महाकाली कलकत्ते वाली

 

 क्यों कहते हैं दुर्गा ….

आयुर्वेद ग्रंथो के अनुसार देवी के दुर्गा नाम के सम्बंध में कहा जाता है कि- शरीर रूपी दुर्ग में निवास करने का कारण दुर्गा है। शास्त्रों में लिखा है- दुर्गम नामक दैत्य को

मारने के कारण दुर्गा है।
तन्त्रचार्य कहते हैं-
मनुष्य के लिए कठिन से कठिन दुर्गम कार्य को सुगम करने के कारण दुर्गा है।
देवी उपनिषद में कहा गया है-
!!दुर्गात्संत्रायते यस्माद्देवी दुर्गति कथ्यते!!
दुर्गासप्तशती के प्रथम चरित्र में देवी के जिस रूप का ध्यान किया गया है, वह दश भुजा में दस आयुध धारण करने वाली महाकालिका-महाकाली है।  देवी की दस भुजाएं हैं जो दस दिशाओं की प्रतीक हैं।
काल की कलना, गणना करने वाली महाकाल की शक्ति काली भी है।
महाविद्या सूत्र
प्रथम पटल सूत्र-९ में लिखा है….
    !!काल एव स्त्रीलिंगेन काल्युच्यते!!
हमारे शरीर में जो दश तरह के प्राण हैं वही काली है-
【१】प्राण वायु
【२】अपान वायु
【३】समान वायु
【४】व्यान वायु
【५】उदान वायु
【६】नाग वायु
【७】कूर्म वायु
【८】कृकल वायु
【९】देवदत्त वायु
【१०】धनंजय वायु
आयुर्वेदिक शास्त्रों के हिसाब से श्वेत रक्त कण और लाल रक्त कण अर्थात WBC तथा
RBC जीवन के लिए दोनों जरूरी हैं। तन-मन और हमारी आत्मा की रक्षा के लिए सकारात्मक सोच यानी पॉजिटिव थिंकिंग
बनाये रखने के लिए दैत्य रूपी नकारात्मक शक्तियों यानि निगेटिव थिंकिंग से महाकाली सदैव युद्ध करती रहती है।
अतः मन की मलिनता मिटाने के लिए प्रत्येक नवरात्रि में महाकाली की उपासना अवश्य करें। यह तन और आत्मा को पुण्य-पवित्र
बनाकर सभी प्रकार की सिद्धि-समृद्धि में मददगार है।
अभी बहुत बाकी है महाकाली के बारे में
            !!अमृतम!!
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