अमृतम चन्दन में मिश्रित बहुमुल्य 5  सुगंध एवं छह जड़ीबूटियां…

कुण्डलिनी जागरण पुस्तकानुसार…
मनुष्य का मन चलता है शरीर के चक्रों से।
इन चक्रों पर रंग, सुगंध और शब्द अर्थात
मन्त्रों का गहरा प्रभाव होता है।
यदि मन की अलग-अलग अवस्थाओं
के हिसाब से सभी मनोविकार नाशक

11 सुगंध मिलाकर चन्दन का प्रयोग

किया जाए, तो तमाम मानसिक समस्याओं और दुःख-दर्द, दरिद्रता को दूर किया जा सकता है।

आदि शंकराचार्यजी ने लिंगाष्टकम स्त्रोत
में लिखा है-
कुमकुम चन्दन लेपित लिंगम।
अष्ट-दरिद्र विनाशन लिंगम।।

मानव मस्तिष्क शिंवलिंग स्वरूप
होता है। कभी गौर करें, महसूस
होगा कि अपने दोनो हाथ सीधे करके
आगे करने से वह शिंवलिंग के अरघा या
जलहरी जैसा हो जाता है।
वेदव्यासजी का वेदवाक्य है कि-
!!यत् पिंडे-तत् ब्रह्माण्डे!!
अर्थात-
जैसा यह ब्रह्मांड या सन्सार है, वैसा ही
हमारा पिण्ड यानी शरीर है

अच्छे भविष्य हेतु विद्यार्थियों, अविवाहितों को अमृतम चंदन का  अवश्य लगाना चाहिए…

उपनिषद रहस्य नामक पुस्तक में उल्लेख है कि-जहां हम चन्दन लगाते हैं हैं वहां से आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है।
तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से दबाव या प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचने लगता है। चेहरे की सुंदरता बढ़ाने में यह अत्यंत कारगर क्रिया है।
मनुस्मृति में लिखा है कि चन्दन
मस्तक की धमनियों में प्रकम्पन्न यानि वाइब्रेशन (Vibration) करता है।
जिससे मन के विकृत विकार नष्ट होने लगते हैं।
वेद में मनुष्य के मन मस्तिष्क को सर्वश्रेष्ठ बताया है। यह जितना तनाव रहित होगा हम उतनी तेजी से उन्नति करने लगते हैं।

स्वामी कथासार किताब में लिखा है-
विचारों से ही हमारे भाग्य-सौभाग्य तथा दुर्भाग  का निर्धारण होता है। कहा जाता है जैसी सोच, वैसी लोच

छोटी सोच और पैर में मोच सफलता में बाधक है।

अमृतम चन्दन का तिलक-टीका, बिन्दी
मन के विचारों से उत्पन्न विकार तथा
संक्रामक रोगाणुओं का विनाशक है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्म-२६ के अनुसार ह्रदय की १०१ नाड़ियों में से एक सुषुम्ना नाड़ी मस्तक प्रदेश के सामने से निकलती है। यह तन-मन, अन्तर्मन और आत्मा की शुद्धि में सहायक नाड़ी है, जो उन्नति, ऐश्वर्य, सफलता, सुख एव मुक्ति प्रदाता है।
शिव सहिंता के अनुसार त्रिपुण्ड की तीन
रेखाओं में 27 नक्षत्रों का वास है।

मस्तक पर रोज तीन रेखाओं वाला त्रिपुण्ड
लगाने से तन के त्रिदोष मिट जाते है।
सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण
सन्तुलित होता है। त्रिपुण्ड त्रिलोक्य
और त्रिगुण का प्रतीक है।

चंदनस्य महतपुण्यं पवित्रं पाप नाशनम।
आपदं हरति नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा।

चन्दन लगाने से पुण्य पवित्र होकर पापों का नाश होता है।
भगवान कार्तिकेय ने स्कंदपुराण में बताया है कि- माथे पर चन्दन लगा होने से मस्तिष्क की 5 मूल ज्ञान नर्व जागृत रहती हैं। इसके बारे में आगे जानेंगे।
शिव के तीसरे नेत्र को प्रमस्तिष्क यानि
सेरिब्रम की पीयूष-ग्रंथि (पीनिअल ग्लैंड) माना है। पीयूष-ग्रंथि उन सभी ग्रंथियों पर नियंत्रण रखती है जिनसे उसका संबंध होता है।

दिमाग की मुख्य 5 ज्ञान नाड़ियाँ…

1】मस्तिष्क का सबसे बड़ा हिस्सा सेरिब्रम (Cerebrum) क्या है-
यह दिमाग का साेचने वाला हिस्सा है,
साथ ही स्वैच्छिक मांसपेशियों (Voluntary Muscles) को नियंत्रित करता है।
2सेरिबैलम (Cerebellum)
यह मस्तिष्क के पिछली तरफ सेरेब्रम के नीचे स्थित एक महत्वपूर्ण भाग है और  यह सेरेब्रम से बहुत छोटा है। सेरिबैलम शरीर के संतुलन का आधार है।
मस्तिष्क का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है जाे मस्तिष्क के पीछे आैर सेरेब्रम के नीचे स्थापित हाेता है। लेकिन यह मस्तिष्क का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सेरिबैलम के कारण ही आप सीधे खड़े हो
सकते हैं। यह संतुलन, गति और समन्वय को नियंत्रित करता है।

