रात्रि में दही और रायता खाना हो सकता है हानिकारक। दही के संस्कृत श्लोक पढ़कर आनंद से भर जायेंगे

  • रात को दही और दही से बन वाले उत्पादों का भूलकर भी सेवन नहीं करना चाहिए। रायता कितने तरह का होता है।
  • भारत में लगभग 50 तरह के रायता बनाकर खाएं जाते हैं यह संख्या ज्यादा भी हो सकती है। रायता बनाने की विधि जानने से पहले दही के गुण, लाभ, हानि के बारे में अवश्य जाने।
  • रायता बनाया भी जाता है और रायता फेलाया भी जाता है। जब कोई किसी काम को बिगाड़ना हो, तो उसे रायता फेलाना कहते हैं।
  • रायता बनाने के लिए दही को मथ कर इसमे प्याज, ककडी़, खीरा, टमाटर, या बेसन की बूंदी, अनार और अनन्नास आदि भोज्य सामग्री मिलाई जाती हैं।
  • रायते का आधार दही है और दही दूध से बनता है।रायता दही आधारित एक भारतीय व्यंजन है।
  • आयुर्वेद में रायते के फायदे नुकसान का उल्लेख उपलब्ध है। रायते के लिए संस्कृत का एक श्लोक इसकी गुणवत्ता को दर्शाता है।
  • रायता (Raita) का संस्कृत नाम दाधेयम् है।

दध्युष्णं दीपनं स्निग्धं कषायानुरसं गुरुरायता।

पाकेऽम्लं ग्राहि ‘पित्तास्त्रशोथमेदः कफप्रदम्।।

दाधेयम्मूत्रकृच्छ्रे प्रतिश्याये शीतगे विषमज्वरे।

अतीसारे ऽरुचौ कार्ये शस्यते बलशुक्रकृत्।।

  • अर्थात उष्ण, अग्निदीपक, स्निग्ध, किञ्चित् कषाय रस युक्त, गुरु, विपाक में अम्लरसयुक्त, ग्राही एवं पित्त, रक्तविकार, शोथ, मेद और कफ को उत्पन्न करने वाला होता है और मूत्रकृच्छ्र, जुखाम, शीत विषमज्वर, अतीसार, अरुचि तथा कृशता में उत्तम होता है और बल तथा शुक्र को बढ़ाने वाला होता है।
  • द्रव्यगुण विज्ञान का कहना है कि दधि युक्त रायता देह के लिए अत्यन्त हितकारी होता है। रायता सुबह खाएं, तो सोना है। दिन में चांदी और रात को खाना मिट्टी के समान होता है। रात्रि में ग्रहण किया गया रायता पचता नहीं है और अनेक पेटवकी बीमारी पैदा करता है।

अथ दाधेयम् भेदानाह

आदौ मन्दं ततः स्वादु स्वाद्वम्लञ्च ततः परम्।

अम्लं चतुर्थमत्यम्लं पञ्चमं दधि पञ्चधा।।

दही रायते के भेद –१ मन्द, २ स्वादु, ३ स्वाद्वम्ल, ४ अम्ल, ५ अत्यम्ल इस भाँति से दाधेयम् के पाँच भेद होते हैं।

