिर में चढ़ाया गया दूध, अपना रंग
      बदल लेता है। एक हैरान करती सच्चाई
      यह कुंभकोणम (तमिलनाडु) से 8 या 9 km है।
    15. यहां प्रतिदिन राहुकाल में शिवरूपी राहु नाग प्रतिमा का अभिषेक किया जाता है। विशेष बात यह है कि जो दूध अर्पित करते है, तो वह जहरीला यानि नीले रंग का हो जाता है, जो साफ दिखता है।
    16. यहां ईश्वर को नागनाथ स्वामी तथा माता पार्वती को गजअंबिका व ज्ञानेश्वरी के नाम से जाना जाता है। ज्ञान, बुद्धि, विवेक की वृद्धि के लिए अनेक साधक, छात्र, बाबा बनकर उपासना करने में तल्लीन हैं।
    17. चातुर्मास करके पाईं सिद्धियां कवि कालीदास, महर्षि व्यास, भगवान परशुराम, श्रीकृष्ण, आदिशंकराचार्य ने यहां 2 महीने का चतुर्मास भी किया था।
    18. डिप्रेशन का शर्तिया इलाज दिमाग के डॉक्टर एक सिद्ध शिव साधक ने बताया कि- अवसाद, अशांति, पागलपन, मिर्गी रोग एवं मानसिक विकारों के लिए पीड़ित जन यहां आद्रा नक्षत्र में आएं और 3 दिन रुककर 1100 माला !!ॐ शम्भूतेजसे नमःशिवाय च शिवाय नमः!! का जप अपनी नाभि को सुनाए, तो मूर्ख, मानसिक रोगी भी महाज्ञानी बन जाता है।
    19. राहु देव की कृपा से होती है सही समय पर शादी
      कहते है कि राहु काल में प्रतिदिन डेढ़ घंटा दूध द्वारा राहु का अभिषेक करने से शादी समय पर हो जाती है। जिन्हें बच्चे नहीं होते उनको सन्तति
      मिलती है। वैवाहिक जीवन की तकलीफ दूर होती है।तीसरा है
    20. ‎शेषनाग या वासुकी नाग शिवालय
      केरल के हरिपद में ‎मन्नारशाला नागमन्दिर है। यह केरल में नाग की पूजा करनेवाले सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। ‎यहां करीब 50 हजार नाग प्रतिमाएँ हैं।
      यह मंदिर नागराज और नागयक्षि को समर्पित है साथ ही भारत के 7 आश्चर्यों में एक है। इस मंदिर में यहां तक नजर जाती है, वहां तक केवल और केवल नाग ही दिखाई देते हैं।
    21. दीपदान से जलता है दुर्भाग्य इसलिए यहां राहुकाल में जलाए जाते हैं, हजारों दीपक
      ‎इन सभी राहु शिवालयों में यहां प्रतिदिन राहुकाल
      ‎में तथा ग्रहण काल में राहुकी तेल के हजारों
      ‎दीप जलाकर दीपम पूजा, दीपदान पूजा विधान
      ‎किये जाते हैं।
      सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के अलावा यहां
      प्रतिदिन कालसर्प, पितृदोष शान्ति हेतु राहुकाल
      में ‎इसकी शांति हेतु ‎विशेष पूजा-अर्चना की जाती है
      जिससे बड़े से बड़े दुःख-दुर्भाग्य का नाश होता है।
    22. राहु का मन्दिर-राहु का कटा सिर इसी स्थान पर गिरा था।
      उत्तराखंड के कोटद्वार से लगभग 150 किलोमीटर दूर पैठाणी गांव में स्थित इस राहु मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जब समुद्र मंथन के दौरान राहू ने देवताओं का रूप रखकर छल से अमृतपान किया था, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया, ताकि वह अमर न हो जाए।
    23. राहु की शांति का उपचार ऐसी मान्यता है कि राहू की कैसी भी दशा हो यहां आकर पूजा करने से महादशा दूर हो जाती है।ब्रह्मवैवर्त पुराण की माने, तो राहु का देश राठपुर था जिस कारण यह क्षेत्र राठ तथा राहु के गोत्र पैठीनसि से इस गांव का नाम पैठाणी पड़ा होगा।
    24. पश्चिम मुखी इस प्राचीन मंदिर के बारे में यहां के लोगों का मानना है कि राहू की दशा की शान्ति और भगवान शिव की आराधना के लिए यह मंदिर पूरी दुनिया में सबसे उपयुक्त स्थान है।
    25. नवग्रहों की नम्रता-जीवन में नवग्रहों (देवता) का प्रभाव अति महत्वपूर्ण है। ये नवग्रह सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु है। सूर्य सभी ग्रहों का प्रधान है तथा बाकी ग्रह सूर्य से ही ऊर्जा पाते हैं।
      ज्योतिष ग्रन्थ जातक-परिजातक के अनुसार
      सूर्य केंद्र में स्थित रहते हैं। चन्द्रमा सूर्य के दक्षिण पूर्व में यानि आग्नेय कोण में रहते हैं।
    26. मंगलग्रह सूर्य के दक्षिण में, बुधग्रह सूर्य के उत्तर पूर्व यानि ईशान कोण में, बृहस्पति अर्थात गुरु ग्रह सूर्य के उत्तर दिशा में, शुक्रदेव सूर्य के पूर्व दिशा में, शनि सूर्य के पश्चिम दिशा में, राहु सूर्य के दक्षिण-पश्चिम में यानि नैऋत्य कोण और केतु सूर्य के के उत्तर-पश्चिम में (वायव्य कोण) में स्थित होते हैं। इनमें किसी भी देवता का मुख एक दूसरे की तरफ नहीं होता।
    27. लेकिन दुनिया का एक मात्र मन्दिर है, जहां सभी नवग्रह एक ही सीध यानी एक लाइन में स्थापित हैं।
      इस ज्योतिर्लिंग के बारे में अगले ब्लॉग में पढ़े।
      राहु को जल्दी प्रसन्न करना है, तो करें
      इस मन्त्र का जाप

