वेद की बातें बनाएंगी स्वस्थ्य!

जान ले- स्वस्थ्य रहने के लिए जरूरी

 वेद सनातन जीवन पद्धति क्या है?

तन-मन से स्वस्थ्य रहते हुए जो व्यक्ति
जीवन जी लेता है, वह सफल हो जाता है, क्योंकि इसी चौबीस घण्टे में क्रम पूर्वक जीवन मृत्यु का घूर्णन (रोटेशन) 
होता रहता है।
वेद ज्ञान का भण्डार है….
@ ज्ञान-काण्ड ऋग्वेद का विषय है,
@ कर्मकाण्ड यजुर्वेद का विषय है,
@ उपासना-काण्ड साम वेद का तथा
@ विज्ञान काण्ड अथर्व वेद का विषय है।

दक्षस्मृति२/५७ में कहा गया है कि-

अस्मिन्नेव प्रयुञ्जानो ह्यस्मिन्नेव तु लीयते।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्तव्यं सुखमिच्छता
अर्थात-
मनुष्य की सभी कोशिश आठ प्रहर
अर्थात २४ घण्टे कोशिकाओं को
ऊर्जावान बनाकर साधने में लगाना
चाहिए। यह आयुर्वेद, ज्योतिष, योग,
धर्म और सनातन शास्त्र कहता है।
ये सभी वेद प्रदत्त वाक्य हैं।
समझे और अमल करें पुराणों की 
प्राचीन परम्पराओं को….
【१】!!ब्राह्मेमुहूर्ते उत्तिष्ठेत्!!
अर्थात-सुबह ब्राह्म मुहूर्त्त में जागकर
सर्वप्रथम जल ग्रहण करें।
विशेष-ब्रह्म महूर्त एक ऐसी अलौकिक
शक्ति है, जो प्रातःकाल में सम्पूर्ण ब्रह्मांड के कण, क्षण-क्षण में व्याप्त होती है।
पुराने गीत का अंतरा है-
उठ जाग मुसाफिर भोर भई,
अब रेन कहां से आवत है।
जो सोवत है, वो खोवत है, 
जो जागत है-वो पावत है।।
कभी अनपढ़ माँए इस भाव से सुबह
सूर्योदय के पहले बच्चों को जगाती थी-
जागो मोहन प्यारे, जागो
बहुत सी भावुक भावनाएं देश का बल हैं।
【२】!!कुर्यान्मूत्रपुरीषन्च!!
अर्थात-मूत्र मल विसर्जन करें।
आप कभी देखें कि सुबह सूर्योंदय के पूर्व
मलविसर्जन से पेट में कभी कब्ज नहीं रहता।
【३】!!शौचं कुर्यात्!!
देह की शुद्धि करें।
श्रीमद देवीभागवत शरीर विभाग के
हिसाब से-तन के किस हिस्से को
किस हाथ से छूना उचित है।
■ नाभि के नीचे के लिए वायें हाथ
(लेफ्ट हैंड) का प्रयोग और ऊपर के अंगों
को दाहिने हाथ से छूने का प्रावधान है।
श्लोक है-
नाभेरधो वामहस्तो नाभेरुर्ध्वं तु दक्षिण:
(श्रीमददेवीभागवत ११/२/२९)
इसी वैज्ञानिक विधान के आधार पर
भारतवर्ष में सीधे हाथ (राइट हैंड) से
भोजन  करने की आदत है और वाम
हाथ से शौच।
【४】!!प्रातःस्नानं समाचरेत्!!
अर्थात-सूर्योदय से पहले स्नान करें।
सभी मनोविकार, मानसिक सन्ताप, चिन्ता,
तनाव प्रातःकाल के स्नान से होते नहीं हैं।
!!त्रिकालमुपास्पृशेत्!! त्रिकालस्नान
ऋषिगण प्रातः, मध्याह्न,
सायाह्न यानि सुबह, दुपहर एवं शाम
त्रिकाल स्नान करते थे।
आयुर्वेद के अविष्कारक महर्षिचरक ने
द्विकाल स्नान को आवश्यक बताया है।
गर्मी में प्रायः सभी द्विकाल स्नान करते हैं।
एक काल स्नान, तो अति अनिवार्य होता
है। हाथ पैर धोना, कुल्ला मुख शुद्धि करना,
स्नान करना शौच यानि शुद्ध होने की
