शिव और अघोरियों के रहस्य

एक अंगूठा, चार उंगलियां,

सब झूठा, सत्य नाम है शंकर।

वृक्ष में बीज, बीज में बूटा,

सब झूठा सत्य नाम है शंकर।

इसकी व्याख्या बहुत विशाल है।

  • आदिशंकराचार्य ने कहा है कि- व्यक्ति ठान ले, तो वह स्वयं ही शिव बन सकता है। उन्होंने अनेकों बार शिवोहम, शिवोहम अर्थात “मैं शिव हूँ, “मैं ही शिव हूँ”-कहकर संसार को चेताया है।
  • आज के आधुनिक विज्ञान ने सिद्ध-साबित किया है कि इस सृष्टि में सब कुछ शून्यता से आता है और वापस शून्य में ही चला जाता है।
  • इस अस्तित्व का आधार और संपूर्ण ब्रम्हांड का मौलिक गुण ही एक विराट शून्यता है। उसमें मौजूद आकाश गंगाएं केवल छोटी-मोटी गतिविधियां हैं, जो किसी फुहार की तरह हैं। उसके अलावा सब एक खालीपन है।
  • काशी विश्वविद्यालय के महान विद्वान द्वारा लिखी गई मन्त्र और मातृकाओं का रहस्य किताब में बताया है कि-
  • संसार जिन्हें महादेव शिव नाम से जानता, समझता वही सब दुःख-सुख का कर्ता-धर्ता है।
  • कभी ध्यान से चिंतन-मंथन करें, तो अनुभव होगा हमारा मस्तिष्क शिवलिंग की तरह ही है। और जलहरी या अरघा हमारे हाथ हैं। दोनों हाथों को आगे की तरफ फैलाएं, तो ह्रदय तक का हिस्सा अरघा सहित शिवलिंग बन जाता है।
  • अघोरी कहते हैं कि- मन्त्र-जाप करते समय जप मन्त्रों को अपनी नाभि में एकत्रित करने से शीघ्र ही सिद्धि मिलती है अर्थात जैसे हम धन-सम्पदा, रुपये-पैसे को तिजोरी, अलमारी या बैंक में संग्रहित करते हैं, तभी वे सुरक्षित रहते हैं, वैसे ही हमें अपने जप-मन्त्रों को नाभि में स्टोर करने चाहिए। यह परम ज्ञान आज के गोरखधन्धे में लगे गुरुओं को भी कम है।
दक्षिण भारत के तिरुणामलय नामक शहर में स्थित स्वयम्भू अग्नितत्व शिवलिंग श्री अरुणाचलेश्वरा महादेव के परम भक्त, तपस्वी महर्षि रमण कहते थे।
  • परम् सूर्य उपासक स्वामी विशुद्धआनंद, इन्होंने दुनिया के महान वैज्ञानिकों के सामने सायनाइट विष पीकर सबको हिला दिया था। काशी में इनका आश्रम रेलवे स्टेशन के नजदीक है।

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