किस तरह के दही का रायता उपयोगी होता है

अथ मन्दादिदध्नो लक्षणं गुणांश्चाह

मन्दं दुग्धवदव्यक्तरसं किञ्चिद्धनं भवेत्।

मन्दं स्यात्सृष्टविण्मूत्रं दोषत्रयविदाहकृत्॥

यत्सम्यग्घनतां यातं व्यक्तस्वादुरसं भवेत्।

अव्यक्ताम्लरसं तत्तु स्वादु विज्ञैरुदाहृतम्॥

स्वादु स्यादत्यभिष्यन्दि वृष्यं मेदः कफावहम्।

वातघ्नं मधुरं पाके रक्तपित्तप्रसादनम्॥

स्वाद्वम्लं सान्द्रमधुरं कषायानुरसं भवेत्।

स्वाद्वम्लस्य गुणा ज्ञेया सामान्यदधिवज्जनैः।।

यत्तिरोहितमाधुर्यं व्यक्ताम्लत्वं तदम्लकम्।

अम्लं तु दीपनं पित्तरक्तश्लेष्मविवर्द्धनम्।

तदत्यम्लं दन्तरोमहर्षकण्ठादिदाहकृत्।

अत्यम्लं दीपनं रक्तवातपित्तकरं परम्॥

  • मन्द दही के लक्षण— जो दही – दूध के समान ( ठीक से नहीं जमा हुआ), अव्यक्त रस वाला तथा कुछ गाढ़ा होता है उसे ‘मन्द’ कहते हैं।
  • मन्द दही के नुकसान– मल तथा मूत्र की प्रवृत्ति करने वाला, त्रिदोष और दाह को उत्पन्न करने वाला होता है। स्वादु दही के लक्षण – जो दही भलीभाँति गाढ़ा हो गया हो और जिसका स्वाद (मधुर) रस अच्छी तरह प्रगट हो रहा हो तथा अम्लरस अव्यक्त हो (ठीक से नहीं मालूम पड़ता हो) उसे विद्वानों ने ‘स्वादु’ संज्ञक दही बताया है।
  • स्वादु संज्ञक दही – अत्यन्त अभिष्यन्दी, वीर्यवर्धक, मेद तथा कफ को उत्पन्न करने वाला, वातनाशक, विपाक में मधुर रसयुक्त तथा रक्तपित्त को शांत करने वाला होता है। स्वाद्वम्ल संज्ञक दही के लक्षण – गाढ़ा, मधुर रसयुक्त तथा अन्त में कषाय रस युक्त दही को ‘स्वाद्वम्ल’ संज्ञक दही कहते हैं ।
  • स्वाद्वम्लसंज्ञक दही- गुणों में साधारण दही के समान होता है ऐसा विद्वानों का मत है।
  • अम्लसंज्ञक दही के लक्षण – जिस दही में मधुर रस छिपा हुआ हो और अम्ल रस प्रगट हो रहा हो उसे ‘अम्ल’ संज्ञक दही समझना चाहिये। अम्लसंज्ञक दही – अग्निदीपक एवं पित्त, रक्तविकार तथा कफ को बढ़ाने वाला होता है।
  • अत्यम्ल संज्ञक दही के लक्षण – जिस दही के खाने से दाँत हर्षित हो जायें तथा रोंगटे खड़े हो जायें और कण्ठ आदि में दाह होने लगे उसे ‘अत्यम्ल’ संज्ञक दही जानना चाहिये । – अत्यम्ल संज्ञक दही – अग्निदीपक एवं रक्तविकार, वात तथा पित्त को अत्यन्त उत्पन्न करने वाला होता है।

अथ गोदधिगुणानाह गाय का दही का रायता

गव्यं दधि विशेषेण स्वाद्वम्लं च रुचिप्रदम्।

पवित्रं दीपनं हृद्यं पुष्टिकृत्पवनापहम्।

उक्तं दध्नामशेषाणां मध्ये गव्यं गुणाधिकम्।।

  • अर्थात – विशेष रूप से मधुर तथा अम्लरसयुक्त, रुचि उत्पन्न करने वाला, पवित्र, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, पुष्टिकारक तथा वातनाशक होता है और सम्पूर्ण दहियों के बीच में गाय का ही दही अधिक गुण करने वाला कहा हुआ है।

अथ माहिषदधिगुणानाह भैंस का दही का रायता

माहिषं दधि सुस्निग्धं श्लेष्मलं वातपित्तनुत्।

स्वादुपाकमभिष्यन्दि वृष्यं गुर्वस्त्रदूषकम्॥

  • अर्थात अत्यन्त स्निग्ध, कफजनक, वात तथा पित्त नाशक, विपाक में मधुररसयुक्त, अभिष्यन्दी, वीर्यवर्धक, गुरु तथा रक्त को दूषित करने वाला होता है ।