परम्परा है।
यस्य शौचे$पि शैथिल्यम् 
वृत्तं तस्य परीक्षितम्।
अर्थात-
इसे करने में जो आलस्य करता है,
वह शुद्धि न होने से सभी प्रकार के
धर्मकार्य में अयोग्य होता है।
जो मनुष्य स्नान नहीं करते उन्हें ही
म्लेच्छ कहा गया है।
【५】!!ततश्च वाससी शुद्धे!!
यानि प्रतिदिन शुद्ध, धुला हुआ वस्त्र
धारण करें।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार
धुला और शुद्ध वस्त्र पहनने से
पवित्रता बनी रहती है। जो प्रतिदिन
धुले वह धौतवस्त्र है। गीला वस्त्र न पहनें।
कटा फटा वस्त्र विपत्ति में ही पहना जाता है।
तीन प्रकार का वस्त्र प्रत्येक व्यक्ति को रखना चाहिए– सोने, यात्रा और पूजा के लिए महाभारत, अनु- शासन पर्व १०४/८६।
न धार्यं मलीनमम्बरम्
(भावप्रकाश,आयुर्वेद)
अर्थात-
मलिन वस्त्र या  गन्दे कपड़े पहनने से
त्वचारोग खुजली दाद का भय होता है-
साफ-सुथरे,निर्मल और श्वेतवस्त्र आयु,
यश, समृद्धिकी वृद्धि होती है।
एक नियम यह भी अपनाएं कि-
गंजी, गमछा, रुमाल, पदत्राण दूसरे
को नहीं देना चाहिए। यदि दूसरा पहन
ले तो उसे पुनः न पहनें।
वस्त्र व्यक्तित्व निर्माण से लेकर
धर्म संवर्धन तक करते हैं।
कोरोना के बारे में जाने-
【६】!!व्यायामादिकं ततः कार्यं!!
योग, प्राणायाम एवं व्यायाम करें ।
आयुर्वेदिक शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर
को जितना कसोगे, यह उतना ही आराम देगा और शरीर को जितना आराम दोगे, शरीर उतना ही रोग-विकार उत्पन्न करेगा।
योगसाधना-
यह हिन्दू जीवन पद्धति की अनिवार्य
प्रक्रिया है। अतः प्रातः काल खाली पेट योगसाधना करनी चाहिए।
योग के आठ अंग हैं-
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, 
प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि।
इनका अध्ययन योगग्रन्थों से करना चाहिए।घेरण्ड संहिता में प्रसिद्ध
३२ आसन, २५ मुद्राओं का वर्णन है।
श्रीमद्भागवत गीता के छठे अध्याय में
भगवान श्री कृष्ण ने योगविधि का
विवेचन किया है। इसी के आठवें
अध्याय में योग-साधना द्वारा शरीर
त्याग की विधि का उल्लेख किया है।
【७】!!संध्यावन्दनमाचरेत्!!
तीनों संधिकाल में सूर्य या शिव का
ध्यान, पूजन, हवन करें। समयाभाव
में !!ॐ शम्भूतेजसे नमः!!
का 12 बार अजपा जाप करें।
【८】!!भूतबलिं कुर्यात्!!
अर्थात-अतिथि, गाय, श्वान आदि जीव को खिलाकर ही भोजन करना स्वास्थयप्रद है।
【९】!!भोजनं मौनमास्थितः!!
मतलब-पूर्व या उत्तरमुखी होकर मौन
रहकर ही भोजन करें।
किस वक्त मौन रहना जरूरी है-
उच्चारे मैथुने चैव प्रस्रावे दन्तधावने।
स्नाने भोजनकाले च 
षट्सु मौनं समाचरेत्।।(हारीत:)
छः शारीरिक कार्य करते समय
मौन रहना चाहिए-
1- मलत्याग के समय,
2- मैथुनकाल में,
3- मूत्रत्याग के वक्त,
4- दन्त धावनकाल में,
– स्नानकाल यानि नहाते समय और
