ब्रह्मांड का लघु रूप:———–

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मानव शरीर एक शिव मंदिर है भगवान शिव अर्धनारीश्वर हैं

इसमें आधा भाग नर और आधा भाग नारी के रूप में ही समाहित है वेदों में नर हो या नारी पुरुष ही कहा जाता है..

और रुद्र को परम पुरुष कहा गया है इसका अधिठाता जीवात्मा इस शरीर रूपी पूरी में बसता है..

अतः वह पुरुष है हमारा शरीर एक पिंड की तरह है जिसका एक मुख दो बाहु 1 पेट तथा दो पैर है ..

जो एक दूसरे के विरुद्ध खींचातानी नहीं अपितु सहकार रूप में समस्त शरीर पिंड के हित में मिलजुल कर कार्य करते हैं ..

जो भी कुछ इस विशाल ब्रह्मांड में है वही सब कुछ लघु रूप में इस मानव पिंड में हैं..

अखिल ब्रह्मांड में अनेक देवता विशाल रूप में रहते हैं ..

उनके पुत्र देवता लघु रूप में पुरुष पिंड में प्रविष्ट होकर पुरुष के सभी क्रियाकलापों का सहकार भाप से समस्त शरीर के हित में संचालन करते हैं!

इसलिए यहां मानव शरीर एक शिव मंदिर है जिसमें शिवलिंग स्थापित है..

हमारा मस्तिष्क शिवलिंग स्वरूप और दोनों हाथों को आगे करें तो जल हरि अर्ध का रूप बन जाता है..

इस मानव शरीर मैं असंख्य देवी देवता प्रतिष्ठित होकर असत्य से सत्य की ओर अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरता की ओर मरणधर्मी में शरीर को ले जाते हैं..

शरीर रूपी मंदिर में प्रमुख देवी देवता किस प्रकार प्रविष्ट होकर प्रतिष्ठित हैं इसका वर्णन उपनिषद मैं इस प्रकार है..

1 अग्नि – वाणी बनकर मुख में प्रविष्ट हो प्रतिष्ठित हुई

2 वायु – प्राण बनकर नासिका में

3 सूर्य – चक्षु बंद कर नेत्रगोलको में

4 चन्द – मन बनकर मस्तिष्क और ह्दय में

5 दिशा – श्रोत्र बनकर कर्ण गोलकों में अर्थात कानो में

6 औषधि – वनस्पति देवता रोम बनकर त्वचा में

7 मत्युदेवता – अपान बनकर नाभि में

8 जल देवता – रेन बनकर उपस्थ में

9 धाता देवता – धारण शक्ति बनकर

10 तवस्ता देवता – कारीगर बनकर इंद्रिय गोलक अंग प्रत्यंग निर्माण करने टूट-फूट की मरम्मत करने समस्त शरीर में

11 इंद्र देवता – इन सभी देवताओं का नियंत्रक राजा बन कर मन में

12 स्वयं परब्रह्मा महादेव – जीवात्मा रूप में मानव शरीर का अधिष्ठता बनकर मूर्द्धा को छोड़कर इस शरीर में प्रतिष्ठित हुआ है

भगवान शिव अपने पुत्र समान देवों को उत्पन्न कर व मानव देह मैं स्थान देकर महादेव विश्व ब्रह्मांड देह में स्थान देकर रहने लगे जितने नर नारी इस संसार में है!

तथा भविष्य में होंगे उतने ही देवपुत्र मानव शरीर में रहने लगे और रहेंगे यह देव संजीवनी जल से संचित करने वाले हैं ..

हमारे सभी अंगों में देवताओं का निवास है जिससे यह संपूर्ण शरीर एक अंग प्रत्यंग जीवित है ..

जब कोई देवी-देवता शरीर से निकल जाता है तो वहां अंग मैं तो कर कार्य करना बंद कर देता है..

यथा नेत्रों में सूर्य देव निकल जाए तो भले ही नेत्र गोलक बने रहे किंतु दृष्टि शक्ति समाप्त हो जाती है..

जब सभी देव इस शरीर को छोड़कर चले जाते हैं तो यहां शरीर मृत हो जाता है…

सभी देवों ने अपने पुत्रों को अग्नि देव के संरक्षण में दिया है तथा अग्नि देव सभी पुत्रों या उनके अंशु को अपने साथ धारण करते हैं!

इसलिए अग्नि देव के उष्णता रहने तक सब देवों के अंश इस शरीर में कार्य करते हैं!

इस मानव शरीर का अधिष्ठता स्वयं ब्रह्मपुत्र या अंश जीवात्मा है..

जिसके नियंत्रण तथा निर्देशन में पुरुष शरीर में स्थित सभी देवपुत्र अपना अपना कार्य सुचारू रूप में करते हैं ..

