महाकाली के गले में 12 या 27 मुंडों की कहानी क्या है?

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काली की 83 निराली बातें जाने…

माँ पार्वती ने माँ काली का रूप कब और क्यों धारण किया था?

83 से अधिक वेद-पुराण, ग्रन्थ एवं धर्मशास्त्रों से लिया गया यह लेख आपकी आंखें खोल देगा। 83 रहस्य..

जाने कैसे करें..काली से कामना और प्रसन्न…माँ महाकाली ज्ञान की देवी है। जब सन्सार अज्ञानता की आग में जलने लगता है, तब काली कलकत्ते वाली निराली बनकर महाकाल को भी चरणों में ला देती है।

असम के मेघालय में दुनिया का अद्भुत शेषनाग शिवलिंग
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  • यह असम के मेघालय से 250 km दूर बंग्लादेश के बॉर्डर से 20 km दूर घने वन में काली शिला नामक स्थान पर स्वयंभू प्राकृतिक शेषनाग शिवलिंग है। यहां शेषनाग भी महाकाली की तपस्या में लीन है।
      • महाकाली के गले में 27 मुंडों की माला है, जो एक तरह के महा सुपर कंप्यूटर हैं। जिनमें 27 नक्षत्रों का लेखा-जोखा स्वाभाविक रूप से होता रहता है।
      • सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में 27 नक्षत्र इसी मुंड में रहकर अपना कसम कर रहे हैं। सबको पता होगा कि हरेक प्राणी का जन्म इन्हीं 27 में से किसी एक नक्षत्र में होता है।
      • काली अपने पति बीरभद्र हदेव के साथ दुनिया के एक मात्र मन्दिर श्रीकालाहस्ती में वास कर रही है।
      • महाकाली और उनके पति वीरभद्र शिव का यह मंदिर कालहस्ती के प्रवेश द्वार पर ही स्थित है।
      • यहां 100 बाती का दीपक जलाकर 27 नक्षत्र रूपी शिवलिंग के दर्शन की परंपरा है।
      • महाकवि जैसे मूर्ख महाकाली की कृपा से ही महाज्ञानी बने।
      • काली को कंकाली भी कहते हैं। यह सदैव नग्न अवस्था में रहती है।
      • माँ कंकाली की 10 फुट ऊँची नग्न प्रतिमा शहडोल मप्र ज़िल से करीब 15 किलोमीटर दूर घने जंगल में लाखों सालों से विराजित है।
      • मुसलमान लोग भी काली की कब्बाली गाते हैं।
      • पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित 52 शक्तिपीठों में से एक माँ हिंगलाज का मंदिर में काली का ह्रदय गिरा था।
      • मुस्लिम धर्म के लोग इन्हें अपनी नानी का घर कहते हैं। नवरात्रों में लाखों मुस्लिम इनके दर्शन कर भावुक हो जाते हैं। आखिर है तो वो माँ ही।
      • माँ से छोटा शब्द असज तक निर्मित नहीं हुआ।
      • माँ के कारण ही महादेव को एक तिथि को पूर्ण करने के लिए उसमें मां शब्द जोड़ा, तो वह पूर्णिमा तिथि कहलायी।

माँ महाकाली के महत्वपूर्ण 83 रोचक रहस्य….

दुनिया में काली की कहानी बहुत निराली हैं।

【१】शिव हो या शिवा खोजने से नहीं, खो-जाने से मिलते हैं।

【२】ब्रह्मांड में माँ एक ऐसा शब्द है जिसे बोलने के लिए नीचे का पृथ्वी रूपी ओंठ और ऊपर का आकाश रूपी ओंठ को मिलाना पड़ता है।

【३】आज की पीढ़ी से निवेदन है कि अपनी माँ को मम्मी या ममा, मम्मा न बोलकर केवल माँ कहें। माँ खनाए भी भक्ति ही है, इससे आत्मबल बढ़ता है।

【४】माँ के उच्चारण से भी माँ महाकाली, माँ दुर्गा, महासरस्वती की उपासना हो जाती है।

【५】अर्थ का अनर्थ हो जाता है जब अपनी माँ को मम्मी बोलते हैं…मम्मी शब्द बुत से बना है! बुत यानी ममी होता है। यह मरे हुए की बनाई जाती है। यदि आपको मरी हुई ममी (मम्मी) देखना हो, तो कभी मिस्र की राजधानी कायरा चले जाना।