6- भोजन करते वक्त मौन रहना चाहिए।
इसके बहुत फायदे हैं। जैसे-
आयु बढ़ती है अन्यथा आयु घटती है।
स्नान में समंत्रक स्नान करने का विधान
है अन्यथा मौन विधान है।
माघ अमावस्या को मौन रहकर ही
स्नान किया जाता है। इसीलिए
उसे मौनी अमावस्या कहते हैं।
【१०】!व्यवहारं ततः कुर्यात्
बहिर्गत्वा यथा सुखं!
【११】जीविका हेतु दो से 3  याम
यानि ६ से ९ घण्टे से अधिक काम न करें–
【१२】!!धर्मम् चिंतयेत्!!
अर्थात-सन्ध्या/रात में वेद, पुराण,
धर्मशास्त्रों  का अध्ययन-मनन अवश्य करें।
【१३】!!स्वकार्यं चिंतयेत् ततः!!
अर्थात-दूसरे दिवस दिन की कार्य योजना बनाएं
【१४】!!कृतपादादिशौच:भोजनं!!
अर्थात-रात्रि में हाथ पैर-धोकर भोजन करें।
【१५】!जपेत्सूक्तं! अर्थात-
सकारात्मक सोच और उन्नति हेतु
रात्रि सूक्त का पाठ या इष्टमन्त्र पाठ
पढ़कर विश्राम करें।
【१६】ऋतुकालाभिगामिस्यात्
गृहस्थ्य धर्म पालन करें-
【१७】द्वेष-दुर्भावना, नकारात्मक सोच रखने से प्रकृति, परमात्मा और भाग्य तीनों ही साथ छोड़ देते हैं।
【१८】हाथ मिलाने की जगह अभिवादन करें।
【१९】स्वस्थ्य तन, स्वच्छ वतन ही हमारी
संकल्प शक्ति होना चाहिए।
ब्रह्मपुराण में जीवन कैसे जियें, यह
जानकारी विस्तार के साथ वर्णित है।
इस प्रकार से चौबीस घण्टे की दिनचर्या
का समय संविभाग जीवन को शतायु
रखने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनं
शिंवलिंग पर अमृतम चन्दन का त्रिपुण्ड
लगाकर पुष्पमाला अर्पित करने से
आयु बढ़ती है। पुष्प पृथ्वी का श्रेष्ठतम उत्पाद होताहै-तत्र गंधवती पृथ्वी।यह आयु, यश, श्री वृद्धि करता है।
जीव का जीवन जंग लगते ही रंग बदलता है- क्या है-जिन्दगी….
शास्त्र कहतें हैं जिंदा जीव को शिव और निर्जीव को शव कहते हैं। अर्थात जीवन है, तभी तक जीव है।
जीवित प्राणियों के लिए जीव शब्द का उपयोग प्रयोग किया जाता है। जीव विज्ञान में सभी जीवन-सन्निहित प्राणियों के लिए किया जाता हैं. जैन ग्रंथों, हिंदू धर्म, उपनिषद, बौद्ध धर्म और सूफी धर्म शास्त्रों में भी जीव शब्द का इस्तेमाल अनेकों बार हुआ है।
भोले पार लगा दे-अबकी बार लगा दे….
कोरी दिखावे या पाखण्ड की पूजा-पाठ तिलक से या अधिक पूजा पाठ करने वाले अधिक दुखी क्यों रहते हैं और क्यों अच्छे और भले लोगों को जीवन में अधिक दुख मिलता है। इन सबका जबाब में आदिशंकराचार्य ने आत्मा की शुद्धि, आत्मचिंतन, आत्मसाधना ही एक उपाय बताया है। पूर्वजन्म के पाप-शाप की शान्ति के लिए केवल महादेव का ही चिन्तन-ध्यान करना श्रेष्ठकर उपाय है।
तुलसी दास ने भी लिखा कि-
हानि-लाभ, जीवन-मरण, 
सुख-दुःख विधि हाथ।
शिव सहस्त्रणामवली में भगवान का एक नाम विधि और शिवकल्यानेश्वर बताया है।
बाबा विश्वनाथ-महाकाल की कृपा
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