    !! ॐ शम्भूतेजसे नमः !! अथवा
    !! ह्रीं ॐ नमः शिवाय ह्रीं !! आपको शक्ति देगा

  • शिवजी के गले में सर्प नहीं नाग लिपटा हुआ रहता है। नाग और सर्प दोनों में बहुत अंतर है?
  • केवल नागों के फन पर कोई शुभ चिन्ह स्वस्तिक या अन्य कोई धार्मिक चिन्ह मिलता है। सर्पों का फन नहीं होता। नाग के बारे में अमृतम पत्रिका द्वारा प्रकाशित नाग-सर्प के रहस्य नामक इस किताब में भी बहुत सी वैज्ञानिक एवं रोचक रहस्य गुगल पर पढ़ सकते हैं। जिसमें कालसर्प के दुष्प्रभाव जानकर हैरान हो जाएंगे।

नाग सर्पों का भय, डर मिटाने का उपाय

  • जिन लोगों को नाग, सर्प से बहुत भयभीत रहते हों, भय या डर लगता हो अथवा उन्हें ऐसा महसूस हो कि हमारे घर में नाग है, तो करें ये उपाय वे निम्नलिखित मंत्र का जप करते रहें। इस मंत्र को लिखकर पॉकेट में रखें, घर की दीवारों पर लगाएं। अमृतम द्वारा प्रकाशित कालसर्प पोस्टर पास रखें।

!!ॐ आस्तिक मुनि अगस्त्येश्वराय नमः!!

नागो की कहानी क्या है?

  • श्रीमदभागवत एवं गरुड़ पुराण के अनुसार भोलेनाथ के गले में वासुकी नाग लिपटे रहे हैं। यह अनंत, कर्कोटक आदि 12 नागों में से एक दिव्य मणिधारी नाग हैं।
  • वासुकी नाग के प्रयास से ही समुद्र मंथन हुआ था। स्कंधपुराण में वासुकी नाग को ही राहु ग्रह बताया है। ये शिवजी के पुत्र समान थे। कलियुग में ये ही भगवान श्री गणेश के रूप में प्रथम पूज्य हैं।
  • नाग-सर्प, गरुड़-वरुण, चमगादड़, ततैया, टिड्डी आदि इनकी माँ के नाम जाने। राहु के शुभप्रभाव और दुष्प्रभाव लेख के अंत में पढ़ें
  • वासुकी नाग के दिव्य साक्षात मंदिर नेपाल के पशुपति नाथ में है, जो साल में एक बार खुलता है।
  • बिहार के वैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग से 20 किलोमीटर दूर भी वासुकी नाथ मंदिर में विराजमान हैं।
  • राहु रूप में वासुकीनाथ त्रिनागेश्वरम स्वयंभू शिवालय में विराजे हैं। यही मंदिर मूल यानि ओरिजनल नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है।

सृष्टि का एकमात्र राहु केतु शिवलिंग

  • वासुकी नाथ का एक स्वयंभू शिवालय वायु तत्व रूप में भी दक्षिण भारत में विशाल रूप से स्थापित है। स्कंध पुराण के मुताबिक पृथ्वी में सर्वप्रथम वायु तत्व का प्रकटन इसी स्थान से हुआ था।
  • जहाँ नाग, मकड़ी और हाथी ने की थी शिवलिंग की रक्षा। यहां 1000 शिवलिंग स्थापित हैं। राम लक्मन, कृष्ण, सप्तऋषियों ने भी पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा की थी।
  • कालसर्प दोष की शांति तथा राहु की पूजा के लिए यह आदिकालीन तीर्थ है। इस शिवलिंग को छूने से व्यक्ति अंधा हो जाता है। शिवलिंग पर 9 ग्रह और 27 नक्षत्रों का समावेश है।

केरल में परिवार सहित रहते हैं वासुकीनाथ

  • 30 हजार से भी ज्यादा नाग प्रतिमा वाला यह मंदिर विश्व का आश्चर्य है। यह मंदिर 16 एकड़ की भूमि पर फैला हुआ है। केरल के अलाप्पुज्हा शहर से 37 किलोमीटर दूर ऐसा ही एक मन्नारशाला नाग मंदिर स्थित है। यहां हर तरफ नाग मूर्तियां दिखाई देती हैं। अनेक रहस्यमयी बातें जानने के लिए अमृतम सर्च करें।

मणिधारी दिव्य नागों के जन्म केसे हुआ

काद्रवेयाश्च बलिन: सहस्त्रममि तौजस:!!

सुपर्णवशगा नागाजज्ञिरेsनेक मस्तका:।। श्रीमदभागवत

  • अर्थात- नागमाता कद्रू से बड़े-बड़े विषधारी, बलशाली, अपार तेजस्वी तथा अनेक फनों वाले एक हजार नाग उत्पन्न हुए। ये सभी नाग अपनी सगी मौसी विनता के पुत्र गरुड़ के वश में रहते थे।

हजार फन दिव्य नाग

  • ऋषि तार्क्ष्य कश्यप की 4 पत्नियों से जन्मी सन्ताने-नागमाता कद्रु से उत्पन्न नागों के नाम-पांच फ़ंनधारी शेषनाग, वासुकी, अनंत नाग, तक्षक, ऐरावत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर, एलापत्र, शङ्ख, कर्कोटक, धनञ्जय, महानील, महाकर्ण, घृतराष्ट्र, बालहक, कुहर, पुष्पदँष्ट, दुर्मुख, सुमुख आदि इन सभी नागों के एक हजार सिर या फन हैं।

सर्पों की माता-क्रोधवशा—

  • राजा दक्ष की साथ पुत्रियों में से तेरह का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। इनमें नोवी कन्या का नाम था-क्रोधवशा। इसी से सर्पों का जन्म हुआ।श्रीमद्भागवत के मुताबिक

-दंदशूकादय: सर्पों राजन् क्रोधवशात्मजा:६/६/२८

  • -हे राजन! साँप, बिच्छु, कृमि, केंचुएसंक्रमण, कम विषैले जाति के जीव-जन्तु, मेढ़क, कछुआ आदि क्रोधवशा से उत्पन्न हुए।इन जीवों की संख्या 14000 से अधिक बताई गई है। यह सब वायु पीकर जीवित रह सकते हैं।
  • Amrutam कालसर्प विशेषांक से साभार