【६】मिस्र में अध्ययन-खोज करने हेतु वहाँ एक महीने रहा हूँ।

【७】माँ के चरणों में हो मस्तिष्क….मात्र आप एक महीने जन्मदात्री माता को माँ बोलकर देखें, सारा अवसाद-डिप्रेशन मिट जाएगा। दिमाग तेज होने लगेगा। बिगड़े काम बनने लगेंगे।यह 100 फीसदी सत्य है। इसे अनेक बच्चों ने आजमाया है।

【८】ध्यान देंवें….माँ महाकाली की साधना-उपासना हेतु शनिवार सबसे श्रेष्ठ दिन है।

【९】भारत में एक खतरनाक साजिश एवं षडयंत्र के तहत जानबूझकर यहां की परम्परा, संस्कृति-संस्कार को तहस-नहस, नष्ट किया जा रहा है।

【१०】अवसाद का शिकार अवतारी देश…एक विदेशी अनुसन्धान में पता लगा है कि-हमारी धरती माँ भारत में अब 42 फीसदी से ज्यादा लोग डिप्रेशन के शिकार हैं।

【११】वेद-पुराणों में शब्द को ही ब्रह्म बताया है।

【१२】जैसा बोलोगे-वैसा लोगे।

【१३】जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा सन्न (रक्त)

यह सूक्तियां लाखों वर्ष पुरानी है और पूर्णतः सत्य भी है।

इस नवाक्षर मंत्र का करें जाप, तो शिव हो जाएंगे आप…

!!ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे!!

【१४】यह महामंत्र सिध्ह होने से इंसान नवनिधियों से लबालब हो जाता है।

अब शुरू करते हैं-किस्सा काली-कंकाली का…

【१५】सर्वप्रथम अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाने वाली माँ महाकाली को यह वैदिक सूत्र समर्पित है…

ॐ असतो मा सद्गमय।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्मा अमृतं गमय।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

【१६】अमृतम का उदघोष मन्त्र भी यही है।

【१७】कवि कालीदास जैसे महा अज्ञानी को ज्ञान का अतुल्य भण्डार देने वाली कंकाली देवी को शत-शत नमन है।

【१८】काली तन्त्र, दुर्गा शप्तशती, मन्त्र महोदधि आदि प्राचीन ग्रन्थों में भगवती शिवा ने समय-समय पर सृष्टि की सुरक्षा एवं अपने बच्चों को बचाने के लिए विभिन्न रूप धारण किये…

【१९】महर्षि मार्केंडेय ने माँ महाकाली से बुद्धि-विवेक, ज्ञान पाने के लिए स्तुति की है-

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यैः नमस्तस्यै नमस्तस्यैः नमो नमः।।

महाकाली कलकत्ते वाली को क्यों कहते हैं दुर्गा ?….

【२०】आयुर्वेद ग्रंथो के अनुसार देवी के दुर्गा नाम के सम्बंध में कहा जाता है कि- शरीर रूपी दुर्ग में निवास करने के कारण इन्हें दुर्गा भी कहते हैं।

【२१】शास्त्रों में लिखा है- दुर्गम नामक दैत्य को मारने के कारण दुर्गा है।

【२२】सिद्ध तन्त्राचार्य कहते हैं- मनुष्य के लिए कठिन से कठिन दुर्गम कार्य को सुगम करने के कारण दुर्गा है।

【२३】देवी उपनिषद में कहा गया है-

!!दुर्गात्संत्रायते यस्माद्देवी दुर्गति कथ्यते!!

दुर्गासप्तशती के प्रथम चरित्र में देवी के जिस रूप का ध्यान किया गया है, वह दश भुजा में दस आयुध धारण करने वाली महाकालिका-महाकाली है।

【२४】देवी महाकाली की दस भुजाएं हैं जो दस दिशाओं की प्रतीक हैं।

【२५】काल की कलना, गणना करने वाली महाकाल की शक्ति माँ महाकाली भी है।

【२६】महाविद्या सूत्र प्रथम पटल सूत्र-९ में लिखा है….

!!काल एव स्त्रीलिंगेन काल्युच्यते!!