अथाजदधिगुणानाह बकरी का दही का रायता

आजं दध्युत्तमं ग्राहि लघु दोषत्रयापहम्।

शस्यते श्वासकासार्शः क्षयकार्येषु दीपनम्॥

  • उत्तम, ग्राही, लघु, त्रिदोषनाशक, अग्निदीपक एवं – श्वास, खाँसी, अर्श, कृशता में हितकर होता है। क्षय

अथ पक्वदुग्धजातस्य गुणानाह दाधेयम्

पक्वदुग्धभवं रुच्यं दधि स्निग्धं गुणोत्तमम्।

पित्तानिलापहं सर्वधात्वग्निबलवर्द्धनम्।।

  • पकाये हुये दूध से तैयार किया हुआ दही का रायता – रुचिकारक, स्निग्ध, उत्तम गुण वाला, पित्त तथा Tत को दूर करने वाला एवं – सम्पूर्ण धातु, अग्नि तथा बल को बढ़ाने वाला होता है।

अथ निःसारदुग्धजनितदध्नो गुणानाह

असारं दधि सङ्ग्राहि शीतलं वातलं लघु।

विष्टम्भि दीपनं रुच्यं ग्रहणीरोगनाशनम्॥

निःसार दूध का दही से निर्मित रायता– संग्राही, शीतल, वातजनक, लघु, विष्टम्भकारक, अग्निदीपक, रुचिकारक एवं — ग्रहणीरोग को नष्ट करने वाला होता है।

अथ गालितदध्नो गुणानाह

गालितं दधि सुस्निग्धं वातघ्नं कफकृद् गुरु।

बलपुष्टिकरं रुच्यं मधुरं नातिपित्तकृत्॥

  • गालित अर्थात वस्त्र से छाने हुये दही- से निर्मित रायता अति स्निग्ध, वातनाशक, कफकारक, गुरु, बल तथा पुष्टि को करने वाला, रुचिकारक, मधुररसयुक्त तथा अत्यन्त पित्तकारक नहीं होता है अर्थात् किञ्चित पित्त करने वाला होता है।
  • दही हमेशा मीठा खाना ही लाभकारी है

भावप्रकाशनिघण्टुः शास्त्र के मुताबिक मीठा दही सुबह के समय अधिक से अधिक खाना सबसे उत्तम है। नमकीन दही पतला करके या मट्ठा बनाकर लेना हितकारी है अन्यथा ये अम्लपित्त, एसिडिटी, उत्पन्न करता है और पेट में एसिड का निर्माण कर कब्ज पैदा करता है। संस्कृत का यह श्लोक देखें।

अथ शर्कराऽऽदिसहितस्य दध्नो गुणानाह

सशर्करं दधि श्रेष्ठं तृष्णापित्तास्त्रदाहजित्।

सगुडं वातनुद् वृष्यं बृंहणं तर्पणं गुरु।।

अर्थात शक्कर मिला हुआ दही – श्रेष्ठ होता है एवं तृष्णा (प्यास), पित्त, रक्तविकार तथा दाह को नष्ट करने वाला होता है।

गुड़ मिला हुआ दही—वातनाशक, वीर्यवर्धक, बृंहण यानि रस रक्तादिवर्धक, तृप्तिकारक तथा गुरु होता है।

 

रात्रि में दही खाने से होती है भयंकर हानि

अथ रात्रौ दधिभक्षणस्य निषेधमांह दाधेयम्

न नक्तं दधि भुञ्जीत न चाप्यघृतशर्करम्।

नामुद्रसूपं नाक्षौद्रं नोष्णं नामलकैर्विना॥

  • रात्रि में दही का रायता खाने का निषेध– रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये और बिना घी तथा शक्कर के या बिना मूंग की दाल के बिना मधु के, गरम किंवा बिना आंवला के दही नहीं खाना चाहिये।
  • अयमर्थः

रात्रौ दधि न भुञ्जीत चेत्तदा- अघृतशर्करसमुद्गसूपमक्षौद्रमुष्णं विनाऽऽमलकश्च दधि न भुञ्जीत।