राहुकाल में करें शिव पूजन, तो सारे दुख मिट जाते हैं।

  • नीचे चित्र पर राहुकाल में रोज 54 दिन तक चंदन का इत्र लगाकर राहु की तेल RAHUKEY Oil का दीपक जाएं और चमत्कार देखें।
    • बहुत कम लोगों को मालूम होगा की नमः शिवाय मंत्र का संपूर्ण अर्थ क्या है। नीचे चित्र में जाने न, म, शि, वा, य अक्षर के अर्थ। यही समस्त दु:ख नाशक पूर्ण पंचाक्षर शिव मंत्र है।
  • स्कंध एवं पुराण के अनुसार हमारे पितृ पूर्वज राहु रूपी नाग में भटकते रहते हैं। जिससे पितृदोष के कारण परिवार बहुत पीड़ित रहता है।

क्यों लगता है पितृदोष

  • संसार या इस धरती में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जिस पर कोई न कोई कर्ज न हो। पूर्वजों का ऋण न हो। हर इंसान संतति इसलिए पैदा करता है, ताकि उसके वंशज मृत्यु उपरांत आत्मा की शांति हेतु सर्व उपाय, अनुष्ठान, पिंड दान करे। यह इसलिए भी जरूरी है कि हम उनकी छोड़ी गई संपत्ति का उपयोग करते हैं।
  • पितृदोष की शांति हेतु राहुकाल में रोज करें शिव पूजन, तो सारे दुख मिट जाते हैं। धन संपदा की वृद्धि होने लगती है। अतः नाग, सर्प, कालसर्प, पितृदोष, जादू, टोना, टोटका से मुक्ति पाने का यही सबसे आसान और सरल तरीका है।
  • पहली बार पढ़ेंगे ऐसी जानकारी 70 प्राचीन शास्त्रों से शोध के अनुसार नाग और सर्प दोनों अलग हैं।
  1. साँप किसी को काट नहीं सकता। सर्प प्रजाति नि:विष अर्थात जहरीली नहीं होती। सर्प जाति में दोमुहें सांप, केचुए, अजगर आदि माने जाते हैं।
  2. सर्पो का फन नहीं होता। सर्प किसी भी चीज को निगलता है अर्थात खाता-चबाता नहीं हैं। सर्पों की आयु नागों की अपेक्षा कम होती है। जबकि नाग हमेशा फनधारी और विषैले होते हैं।
  3. क्या आपको पता है- नाग-सर्प, विष्णु वाहन गरुड़, सूर्य वाहक-अरुण, ततैया, चमगादड़, टिड्डी, कीड़े-मकोड़े यह सब मौसेरे भाई हैं। अतः इस लेख में प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियों, उपनिषदों से खोजी गई रोचक रहस्यमई ज्ञान पढ़कर हैरान हो जाएंगे।
  4. नाग-सर्प का पौराणिक जन्म, इतिहास नाग और सर्प दोनो मौसेरे भाई हैं।नाग की माँ कद्रू हैं एवं सर्पों की माता क्रोधवशाहैं। दोनों खास बहिन हैं। ये 60 बहिने ब्रह्माजी के पुत्र राजा दक्ष की पुत्रियां थीं। दक्ष की इन साथ पुत्रियों में से 4 बहनों का विवाह ऋषि तार्क्ष्य कश्यप से हुआ था।
  5. विष्णु पुराण और हरिवंशपुराण के अनुसार इनका एक नाम अरिष्टनेमिः भी बताया गया है। इनकी चार पत्नियों में से नागमाता कद्रू सबसे बड़ी और अत्यंत रूपवती थी। महाभारत के अनुसार-
  6. !!वव्रे कद्रू:सुतान् नागान् सहस्रं तुल्यवर्चस:!!अर्थात माँ कद्रू में अपने पति से एक समान तेजस्वी और दिव्य नागों को पुत्र के रूप में पाने का वरदान मांगा। इस प्रकार सृष्टि के सभी नागों का जन्म कद्रू से हुआ। जब कभी किसी को नागों से भय लगे, तो नागमाता कद्रू का स्मरण कर, नागों से जाने या पलायन का निवेदन करें।
  7. देश-दुनिया में स्थापित माँ मनसा देवी के जो मन्दिर हैं, वह सब कद्रू का ही रूप हैं। मनसा माता ही नागों की माँ या कद्रू हैं। ये परम् शिव भक्त थीं। तुरन्त मनोकामना पूर्ति करने के कारण इन्हें मनसा माँ कहा जाता है। हरिवंशपुराण के अनुसार-

!काद्रवेयाश्च बलिन: सहस्त्रममि तौजस:!

सुपर्णवशगा नागाजज्ञिरेsनेक मस्तका:।।

  • अर्थात-नागमाता कद्रू से बड़े-बड़े विषधारी, बलशाली, अपार तेजस्वी तथा अनेक फनों वाले एक हजार नाग उत्पन्न हुए। ये सभी नाग अपनी सगी मौसी विनता के पुत्र गरुड़ के वश में रहते थे।
  • नागों की माँ देवी कद्रू ऋषि तार्क्ष्य कश्यप की 4 पत्नियों से जन्मी नाग सन्ताने। शिव रहस्य तंत्र के मुताबिक इस ब्रह्माण्ड के रचनाकार पांच फ़नधारी शेषनाग हैं। ।

नागमाता कद्रु से उत्पन्न दिव्य मणिधारी 19 महानाग

  1. वासुकी नाग
  2. अनंत नाग,
  3. तक्षक नाग,
  4. ऐरावत नाग,
  5. महापद्म नाग,
  6. कम्बल नाग,
  7. अश्वतर नाग
  8. एलापत्र, नाग
  9. शङ्ख नाग,
  10. कर्कोटक नाग ,
  11. धनञ्जय नाग,
  12. महानील नाग,
  13. महाकर्ण नाग,
  14. घृतराष्ट्र नाग
  15. बालहक नाग
  16. कुहर नाग,
  17. पुष्पदँष्ट नाग
  18. दुर्मुख नाग
  19. सुमुख नाग आदि इन सभी दिव्य नागों के एक हजार सिर या फन हैं।

शेषनाग नाग क्यों पड़ा

  • सारा संसार नष्ट होने के बाद केवल नाग ही बचते हैं। नाग ही पुनः सृष्टि की रचना में योगदान देते हैं