【२७】हमारे शरीर में जो दस तरह के प्राण हैं, वही काली है-

      • प्राण वायु
      • अपान वायु
      • समान वायु
      • व्यान वायु
      • उदान वायु
      • नाग वायु
      • कूर्म वायु
      • कृकल वायु
      • देवदत्त वायु
      • धनंजय वायु

【२८】आयुर्वेदिक शास्त्रों के हिसाब से श्वेत रक्त कण और लाल रक्त कण अर्थात WBC तथा RBC जीवन के लिए दोनों जरूरी हैं।

【२९】माँ ब्रह्मांड का सबसे छोटा शब्द है।

【३०】यह मुक्तिदाता महामंत्र

【३१】!!ॐ!! भी 3 अक्षरों से बनता है।

【३२】MOTHER में केवल “M” हटाते ही सारा संसार OTHER हो जाता है।

【३३】माँ महाकाली हमारे लिए सबसे लड़ती रहती है। अतः माँ का स्मरण नित्य करें….

तन-मन और हमारी आत्मा की रक्षा के लिए सकारात्मक सोच यानी पॉजिटिव थिंकिंग बनाये रखने एवं धन की वृद्धि, रक्षा के लिए दैत्य रूपी नकारात्मक शक्तियों यानि निगेटिव थिंकिंग से महाकाली सदैव युद्ध करती रहती है।

【३४】अतः मन की मलिनता मिटाने के लिए प्रत्येक नवरात्रि में महाकाली की उपासना अवश्य करें। यह तन और आत्मा को पुण्य-पवित्र बनाकर सभी प्रकार की सिद्धि-समृद्धि में मददगार है।

हे माँ!..तुम्हे शत-शत नमन—-

【३५】भुवनेश्वरी सहिंता में कहा गया है-

!!यथा वेदों …..तद्वतसप्तशती स्मृता!!

वेद की तरह दुर्गा सप्तशती भी अनादि है अपौरुषेय है। मार्कंड़य पुराण के अंतर्गत होते हुए भी ऋषि मार्केंडेय इसके रचनाकार न होकर मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। उन्होंने अपने ध्यान-साधना में देवी के जिन रूपों और चरित्रों का साक्षत्कार किया वही इसमें वर्णित है।

【३६】माँ शक्ति के सम्बंध में ऋग्वेद का वगृम्भणी सूक्त जिसे देवी सूक्त कहा जाता है, इस बात का प्रमाण है।

【३७】सप्तशती का त्रयोदश अध्याय में इसका संकेत भी किया गया है-

!!स च वैश्यस्यपस्तेपे देवीसूक्तम परं जपन!!

【३८】दुर्गापाठ के फायदे…महाराज सुरथ ऋषि मेधा के समक्ष बहुत दुखी होकर निवेदन करते है

!दु:खाय यन्मे मनस: स्वचित्तायत्ततां बिना!

अर्थात- मेरा मन मेरे मुताबिक कार्य नहीं कर रहा है। यह मेरे अधीन नहीं है। मेरा मन, मेरा होते हुए भी मेरी आज्ञा न मानकर मेरे दुःख का कारण बन रहा है।

यह सुनकर ऋषि मेधा भगवती की उपासना करने की सलाह देते हैं।

【३९】माँ महाकाली की साधना से काम यानि सेक्स का काम- तमाम हो जाता है।

【४०】क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर रुपी दैत्य अपने आप शान्त हो जाते हैं।

【४१】यह महामाया का ही प्रभाव है जिसने इस सन्सार को चलाने के लिए सबको ममता के भवंर और मोह में

डाल रखा है। यह भगवान शिव की योगमुद्रा है जिसकी वजह से जगत सम्मोहित हो रहा है।

महामाया माँ काली की काली छाया से ही सूर्य ग्रहण लगता है। तन्त्रशास्त्रों में काली को राहु की माँ धुमेश्वरी बताया है। देखें सूर्य ग्रहण का अदभुत नजारा…

सूर्य ग्रहण का चित्र
अमृतम खोज

【४२】माँ दुर्गा ही इस चराचर जगत को उत्पन्न करने वाली है। वही सन्सार के वन्ध और मोक्ष का कारण है। वह नित्य है। सारा जगत भगवती का ही विस्तार है।

【४३】सन्सार में केवल पूर्ण है, तो केवल मां ही है। मां में ही महामाया रूपी जगत बसता है।