3ब्रेन स्टेम (Brain Stem)
यह दिमाग के सचिव अर्थात सेक्रेटरी बतौर सभी आवश्यक कार्य करता है। सेरेब्रम के नीचे और सेरिबैलम के सामने स्थापित है। यह अत्यंत सूक्ष्म और ताकतवर ब्रेन स्टेम मस्तिष्क के बाकी हिस्सों को रीढ़ की हड्डी से जोड़ता है, जो आपकी गर्दन और पीठ को चलाते है। ब्रेन स्टेम  शरीर को जीवित रखना, भोजन को पचाना, रक्त को प्रसारित करना जैसे सभी कार्यों के लिए ब्रेन स्टेम का ही महत्वपूर्ण योगदान है।

4】 पिट्यूटरी ग्रंथि मस्तिष्क का एक छोटा पर बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका काम आपके शरीर में नये-नये हार्मोन का उत्पादन और रिलीज करना है। मटर के दाने जैसी यह ग्रन्थि अनेक हार्मोन्स प्रमेह-मधुमेह और देह में जल की मात्रा नियंत्रित करती है।

5हाइपोथैलेमस आपके मस्तिष्क के भीतरी थर्मोस्टेट की तरह है (दीवार पर लगा वाे बॉक्स जो आपके घर में गर्मी को नियंत्रित करता है। चन्दन लगाने से उपरोक्त पांचों ज्ञान ग्रंथियां चलायमान रहती हैं।
मस्तिष्क में ही सेराटोनिन व बीटाएंडोरफिन नामक रसायनों का संतुलन तिलक-त्रिपुण्ड लगाने होता है।

चंदन का तिलक ललाट पर लम्बा या छोटी सी बिंदी के रूप में दोनों भौहों के मध्य लगाया जाता है।
चंदन लगाने से क्रोध होता है कंट्रोल और उत्तेजना काबू में आती है। उच्च रक्तचाप यानि बीपी हाई नहीं होता।

पूजा-पाठ, हवन, ध्यान-साधना का शुभ परिणाम क्यों नहीं मिलता.……

पुराणोक्त परम्परा है-

स्नाने दाने जपे होमो देवता पितृकर्म च!
तत्सर्वं निष्फलं यान्ति ललाटे तिलकं विना!!

बिना तिलक यदि तीर्थ दर्शन, कुम्भस्नान, जाप, पूजाकर्म, दानकर्म, यज्ञ, होम आदि तथा पितरों के निमित्त श्राद्ध जैसे माथे पर तिलक न हो, तो  निष्फल होता है।

भारत भगवान का घर है….
भारत की विशेषता है कि हर 12 कोस पर पानी और वाणी बदल जाता है।  प्राचीन परम्पराओं से परिपूर्ण हमारे देश को दुनिया के लोग देखकर ताज्जुब करते हैं। कुछ हँसते हुए, खिल्ली उड़ाकर कहते हैं-“ये क्या ढकोसला है!”

क्यों लगाते थे-बुजुर्ग, मस्तिष्क पर चन्दन का त्रिपुण्ड या  कुमकुम/तिलक!
यह स्वस्थ्य रहने के लिए अति आवश्यक है…
आज से लगभग 20 से 25 वर्ष पूर्व सभी स्त्री-पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते थे। आज कुछ ही बुजुर्ग लोग इस धार्मिक पध्दति का वैदिक महत्व समझते हुए अभी भी अपनाकर चल रहे हैं।

अधेड़ होने वाले कुछ शिवभक्तों को अभी भी याद होगा कि सावन के महीने में किसी भी हिन्दू का माथा बिना त्रिपुण्ड के नहीं दिखता था। चन्दन, टीका, त्रिपुण्ड लगाने का बहुत बड़ा कारण हमारे पूर्वज ऋषियों ने
इसकी वैज्ञानिकता को खोजा था।

आज्ञाकारी हमारा, ललाट यानि आज्ञाचक्र

मस्तिष्क पर जिस जगह चन्दन लगाया जाता है, वह स्थान आज्ञा चक्र भी कहा जाता है। यहीं से हम अपने आदेश देकर शरीर को स्वस्थ्य रखने के साथ-साथ मनचाहा कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। माथे पर अमृतम चन्दन लगाने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता रहता है।

हमारे अंदर की ऊर्जा-शक्ति एक तरह से कपाट-किबाड़ के अंदर बन्द हो जाती है।
चन्दन लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। जो लोग आज भी माथे को खाली नहीं रखते, उन्हें पूरी तरह स्वस्थ्य देखा जा सकता है।
आज्ञाचक्र पर 32 कोशिकायें सक्रिय रहती हैं। यही 32 कोशिकाएं हमारे अनामिका और
अँगूठे पर हैं जिससे तिलक लगाया जाता है।