भगवान विष्णु के वाहक-गरूण की माता विनता

  • दूसरी पत्नी विनता से अरुण और गरुड़ नाम के दो पुत्र हुए। अरुण सूर्य के सारथी तथा गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन हुए।

माँ पतंगी से जन्मे कीट-पतंगे आदि

  • तीसरी पत्नी- पतंगी से हिंसक पक्षियों को छोड़कर अन्य कीड़े-मकोड़े, मच्छर, कीट-पतंगों का जन्म हुआ।

दिव्य देवी यामनी चमगादड़, ततैया आदि की माँ-

  • चौथी पत्नी यामिनी से सभी तरह के शलभों टिड्डी, चमगादड़, ततैया का जन्म जन्म हुआ।

सर्पों की माता है-क्रोधवशा

  • सर्पों की माता-क्रोधवशा—राजा दक्ष की साथ पुत्रियों में से तेरह का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। इनमें नोवी कन्या का नाम था-क्रोधवशा। इसी से सर्पों का जन्म हुआ।

श्रीमद्भागवत ६/६/२८ के मुताबिक-

!!दंदशूकादय: सर्पों राजन् क्रोधवशात्मजा:!!

  • अर्थात- हे राजन! साँप, बिच्छु, कृमि, केंचुए संक्रमण, कम विषैले जाति के जीव-जन्तु, मेढ़क, कछुआ आदि क्रोधवशा से उत्पन्न हुए। इन मूक जीवों की संख्या 140000 से अधिक बताई गई है। यह सब वायु पीकर जीवित रह सकते हैं।
  • आचार्य चाणक्य ने सर्प को खल, दुष्ट, दुराचारी बताया है। यथा-

!सर्प:क्रूर:खल: क्रूर:, सर्पति क्रूरतर खल:!

  • शिव सहस्त्र नाम अर्थात महादेव के 1008 नामों में नागों के बारह बार नाम आये हैं।

राहु सर्वाधिक खतरनाक नाग-

  • सबसे क्रूर ग्रह राहु भी नागरूप में ही हैं। शिवलिंग के ऊपर फ़नधारी नाग होता हैं। वह राहुदेव ही हैं। ध्यान रखें शिवलिंग के ऊपर कभी सर्प नहीं होता।

वृक्ष में नाग-

  • गहराई से गौर करें, तो सृष्टि में अधिकांश वस्तुएं नागों के निशान से मेल खाती हैं। पान और पीपल का पत्ता तथा बेलपत्र तीन मुख्य नाग का प्रतीक होने से इसे शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।
  • कारीगरों की कन्नी-नाग का ही फन है। नागपंचमी को कोई भी मिस्त्री कन्नी नहीं चलाएगा, चाहे, वह भूखा मर जाये।
  • स्कंदपुराण, रावण रचित मन्त्रमहोदधि आदि अनेक ग्रन्थों में एसी हजारों चीजों का उल्लेख हैं, जो नाग चिन्ह लिए हैं इसीलिए ही सभी देवताओं ने बारम्बार नागों को नमस्कार किया है।
  • कुंडलिनी जागरण में नागित फेरे लगाकर ऊपर उठती है। कुण्डलिनी महाशक्ति दिव्य प्रज्ञा प्रदान करती है। साथ ही यह योगियों के लिए आदिशक्ति हैं।
  • उपनिषदों और शाक्त शास्त्रों में बार आया है। ऊर्जा का यह रूप (क्वाईल या कुंडली) एक नागिन के साढ़े तीन कुंडली (लपेटे हुए) मारकर बैठे हुए रूप से मिलती है।
  • सनातन, बोद्ध व जैन धर्म में अधिकांश देवी-देवताओं, अवतारों के मस्तिष्क के ऊपर फन इनकी रक्षा कर रहे हैं। दरअसल यह कुंडलिनी जागरण का प्रतीक है।
  • दक्षिण भारत के अनेकों मंदिर, शिवालयों श्रीकालहस्ती ज्योतिर्लिंग, त्रिनागेश्वरम यानि ओरिजनल नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, केरल के श्री मन्नारशाला आदि तीर्थों में नागों की हजारों प्रतिमाएं रखी हुई हैं।

नाग छोड़ते हैं-जहर

  • नाग जहरीले होते है, क्यों कि नाग ही फ़नधारी होते हैं। दुनिया में नागों के असंख्य मन्दिर और ज्योतिलिंग हैं। कुम्भकोणम के 20 km दूर त्रिनागेश्वरम वैदिक ज्योतिर्लिंग है।
  • यहां दूध से अभिषेक करने के बाद दूध नील, हरे रंग का हो जाता है। यहां रोज राहुकाल में रुद्राभिषेक होता है। शेष सन्सार के सभी नागेश्वर शिवलिंग स्वयम्भू हैं, ज्योतिर्लिंग नहीं। स्कंदपुराण के चौथे खण्ड में इसका उल्लेख है।

सर्प पूज्यनीय नहीं होते

  • सर्प प्रजाति दोगलेपन के कारण पूज्यनीय नहीं है। इसी वजह से सर्पों का इस सृष्टि में कोई भी मन्दिर नहीं है। ज्यादातर लो नागों को सर्प कहकर उनका अपमान करता है।

नाग ही राहु है, राहु ही शिव हैं

  • केरल का मन्नारशाला शेषनाग मन्दिर सृष्टि का सबसे प्राचीन है। कुम्भकोणम के पास त्रिनागेश्वरम मूल ज्योतिर्लिंग, श्रीकालहस्तीश्वरा शिवालय, तिरुनल्लार शनिमंदिर के पास राहु-केतु स्वयम्भू नाग मन्दिर आदि वैदिक कालीन हैं।
  • अभी तक करीब 25000 से ज्यादा स्वयम्भू नाग मन्दिरों के दर्शन का सौभाग्य मुझे मिला है। नागों की सम्पूर्ण जानकारी इसलिये दी जा रही है, ताकि हिन्दू धर्म से अज्ञानता का पलायन हो सके।

आयुर्वेद में भी नाग नाम रूपी बूटी

  • आयुर्वेद की सर्पगन्धा बूटी, गरुड़ वृक्ष की छाल और अपमार्ग जड़ी तीनों ही ओषधियाँ नाग काटने के विष को उतारने में कारगर हैं।