माँ के कारण है-पूर्णिमा का महत्व…

【४४】माँ सदा से ही पूर्ण है। इसलिए इस तिथि को पूर्ण+मां बोलते हैं।

【४५】माँ परिवार का प्रकाश है।

【४६】भारतीय संस्कृति के अनुसार हर महीने पूर्णिमा तिथि आती है।

【४७】शास्त्रों में देवी दुर्गा शक्ति न स्त्रीलिंग है न पुरुष है और नाहीं नपुंसक लिंग है।

【४८】मां भगवती महाकाल की पत्नी/शक्ति महाकाली को हम एनर्जी अथवा विद्युत को हम भले ही व्याकरण की दृष्टि से स्त्रीलिंग कह लें पर उसमें ऐसा कोई तात्विक भेद कर सकना कठिन है। इसलिये कहा गया…

परमात्मा शिवः प्रोक्त: शिवा सैव प्रकीर्तिता।

अर्थात- जिसे परमात्मा शिव कहा जाता है, उसी की गुप्त शक्तियों-सिद्धियों को शिवा भी कहा गया है।

【४९】“मार्केंडेय पुराण” में महर्षि ने प्रार्थना की है

न त्वमम्ब पुरुषों न चांगना

चित्स्वरूपिणी न शंढतापि ते।

नापि भर्तुरपि ते त्रिलिंगता

त्वां विना न तदपि स्फुरेदयम।।

अर्थात…हे माँ तू न पुरुष है और न स्त्री और ना ही नपुंसक। तुम्हारे पति यानी महादेव में भी तीनो लिंग नहीं है, हे शक्ति-भगवती, जगत्जननी तुम्हारे बिना शिव में भी स्फुरण नहीं होता।

【५०】शिवलिंग जैसा है-मानव मस्तिष्क….

हम सभी मनुष्य शिव का ही स्वरूप हैं। मानव मस्तिष्क शिंवलिंग जैसा होता है। हम दोनों हाथ जब आगे की तरफ सीधे कर देते हैं, तो वह जलहरी बन जाती है। अर्थात हमारे हाथ शक्ति का रूप हैं।

【५१】शारदा तिलक-पदार्थादर्श टीका, श्रीविद्यार्णव तन्त्र, शिवसूत्र आदि रहस्योउपनिषद में लिखा है-

सब शव से शिव बने हैं…

【५२】“शिव” में जो छोटी ‘इ’, की मात्रा है, इकार शक्ति है वही शिव की शक्ति है। अतः इसके हटते ही शिव भी “शिव से शव” हो जाता है।

      • हम सब भी शिव का अंश हैं और इस शरीर में जो इकार शक्ति है वही दुर्गा स्वरूपणी ज्ञानशक्ति माँ महाकाली है। माँ एक ऐसा शब्द है, जो दोनो ओंठ मिलाए नहीं बोल सकते हैं।

शिव की आधार शक्ति शिवा है जब शिव में शक्ति का आभास होता है, तो वही शिवा बन जाते हैं। शक्ति जब शक्त या कठोर बन जाती है, तब घर-द्वार, व्यापार बर्बाद हो जाता है….अघोरी साधुगण कहते हैं कि…

【५३】जब शिव – शव बन जाता है, तो सन्सार का प्रलय यानी नष्ट हो जाता है और शक्ति जब शक्त बन जाती है यानि विनम्रता, दया भाव त्याग देती है, तो परिवार तबाह हो जाता है।

【५४】शिव ही सत्य-सुंदर क्यों है?….

दुर्गा शप्तशती रहस्य में परमात्मा शिव का एक नाम सच्चिदानंद है। यह तीन-सत, चित्त और आनंद से मिलकर बना है।

【५५】परमात्मा सत है, चेतन है, सदैव रहने वाला है-चैतन्यमय है। चेतन्य स्वरूप है और आनंदमय है।

【५६】चेतना हर क्रिया का कारण है। अतः जिस मनुष्य की चेतना शक्ति जितनी अधिक जागृत होगी, उसी अनुपात में वह जीवन में सर्व आनंद पाता है। इसे ही ग्रंथों में सच्चिदानंद कहते हैं।

【५७】देवी भागवत में कहा गया है..