जिसमें शतायु से भी अधीक्षक नेत्र कान श्रवण की क्षमता वाणी आदि अंग प्रत्यंग अपने कार्य उत्तम गति से धातु अग्नि मल क्रिया दोष सम निर्मल तन प्रसन्न चित्र मन पूर्वक करते रह सके …

तथा जीवन को एक यक्ष के रूप में व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय स्तर तक संपादित कर सकें प्रत्येक व्यक्ति अपने ..

को ब्रह्म समझकर ही विधि निषेधमयी मर्यादाओं के अनुकूल परिवार समाज बा राष्ट्र के प्रति सहयोगी व सेवाभावी अनुसरण करें..

यह देवगन मस्तिष्क के शुभ शुभ कार्यों की वीडियो फिल्म भी बनाते रहते हैं जो मरने के उपरांत यमराज के समक्ष प्रदर्शित हो जाती है!

ऐसे जिए की जी जाए

लुटाए खुशी और खुद भी पाए

काम धुन में लगे रहने वालों के यहां समृद्धि सफलता और सुख पता पूछते पूछते पहुंच जाती है …

काम में लगे रहना लेयबद्ध संगीत है.

ऐसे ही सातों स्वरों का हृदय से उच्चारण होता है..

सा रे ग म पा धा नि शा यह सातों स्वर भी पवित्र रिदम का आत्मा में स्थापित नटराज शिव का नृत्य नित्य होता है ..

अपनी परेशानियों से संगीत की लहरियों को दूषित करते रहते हैं..

इसी कारण थकावट महसूस होने लगती है ..

55 तक पहुंच कर तन मन पूरी तरह से ग्रस्त होकर खिन्न हो जाता है..

हम चिढ़ाने के अलावा दूसरा सजन नहीं करते और सार्थक की डगर पार करते ही चलन से बाहर हो जाते हैं …

वास्तव में जीवन का यह अंतिम पड़ाव सबसे खराब समय होता है ..

बच्चों के प्रति नकारात्मक नजरिया असफलता कब है..

मंकी अनसुलझी पीड़ा में उलझा देते हैं ..

हम वंदे मातरम की जगह मातम में खपना शुरू कर देते हैं ..

सैकड़ों लोगों ने अवस्था मैं सफलता के झकझोरने वाले झंडे सराय उनकी कष्ट दाई कथा का पता ही नहीं है!

जीवन का मुख्यधारा से कट कर गुणवत्तापूर्ण प्रयास अनुभवों का संग्रह का उपयोग करें ..

जब तक काम की भूख बनी रहेगी तो खुशी से मुलाकात की संभावना बनी रहेगी अधिकांश समय सर्जनशीलता में लगा ले काम में लगे रहें व्यस्त रहना सबसे बड़ा काम है..

यही इसका दाम है काम की दम से ही दुनिया में सबका नाम है काम ही धर्म और धाम है काम करो सुबह शाम तो कष्टों का अंत और दुख का होता काम तमाम है..

कसमे वादे निभाएंगे हम

विवाह में रस्मो के शब्दों का महत्व

जैसे सृष्टि में इस जीव जगत का जन्म मरण निश्चित है..

वैसे ही शब्दों का जन्म भी निश्चित है यह कभी मरते नहीं हैं..

अपितु लुप्त हो जाते हैं भारत में विवाह के दौरान रस्मो का विशेष महत्व है..

रस्म शब्द रस+मन से निर्मित लगता है जिसमें मन का रस आए अच्छा लगे उसे रस्म कहते हैं..

शब्द भी जन्म लेते हैं अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता है!

शब्दों को पाल पोस कर विकसित करते हैं शब्द भी युवा होते हैं !

और अंत में बूढ़े हो कर भाषा विज्ञान से अलविदा हो जाते हैं शब्दों की यह प्रक्रिया सतत चलती रहती है!

विवाह के समय की रस्म शब्दों का एक वैज्ञानिक विश्लेषण है जिसमें जिसमें गूढ़ार्थ छुपा हुआ है विवाह की कुछ रस्में इस प्रकार है!

मंगनी सगाई – संबंध पक्का होने के बाद मंगनी व सगाई की प्रक्रिया शुरू होती है !

मंगनी शब्द का आशय मांगना इस शब्द रसम मैं वर के पिता द्वारा वधु को अपने बच्चे हेतु मांगे जाने का अभाव निहित है!

सगाई – सगाई शब्द वर वधु के सगे अर्थात एक दूसरे के अजीज होने का सूचक है !

यह विवाह के अटूट बंधन की प्रारंभिक रसम प्रक्रिया है !

दामाद से ज्यादा सगा कोई नहीं होता इसलिए होने वाले दामाद को सफल बनाने हेतु सगाई का आयोजन किया जाता है !

बनियों के लिए एक कहावत है बनिया यार सगे का नोता करें सगे का बारात ….

अर्थात वर वधु की रात काली करवाने वाले लोग लड़की वाले का बारातियों के लिए यह भाव की वर आप वर यात्रा बरात बारात बाराती

 

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