अमृतम पत्रिका में लगभग 3100 लेख उपलब्ध हैं। इसमें नाग, राहु, केतु, कालसर्प आदि के बारे में जान पाएंगे।

नागबन्ध काटने वाले सिद्ध स्थल

  • देश के अनेक स्थानों पर नागबन्ध, नागदंश काटने के स्थान हैं। राजस्थान में तेजाजी देव, मध्यप्रदेश के सबलगढ़ ग्राम में, ग्वालियर में शनिचर के पास, शहर में रामदास घाटी पर स्थित प्राचीन बाबा हीरा भूमिया आदि स्थान हैं, जहां भादों के महीने में बंध काटे जाते हैं।

नाग ही धन की रक्षा और सेक्स करते हैं

  • मणिधारी नाग-इच्छाधारी नागिन उसी स्थान पर सहवास करते हैं, जिस भूमि के नीचे खजाना छुपा होता है। नाग को ही शेषनाग कहा जाता है। यह पांच फन वाले होते हैं, जो पंचतत्व का प्रतीक हैं।

अनोखे-अदभुत नाग नागिन मन्दिर

  • दुनिया में अनेकों सिद्ध नाग मन्दिर हैं, जो चमत्कारी हैं।हिमाचल में डलहौजी के पास खजियार में लकड़ी से निर्मित नागमन्दिर अद्भुत है।
  • जम्मू के नजदीक पटनीटॉप के पास गवाह नाग बाबा का एक तांत्रिक नागमन्दिर है। इस स्थान पर झूठी गवाही देने पर 24 घण्टे में नाद डस लेता है। जहां से फोटो लेना ना है, लेने पर नाग आ जाते हैं।
  • यही पर नजदीक सुध महादेव का शिवालय है, जहां त्रिशूल गढ़ा है। त्रिनागेश्वरम ज्योतिर्लिंग में राहु रूपी नाग का जब दूध से अभिषेक होता है, तो दूध का रंग नीला हो जाता है।
  • भारत में राहु के कुछ शिवालय और मंदिरों में सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण के समय तथा सूतक व दुष्काल के समय विशेष पूजा-प्रार्थना, कालसर्प की शांति, अनुष्ठान आदि किये जाते हैं। यही कालहस्ती शिवालय दुनिया का अद्भुत और दुर्लभ शिवमंदिर

राहु का रत्न-

  • गोमेद, तत्व-छाया, रंग-धुम्र, धातु-शीशा होते हैं। पूरे विश्व में “केतु का एक मात्र मन्दिर” के बारे में जानकारी amrutam पर देखें। और दुःख-दारिद्र मिटाने और राहु-केतु की पीड़ा से पीछा छुड़ाने के लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय जाने।

कैसे मिले सुख और सफलता —

  • जीवन में सफलता के लिए पंचतत्व की कृपा बहुत आवश्यक है, क्यों कि इन पर राहु का अधिकार है।
    • पंचमहाभूतों की दया पाने के लिए 54 दिन तक रोज राहुकाल में “राहुकी तेल” का दीपदान कर, बड़े से बड़े दुर्भाग्य को दूर किया जा सकता है।

कैसे बनता है राहुकी तेल-

  • अमृतम फार्मास्युटिकल्स ने राहु की शान्ति
    के लिए राहुदोष नाशक जड़ीबूटियों
    जैसे नागबल्ली, चिड़चिड़ा, वंग, नागदमणि,
    काले तिल सर्पपुंखा, गरुण छाल, वरुण छाल,
    सर्पगंधा, अश्वगंधा आदि का काढ़ा निकालकर कर
    पंचमी तिथि को राहु के “आद्रा नक्षत्र” में काढ़ें से भगवान शिवकल्यानेश्वर का राहुकाल के दरम्यान वेद ध्वनि से रुद्राभिषेक कराकर काढ़े को तिल, सरसों, बादाम, के तेल में 18 दिन तक पकाया जाता है।

Raahukey Oil for Puja –

Auspicious Blend for Raahukalam

MRP ₹ 499 (Inclusive of all taxes)

Quantity: 200ml

  • Rahu is the northern node and Ketu is the southern node. Rahukaalam lasts for around 90 minutes, every day, varying on different weekdays: Monday (7.30-9.00), Tuesday (15.00-16.30), Wednesday (12.00-13.30), Thursday (13.30-15.00), Friday (10.30-12.00), Saturday (9.00-10.30), Sunday(16.30-18.00).
  • As prescribed in Vedic Astrology, lighting a lamp during this 90 minutes is auspicious for you and your family.
  • राहु की तेल 200 ml की पेकिंग में उपलब्ध है। राहुकी तेल में राहु के दुष्ट और दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए बहुत सी वस्तुओं को मिलाया गया है। राहुकी तेल” के रोज 5 दीपक 54 दिन तक नियमित जलाना सौभाग्य में सहायक होता है।
  • How to Use
  • Preferable that a Lamp with one or five faces are used and all the five wicks are lit, where as One signifies the ultimate Reality and Five, the Panchabutas and five Tanmatras. If a single wick is lit, it should face either the East or North.
  • The Lamp should be adorned with Kumkum and Chandan. Whilst lighting the lamp we thus pray:
  • Om Naag Kulaye Vidhmahe Vishdantaye
    Dheemahi, Tanno Sarp Prachodayat
  • Note: This recipe is completely natural and the colour of the recipe may change over a period, however, the efficacy of the product remains the same.
  • अतिशीघ्र गरीबी मिटाने का विशेष उपाय हर महीने की दोनों पंचमी, अष्टमी, एवं चतुदर्शी
    तिथियों में अपने घर या शिवमंदिर में “राहुकी तेल” के अपनी उम्र के अनुसार दीपक जलावें।‎

नाग प्रजाति के कुलगुरु का तीर्थ

  • दक्षिण भारत के कुम्भकोणम से 30 km दूर एलनगुड़ी नामक गुरु शिवालय नाग देवताओं के गुरु का स्थान है। यहां नाग काटे व्यक्ति को ले जाकर 24 परिक्रमा लगवाने से वह जीवित हो उठता है।