या देवी सर्वभूतेषु चितिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

अर्थात…जो शक्ति सब जीवों में चेतन्य के रूप में प्रकाशमान है जो सबमें क्रीड़ा करती है, जो सबकी शक्ति, ऊर्जा, पॉवर है, जो आलोक रूपा है-उस जगत्जननी को बारम्बार नमस्कार है।

【५८】शास्त्रों के गहन अध्ययन से मालूम पड़ता है कि शिव और शक्ति दो न होकर एक ही हैं-

【५९】जहाँ शक्ति है, वहीं शिव है और जहां शिव हैं वहां कल्याण है। परोपकार है। मङ्गल है।

【६०】दोनों के लिये कहा गया है…

!!शक्तिशक्तिमतोरभेदात!!

अर्थात शिव और शक्ति अर्थात महाकाल-महाकाली में भेद या अंतर हो ही नहीं सकता।

【61】माँ महाकाली को समर्पित…७/सात अक्षर का चमत्कारी मन्त्र- बहुत कम समय में सिद्धि-समृद्धि, सुख-सफलता और अच्छा स्वास्थ्य पाना चाहते हो, तो इस लेख का अनुसरण अवश्य करें!

【६२】यह मन्त्र महिलाओं की सुंदरता वृद्धि में सहायक है।

!!ॐ!! के बारे में दुर्गा सप्तशती में बताये गए हैं- चमत्कारी प्रभाव और रहस्य…

!!नमश्चचण्डीकायै!! के रहस्य जाने–

【६३】दुर्गा सप्तशती का प्रथम चरित्र अर्थात पहला अध्याय !!ॐ नमश्चचण्डीकायै!! मन्त्र से आरम्भ होता है। यह सात अक्षर का माँ महाकाली जगदम्बा का मन्त्र है।

【६४】!!ॐ!! के विषय में लिखा गया है कि…इस मंत्र के आरम्भ में ॐकार का प्रयोग निम्नांकित कारणों से किया गया है-

【६५】“प्रपंचसार ग्रन्थ” में कहा गया है-

अस्य तु वेदादित्वात सर्वमनुनां प्रयुज्यतेsथादौ।

【६६】!!ॐ!! में 3 अक्षर हैं- अ, उ और म।

ऋग्वेद के आरम्भ “अग्निमीले” के अकार से शुरू होता है। इसलिए !!ॐ!! को वेदादि भी कहते हैं। इसीलिए इसका प्रयोग सर्वप्रथम मन्त्र के आदि से किया गया है।

【६७】आगे लिखा है-

सर्वमन्त्रप्रयोगेषु ओमित्ययादौ प्रयुज्यते।

तेन सम्परिपूर्णानि यथोक्तानि भवन्ति हि।

जप्त्वा च प्रणवं चादौ स्तोत्रं वा सहिंता पठेत।

अन्ते च प्रणवं द्द्यादित्युवाचादि पुरुष:।

【६८】संक्षिप्त में इसका अर्थ यही है कि कोई भी मन्त्र बिना !!ॐ!! के अपूर्ण है। सभी मन्त्रों के आदि यानि शुरू में ॐ का प्रयोग जरूरी है जिससे मन्त्र की पूर्णता और अभीष्ट की सिद्धि होती है।

【६९】”नादबिन्दुउपनिषद” में लिखा है-

मंगल्यं पावनँ धर्म्यम सर्वकामप्रसाधनम।

ॐकार परमं ब्रह्म सर्वमन्त्रेषु नायकम।

अर्थात- ॐ मंगलवाची शब्द है। अत्यंत पवित्र है। तन-मन और आत्मा को शुद्ध करने वाला है। सभी कामनाओं की पूर्ति करने में विशेष सहायक है। सन्सार को धारण करने वाला है। ॐ ही ईश्वर, शिव, महादेव अर्थात ब्रह्म का वाचक है तथा सृष्टि के सभी मन्त्रों में प्रधान है।

【७०】अवरक्षणे धातु से ॐ शब्द निर्मित होता है। ॐ ही साधक-उपासक की सब प्रकार से रक्षा करने के कारण सर्वप्रथम हर मन्त्र के आरम्भ में ॐ का प्रयोग किया जाता है।

【७१】”स्वच्छन्द तन्त्र” में कहा गया है-

प्रणवादया स्मृता मंत्राश्चतुर्वर्गफलप्रदा।

【७२】ओंकार से प्रारंभ होने वाले मन्त्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों केे ही देने वाले होते हैं अतः किसी भी मन्त्र के शुरू में !!ॐ!! का उच्चारण अवश्य करें।