तेन घृतशर्कराऽऽदियुक्तं दधि रात्रावपि भुञ्जीतेत्यर्थः।

  • यहाँ पर उपर्युक्त श्लोक का वास्तविक अर्थ यह समझना चाहिये कि – रात्रि में दही से बनी हुई कभी कोई चीज नही खाना चाहिये, यदि खाना ही हो तो घी, शक्कर या मूंग की दाल वा शहद किंवा आंवला के बिना अथवा गरम न खायें, इससे यह सिद्ध हुआ कि — घी, शक्कर आदि से युक्त दही रात्रि में भी खाना फायदेमंद रहता है।
  • अतः श्रेष्ठ स्वस्थ्य जीवन के लिए शादी समारोह में दही से निर्मित वस्तुओं का बहिष्कार और परित्याग करें, तो रक्तचाप, मधुमेह और मोटापे से रक्षा होती है।

तथा च

शस्यते दधि नो रात्रौ शस्तं चाम्बुघृतान्वितम्।

दाधेयम् रक्तपित्तकफोत्थेषु विकारेषु तु नैव तत्॥

  • तथा इसी विषय में और भी कहा है कि — रात्रि में दही या दही खाना उचित नहीं है किन्तु यदि जल तथा घी मिला हुआ हो तो खाना उचित है।
  • अगर कोई पित्त, पित्त तथा कफ सम्बन्धी विकारों से पीड़ित या परेशान हो में वह भी अर्थात् जल तथा घी से मिला हुआ भी दही खाना उचित नहीं होता है अर्थात् अहितकर होता है। [१] तद् = अम्बुघृतान्वितमपि (।।१।।) ।।१७।।
  • यहाँ निघंतुकार ने लिखा है की यही ‘तत्’ पद का वह भी अर्थात् जल तथा घी से मिला भी ‘दही’ यह अर्थ समझना चाहिये।
  • ऋतु विशेष से दही या दही की बनी वस्तुएं खाने की विधि तथा निषेध

अथ ऋतुविशेषेण दध्नो विधिनिषेधावाह

हेमन्ते शिशिरे चापि वर्षासु दधि शस्यते।

शरत्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशस्तद्विगर्हितम्।

  • अर्थात – हेमन्त ( अगहन – पूस), शिशिर (माघ – फागुन) तथा वर्षा (सावन-भादो) ऋतु में दही खाना उत्तम है । शरद् (क्वार – कार्तिक), ग्रीष्म (जेठ-आषाढ़) तथा (चैत – वैशाख) ऋतु में दही खाना प्रायः करके निन्दित है अर्थात् निषिद्ध है।
  • ज्वर डेंगू फीवर, मलेरिया, वायरस की बजाय भी दही है
  • अथ विधिमन्तरेण दधिसेवने दुर्गुणानाह

ज्वरासृक्पित्त वीसर्पकुष्ठपाण्ड्वामयभ्रमान्।

प्राप्नुयात्कामलां चोग्रां विधिं हत्वा दधिप्रियः॥

  • अर्थात बिना विधि के दही सेवन करने के दुर्गुण – जो दही का प्रेमी व्यक्ति विधि को छोड़कर अर्थात् जब जिस भाँति दही खाने की विधि है उसके विरुद्ध सदा दही खाता रहता है, तो उसे ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, कुष्ठ, पाण्डु तथा भ्रम रोग एवं प्रचण्ड रूप से कामला रोग उत्पन्न हो जाता है।
  • अतः शास्त्रों के विधि अनुसार विधिपूर्वक दही या दही से बने रायते को खाना विशेष लाभदायक रहता है।

विभिन प्रकार के रायते

  1. बूंदी का रायता भारत में सर्वाधिक खाया जाता है।
  2. बथुआ का रायता
  3. आलू का रायता
  4. दही का रायता
  5. बुरानी
  6. केला – अनार रायता
  7. गाजर रायता
  8. गुलाबी दही
  9. इडली रायता
  10. कचुमर रायता
  • रायते में भुना हुआ जीरा, हींग और कभी कभी पुदीना भी मिलाया जाता है। इसे बिरयानी, कबाब आदि व्यंजनों के साथ एक सहायक व्यंजन के तौर पर पेश किया जाता है।
  • अगले लेख में ५० से अधिक आयुर्वेदिक तरीके रायता बनाने के बताए जाएंगे।

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