नाग-नागिन की तरह चमकती है-बिजली

  • दुनिया के सभी मार्ग नाग नागिन की आकृति के होते हैं। आकाश में बिजली चमकते समय उसका आकार नाग की तरह होता है। अभी और भी “राहु के रहस्य” बाकी हैं।

कुक्के श्री शेषनाग मंदिर

  1. कर्नाटक के मैंगलोर से लगभग 70 किलोमीटर दूर कुक्के श्री नामक तीर्थ पर शेषनाग आज भी साक्षात रूप में विराजमान हैं। वासुकी नाग, अनंतनाग, शेषनाग आदि दिव्य मणिधारी नागों ने इसी स्थान पर शिवजी का घनघोर तप करके अपने फन पर पृथ्वी धारण करने का वरदान मांगा था।
  2. यहां भी रोज कालसर्प की शांति भी होती है। 100 फीसदी लाभ के लिए एक बार यहां अवश्य जाएं।
  3. 36 गढ़ का नागलोक राजगढ़ जिले के पंढरी पानी है। यह चलते-फिरते जहरीले, लम्बे नाग आसानी से देखे जा सकते हैं।
  4. नागों की भूमि गुजरात में सापूतारा नामक घनघोर प्राकृतिक जंगल को विषैले, मणिधारी नाग और इच्छाधारी नागिन की धरती माना जाता है। यहाँ जीवन में एक बार अवश्य जाएं। यह अदभुत स्थान सूरत शहर से लगभग 150 KM है।
    1. इस सघन वन में करोड़ों वर्ष पुराना स्वयं प्रकट अर्थात स्वयम्भू नागेश्वर मन्दिर है, जो राहु के गुरु तथा नागों के आराध्य के रूप में स्थापित है।
  5. सम्भव हो, तो नागेश्वर शिवलिंग पर चन्दन इतर अर्पित कर 12 माला !! ॐ शम्भूतेजसे नमः शिवाय।। का जप कर हाथ में जल लेकर नागों को अर्पित करें।
  6. माँ मनसा को महाप्रणाम माँ मनसा का एक मंदिर चंडीगढ़ से 10 km पंचकूला में भी है, जो 100 एकड़ में फैला हुआ है।
  7. शीत-पित्त, खाज-खुजली की खास दवा जंगलवासियों एवं अघोरियों के पास अनेक बीमारियों का चमत्कारी इलाज होता है।

घर में बनाएं यह तेल

  • कैसी भी खाज-खुजली, जी किसी भी इलाज से नहीं मिट रही हो। पुराना एग्जिमा हो, सोरायसिस त्वचा रोग हो आदि समस्याओं का अंत करने के लिए काले नाग की केंचुली लेकर सरसों के तेल में इतना पकाएं कि वह जलकर आधा रह जाये। इस औषधि तेल को पीड़ित स्थल पर सुबह की धूप में लगाकर दो माला जपें। !!ॐ नागेश्वर नमःशिवाय मम् कृपयाय नमः!!

शीत-पित्त की परेशानी खत्म

  • ऐसा ही शीत पित्त के लिए अजमोद, जो कि एक मसाला है, इसे 1 से 2 ग्राम पानी से सुबह लेवें या पान के पत्ते में रखकर दो या तीन बात बार खाएं, तो शीत पित्त उछलना बन्द हो जाती है।

कुत्तों का उपचार

  • श्वान यानि कुत्तों के किसी भी रोग के लिए नाग की केंचुली गुड़ के साथ खिलाने से वह स्वस्थ्य हो जाता है। विदेशों में कुत्तों का यह इलाज बहुत कारगर सिद्ध हो रहा है।

अंत में राहु की रासलीला

  • राहुँ अँधकार है। राहु बुद्धि का स्थान है जहाँ होशियारी और चालाकी रहती है। वही राहु है। राहु प्रभावी जातक धूर्त प्रवृत्ति होता है।
  • छल कपट करने मे माया रचने मे पारंगत होता है। धोखेबाज दूसरो को नुकसान पहुचाने मे कलाकार होता है। दगा करना इसकी फितरत में रहता है।
  • राहु अपनी बातो मे ऐसी माया रचता है कि सामने वाला इनके वश मे हो जाता है। जैसे ये चाहते वैसा ही करता या मानता है।
  • राहु प्रभावित व्यक्ति छल कपट कर के दुसरो को लडाने भडकाने मे माहिर, लम्बा चौडा कद काठ यानि छाती चौडी व मोटी मांशल होती है।
  • राहु प्रभावित मनुष्य शरीर पर बहुत अधिक बाल, रंग काला या पक्का होता है। भारी भरकम डील डोल के चलते ऐसा लगता है कि ये घरती को हिला देंगे।
  • राहु के शुभप्रभाव वाले अंत में अत्यंत दुःख पाते हैं। शेष जीवन लोगों को क्षति पहुंचाकर, दिल दुखाकर प्रसन्न रहने का ढोंग करते हैं। इन लोगों के दिमाग में सच्चाई, ईमानदारी, समर्पण की भावना कम ही होती है।

राहु का शुभकारी प्रभाव

  • राहु से पीड़ित अधिकांश जातक अंत में सन्त बन जाते हैं। इनके मरने के बाद जय-,जयकार होती है। यह बहुत ही अनुभवी, कल्याण की भावना रखने वाले, मददगार और जीवन में भारी कष्ट झेलने के कारण बाद में सम्मान पाते हैं।
  • राहु के शुभ प्रभाव के कारण इंसान अगले जन्म में सिद्धियां लेकर पैदा होता है। उसकी छठी इंद्रिय खुली रहती है। जैसे मप्र के बागेश्वर धाम में श्री धीरेन्द्र शास्त्री को पूर्व जन्म का सब ज्ञात है
  • राहु दोष से पीड़ित जातक जीवन भर क्रोध और विरोध बहुत झेलते हैं। इनकी किस्मत इतनी खराब होती है कि- अगर निरोध लगाकर भी सहवास करें, तो बच्चा ठहर जाता है।
  • राहुकाल में शिवलिंग पर इत्र लगाने से प्रसन्न होते हैं राहु। शिव कल्याणेश्वर की कृपा से कालसर्प जैसे हजारों कष्ट मिट जाते हैं। स्मरण रहे कि ब्रह्मांड का मूल तत्व महादेव ही हैं।