【७३】”हठयोगदीपिका” ग्रन्थ में उल्लेख है

मन्त्र के प्रारंभ में ॐ के उच्चारण से साधक उसी प्रकार पाप मुक्त होकर शुद्ध पवित्र हो जाता है कि जिस प्रकार जहरीला नाग केंचुली को त्यागकर फिर से नवीन हो जाता है। पाप केंचुली के समान होता है जिसके छूट जाने पर मानव तन-मन से पाक-साफ हो जाता है।

【७४】ॐकार के इन सभी प्रयोजनों के स्मरण करते हुए सदनक का चित्त ध्येय, उद्देश्य या मनोकामना की पूर्ति के लिए एकाग्र होने लगता है।

प्रणवार्थच भाव्यतश्चित्तमेकाग्र सम्पद्यते।

【७५】श्रीमद्कालितन्त्र के प्रथम चरित्र में देवी को-सुधात्वमक्षरे नित्ये त्रिधामात्रात्मिका स्थिता- कहा गया है।

【७६】“शान्तनवी टीका” में इसलिए कहा गया है-

त्रिधामात्रात्मिकेत्येनेन ओमात्मकत्वं विवक्षितम।

【७७】माँ भगवती ॐमात्मक है, इसलिए प्रथम त्रिधामात्रात्मिका देवी का स्मरण किया गया है।

【७८】“भावनोपनिषद” नामक पुस्तक में कहा गया है…..जो साधक ॐ का उच्चारण वैदिक तरीके से यानि नाभि से अ कण्ठ से उ का थे ओंठो से म का प्रतिदिन ५४० बार उच्चारण करने लगे, तो मात्र 15 दिन में बड़ी से बड़ी सिद्धियां पा सकता है।

【७९】ऐसे साधक पर तन्त्र-मन्त्र-यंत्र, जादू-टोने, टोटके, मारण, उच्चाटन, एवं प्रेत-पिशाच का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता।

【८०】!!ॐ!! की साधना करने वालों का कालसर्प-पितृदोष, पितृमातृकाओं एवं मातृमातृकाओं का दोष हमेशा के लिए मिट जाता है।

【८१】अधिक जानकारी के लिए सन 2002 में प्रकाशित अमृतम “कालसर्प विशेषांक” एवं अमृतम पत्रिका द्वारा प्रकाशित अघोर विशेषांक कहीं मिल जाये, तो अध्ययन कर सकते हैं।

【८२】विशेष- ॐ जप की प्रक्रिया हमेशा सदगुरू के सानिध्य में ही करें।

【८३】अगले लेख में काली का सिद्ध मन्त्र “नमश्चण्डिकायै” के बारे में एक बहुत ही दुर्लभ खोज पढ़े।

!!अमृतम!!

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■ प्राचीन मान्यता है कि- इनके समक्ष 108 दीपक राहु की तेल के प्रज्ज्वलित करने से मूर्ख आदमी भी विद्वान हो जाता है।

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■ उज्जयिनी के काली पीठ पर माँ के दर्शन से मानसिक विकार दूर होते हैं।

■ उत्तरांचल में केदारनाथ के समीप कालीमठ के दर्शन से असंख्य सिद्धि-समृद्धि आने लगती है।

■ दक्षिण के वेदेहीश्वरम के कालितन्त्र मंदिर में माँ को प्रणाम करने से पूर्व जन्म के पाप-प्रारब्ध, कालसर्प-पित्तदोष कट जाते हैं।

■ शखडोल शहर से 12 km दूर माँ कंकाली की 8 फिट ऊंची नग्न प्रतिमा स्थापित है।

■ भोपाल से 20 km दूर रायसेन जिले का गुदावल गाँव में भी कंकाली माता का एक प्राचीन मंदिर है।

■ कलकत्ते के काली मंदिर में स्वामी विवेकानन्द के गुरु राकृष्ण परमहंस ने दर्शन किये थे।

■ चिदम्बरम में भद्रकाली की मूर्ति नागिन कि बांबी से निकली है।

आप भी कम उम्र में जितना घूम सकते हैं, घूमकर महाकाल और महाकाली के दर्शन करें अन्यथा अन्त में यही गाओगे कि- नीचे वीडियो क्लिक कर सुनें!

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