नासिक में कालसर्प, पितृदोष शांति एक धंधा

  • क्या आपने कभी निजी रूप से पूजा करवाने के उपरांत लाभ का अनुभव किया है? नहीं किया होगा। क्योंकि अब ये बहुत बड़ा धंधा बन चुका है।
  • धर्म के नाम पर भक्त हमेशा ठगे जाते हैं। मेरा निजी अनुभव है कि कालसर्प से मुक्ति या अन्य दिक्कतों से उभरने के लिए राहुकाल में नियमित पूजा विशेष लाभदायक और चमत्कारी है।
  • कालसर्प से परेशान बहुत से लोग परेशान हैं। इसके निवारण हेतु त्रयंबकेश्वर नासिक में पूजा करवाना कितना फलदाई होता है? यह जानना चाहते हैं।
  • कालसर्प की पूजा अब एक बहुत बड़ा धंधा बन गया है। यह पूरा नेटवर्क है। ज्यादातर ज्योतिषि कालसर्प की शांति के लिए नासिक जाने की सलाह दे रहे हैं। इस पर उन्हें प्रति व्यक्ति 1500 से 3000 रुपये तक कमीशन मिलता है।
  • मेरा खुद का अनुभव नासिक में बहुत ही ज्यादा खराब रहा। पूजा कराते समय मेरा मोबाइल और करीब 5000/- पंडित के किसी सहायक ने वुदा दिए। जिसकी FIR भी थाने में लिखवाई।
  • पुलिस वालों का कहना था कि यहां रोज के 25 से 30 केस पंडितों की मिलीभगत से ऐसे ही होते हैं। इनकी एकजुटता इतनी है कि हम चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। पुलिस के कुछ अफसर बहुत सहयोगी सोच वाले थे उन्होंने बताया कि कालसर्प के नाम से यहां बहुत पाखंड, गन्दगी फेल रखी है।
  • कर्मकांड कराने वालों का विशाल नेटवर्क भी है। फिर भी लोग यहां भयभीत होकर ठगने चले आते हैं।इससे अच्छा है कि वहीं खिने अपने घर के आसपास किसी शिवमंदिर में पूजा-विधान करा लेवें।
  • दो कौड़ी के कमरों का किराया अनाप-शनाप लेते हैं। किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं है।
  • आखिरी दिन पंडितजी घर पर चांदी के नाग-नागिन की पूजा कराकर अपने पास रख लेते हैं। जबकि स्कंदपुराण, शिव सहिंता के अनुसार उन चांदी के नाग-नागिन को कालसर्प की शांति कराने वाले जातक को देना चाहिए, ताकि वह प्रतिदिन उनकी पूजा कर सके।
  • नासिक में कर्मकांडी पीड़ितों के ह्रदय में रत्तीभर भी दया भाव या अध्यात्म का पुट नहीं मिलता।
  • नासिक के दर्दनाक अनुभव के बाद ही कालसर्प विशेषांक का लेखन आरंभ किया।

कालसर्प से डरें नहीं, इसका मुकाबला करें…

  • कालसर्प को कोई भी समझने की कोशिश ही नहीं कर रहा। यह आलसी, कर्महीन, मतकमाऊ, सुस्त लोगों को ज्यादा परेशान करता है।
  • कालसर्प बनता है, जब लग्न में राहु हो और सप्तम में केतु हो। इन दोनों के मध्य जब चन्द्र-सूर्य सहित सभी ग्रह आ जाते हैं, तभी कालसर्प बनता है। यह स्कंदपुराण के ज्योतिष खण्ड में बताया है।

अब 100 फीसदी लोगों को कालसर्प बताया जा रहा है।

  • अमृतम द्वारा यह पुस्तक सन 2000 में प्रकाशित हुई थी। इसमें ककलसर्प के भय से बचने के सूत्र बताए थे। यह कालसर्प विशेषांक 25 वर्षों के अथक प्रयास से इसे लिखा गया था।

कालसर्प क्या है

  • काल का अर्थ है समय और मृत्यु…सर्प कहते हैं उस जीव को जिसमें जहर, विष, ऊर्जा, तेजी न हो। सर्प सदैव दिशाहीन रहता है। सर्प को कोई भी आसानी से मार सकता है। सर्प का फन नहीं होता। जबकि नाग का फन होता है।
  • कालसर्प का सीधा सा मतलब है कि-जातक का समय सर्प की भांति ऊर्जाहीन हो जाये। वह फन यानी सिर उठाकर जीने में असमर्थ हो। जिसकी कोई दिशा न हो।

कालसर्प का मूल कारक ग्रह राहु है।

  • कष्ट-क्लेश, दुःख-दारिद्र, रोग-शौक़, हानि-परेशानी, बेकार जवानी, कर्ज-मर्ज इन सबका कारक और दाता राहु ही है, जो निम्नलिखित नुकसान पहुंचाता है!

राहु की क्रूरता

  • भय-भ्रम, मुकदमे बाजी में बर्बादी, जेलयोग, पुलिस का भय, बवासीर, केन्सर और मधुमेह जैसे असाध्य रोग, पैदा कर पथभ्रष्ट और पथहीन कर उन्नति के रास्ते, सफलता की ‎राह रोककर, ‎बार-बार रोड़े ‎अटकाता है। स्कन्द पुराण में इसे ही कालसर्प, पितृदोष, दरिद्र दोष कहा गया है।

दुर्भाग्य दायक राहु…

  • दुर्भाग्य का अर्थ है- जो लोग मेहनत, भाग-दौड़ से दूर भागते हैं, उनसे भाग्य दूर हो जाता है। इसे ही दुर्भाग्य कहते हैं। आलस्य-प्रमाद, सुस्ती और दूरदृष्टि की कमी के कारण जीवन परेशानियों से घिरने लगता है।

दुर्भाग्य का कारण–

  • पूर्व जन्म के पाप-पश्चाताप, माँ, बहिन, पत्नी या अन्य दुर्गा स्वरूप स्त्री का दिल दुखाना, दुष्टता, दगाबाजी, दबंगता, दर्द देना, दीनहीन और दयावान नहीं होना आदि के कारण भाग्य को रहस्यमयी बनाकर राहु उलझाए रखते हैं।
    • राहु जब हो अशुभ, तो देता है दुःख, दरिद्र, रुकावट जाने 20 कारण
  1. पल भर में ऐश्वर्य हीन हो जाना,
  2. अचानक धन का नाश,
  3. शेयर-सट्टे से बर्बादी,
  4. किसी अपनों के द्वारा नुकसान पहुंचाना
  5. दुश्मनों द्वारा बर्बाद करने की योजना बनाना,
  6. अकस्मात रोगों से धिर जाना,
  7. बहुत बड़ी मुसीबत आना,
  8. शादी में विलंब भी राहु दोष का ही एक लक्षण है।
  9. वैवाहिक जीवन में तनाव और विवाह के बाद तलाक की स्थिति भी राहु पैदा करता है।
  10. राहु जब अशुभ या क्रूर हो, तो किसी पर कृपा, रहम या दया नहीं करता
  11. रोज-रोज रोजा रखने की मजबूरी यानि भूखे रहकर दिन गुजारना,
  12. रो-रोकर रहना, अर्थात आर्थिक तंगी,
  13. शारीरिक एवं मानसिक परेशानियां बनी रहना
  14. घुट-घुट कर जीना
  15. रिश्तेदारों की रुसवाई
  16. प्यार में वेवफाई,
  17. पेट की बीमारियां
  18. दुश्मन हो जाए भाई,
  19. ‎किसी की भी मदद नहीं मिलना,
  20. अपने-परायों का रहम (दया) नहीं करना,
  21. आये दिन एक नई उलझन खड़ी होना। उपरोक्त ये सब राहु का ही दुष्प्रभाव के कारण होता है।

राहु बनाये रहीस और मालामाल

  • राहु के रहम से ही व्यक्ति रहीस बन सकता है। राहु यदि शुभ है, तो जो भाग्य में है, तो वह भागकर एक दिन अपने पास जरूर आता है और यदि राहु अशुभ है, तो धन-सम्पदा, यश- कीर्ति सौभाग्य आदि आकर भी भाग जाएगा। नष्ट हो जाता है।
  • अनिष्ट कारण राहु को शुभदाई बनाने और सौभाग्य जगाने के लिए सौ तरफ भाग-दौड़ करते रहो। सौ तरह के प्रयास करो, अतः शिवपूजन के साथ-साथ कर्म करो, कष्ट काटो। प्रसन्न-मन अमृतम जीवन का यही उपाय है।

रंक से राजा बनाता है राहु

  1. दुःख-दरिद्रता मिटाकर, गरीब से गरीब को अमीर बनाना, राजनीति में अपार सफलता दिलाना राहु का काम है।
  2. राहु, राह दिखाने वाले मार्ग दर्शक हैं। ज्योतिषशास्त्र में शनि, मंगल, केतु और राहु को पाप ग्रह के रूप में बताया गया है। कुण्डली में अगर इनकी स्थिति ठीक नहीं हो तो जीवन में बार-बार उलझन और समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  3. भगवान और सूर्य-चंद्र को भी नहीं छोड़ते राहु–‎भगवान सूर्य एवं चंद्रमा भी गलती करते हैं, तो ‎उन्हें भी राहु नहीं छोड़ते, ग्रहण लगाकर इन्हें भी ‎पीड़ित कर देते हैं।
  4. राहु ऐसा पाप ग्रह है जो आपकी बुद्घि को सही से काम नहीं करने देता और गलत निर्णय के कारण बार-बार नुकसान उठाना पड़ता है।
  5. राहु ही सही राह, दिखाकर जीवन हरा-भरा बनाते हैं।
  6. राहु ही ‎सिद्धि-समृद्धि के सर्वाधिक साधक हैं। राहु ही इसके मालिक भी हैं ।
  7. ‎इंसान ओर भगवान के कर्म व धर्म, सबका डाटा राहु के पास सुरक्षित है।

रहस्यमयी राहु देते हैं- अथाह धन, संपदा सफलता

  1. शिव की कठोर साधना एवं शुभ कर्म होने से राहु के शुभ प्रभाव एक न एक दिन जरूर दिखने लगते हैं।
  2. राहु गरीब से गरीब आदमी को ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।
    अमीर और अरबपति बनाने की क्षमता केवल
    राहु के पास ही है।
  3. संसार की सम्पूर्ण भौतिक सुख-सम्पदा, सुविधायें राहु की शुभता से निश्चित मिलती हैं।
  4. राहु की कृपा से राजनीति में अपार सफलता मिलती है। यश-कीर्ति, प्रसिद्धि के राहु दाता है।
  5. गलती और दुष्कर्म के दुष्परिणाम–
    ‎प्रकृति के विरूद्ध जो भी जाता है, वृक्षों को काटता है। कहीं भी थूकता है। झूठ बोलता है। वचनवद्धता का ध्यान नहीं रखता। समय पर लेन-देन साफ नहीं रखता।
  6. चोरी, छल-कपट, दुर्भावना, दुष्कर्म आदि में लगे लोगों को राहु उसे परेशान कर सही मार्ग पर लाते हैं ।
    ‎फिर चाहें ईश्वर हो…अथवा इंसान। ‎प्राणी हो या परमात्मा।
  7. ‎जब सृष्टि में सूर्य और चंद्रमा ‎पर ग्रहण लगता है, तो
    ‎10-12 घंटे पूर्व सूतक ‎लग जाता है। इसे दुष्काल
    ‎भी कहते हैं , इस समय ‎खाना-पीना, सोना निषेध होता है। ‎सभी मंदिरों के पट-द्वार बन्द हो जाते हैं।
    ‎पूजा पाठ स्थगित कर रोक दिया जाता है।
अंत में इतना जरूर याद रखें कि सुबह स्नान के तुरंत बाद अपने माथे पर अमृतम चंदन का त्रिपुंड जरूर लगाएं। भले ही त्रिपुंड को एक या 2 घंटे लगाकर रखें।

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Comments

One response to “कालसर्प, पितृदोष और इसके दुष्प्रभाव क्या हैं? सफलता में रुकावट, धन की तंगी, गरीबी की वजह राहु, केतु और शनि क्यों हैं?”

  1. Amit Singh avatar
    Amit Singh

    कृपया om namah शिवाय किलित वाली पोस्ट नही मिल रही है जिसमे विनियोग का मंत्र है वह बताए

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