केसरयुक्त चन्दन देह की गर्माहट उदासीनता, आलस्य, उच्चाटन मिटाता है।

कपूर युक्त चन्दन मस्तक के रोम कूपों के रोगाणुओं से बचाता है।

चन्दन पाउडर शीतलता दायक है।

दर्शनशास्त्री मानते हैं कि चन्दन का टीका सोचने-समझने की शक्ति बढ़ाता है।
अतः स्नान के बाद तुरन्त
माथे पर चन्दन लगाना चाहिए।

आधुनिक चिकित्सकों ने भी माना है कि मस्तिष्क पर प्रतिदिन तिलक या त्रिपुण्ड लगाएं, तो बोली साफ निकलती है। वाणी शुद्ध होती है और कानों के पीछे वाली नाड़ियों में रक्त का संचार सुचारू होता है, जिससे सुनने की क्षमता में वृद्धि होती है और बुढ़ापे तक बहरापन नहीं आता।

नारद पुराण में उल्लेख आया है-

शरीर की प्रमुख तीन नाड़िया-इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना आज्ञा चक्र पर आकर मिलती है। यह चक्र हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है। इसलिये इसे त्रिवेणी या संगम भी कहा जाता है। यह गुरु स्थान कहलाता है। यहीं से पूरे शरीर का संचालन होता है। यही हमारी चेतना का मुख्य स्थान भी है। इसी को मन का घर भी माना जाता रहा है। इसी कारण यह स्थान शरीर में सबसे अधिक पूज्यनीय है। योग करने में भी ध्यान के समय इसी स्थान पर मन को स्थिर किया जाता है।

मस्तिष्क के बीचोबीच यानि आज्ञाचक्र पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं। इससे दिमाग स्थि्र रहता है और इंसान को क्रोध नहीं आतासोचने की क्षमता बढ़ती है

कपूर केशर, चन्दन आदि से निर्मित अमृतम चन्दन का टीका नित्य लगाने से भय भ्रम चिन्ता तनाव बेचैनी, घबराहट मिट जाती है।

भोग लगे या रूखे-सूखे।

शिव तो हैं श्रद्धा के भूखे।।

भगवान को चंदन अर्पण करने का भाव यह है कि हमारा जीवन आपकी कृपा से सुगंध से भर जाए। मेघाशक्ति बढ़ती है तथा मानसिक थकावट या विकार नहीं होता।

भारतीय ऋषिगण जानते थे कि पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है, जिससे
आज्ञाचक्र उत्तेजित होता है।
धार्मिक शुभकार्यो में तिलक से स्थूल-सूक्ष्म ज्ञान इन्द्रिय जागृत हो सकें
मानव के ज्ञान-तंतुओं का विचारक केंद्र भृकुटी और ललाट का मध्य भाग है। यहां भगवान विष्णु का निवास होता है।

तिलक या त्रिपुण्ड लगाने से अनावश्यक विचारों का आवागमन रुक जाता है।
आयुर्वेदिक शास्त्रमत शुक्र नामक धातु समस्त शरीर में परिव्याप्त है। युवा पीढ़ी के लोग यदि चन्दन लगाएं, तो ये धातु कभी क्षीण नहीं होती।
आज के समय शीघ्र धातु पतन के चलते अनेक आपसी विवाद और विवाह-विच्छेद यानि तलाक हो रहे हैं।

तिलक लगाने का शास्त्रोक्त मन्त्र.
कान्ति लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम्। ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम्।।
संस्कार चंद्रिका नामक किताब के मुताबिक-
माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व
योगी, संन्यासी, ऋषि एवं शिव साधकों का
भृकुटि के मध्य भाग देदीप्यमान रहता है।
शरीर के कुल 12 स्थानों पर तिलक लगाने का विधान है
आधुनिक शरीर शोधकर्ताओं ने खोजा  कि मस्तक पर तिलक लगाने से शांति और ऊर्जा मिलती है।

जो दिखता, वही बिकता है...

मस्तक चेहरे का केंद्र है, जहां सबकी नजर पड़ती है। उसके मध्य में तिलक लगाकर, , देखने वाले सम्मोहित या आकर्षित  किया जाता है। विशेषकर स्त्रियां माथे पर छोटी सी बिंदिया लगाती हैं और आदमी मोहजाल में उलझ जाता है।

अमृतम चन्दन देह के पवित्र परमाणुओं को पुनर्जीवित कर यह मस्तिष्क को पुनीत-पावन बनाये रखता है।

चन्दन अमृतमऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है। यह सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है।
तिलक आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।

तिलक का प्राचीन महत्व…..

तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथा मनुष्य का केन्द्रबिन्दु है और ये सदगुरू का प्रतीक समझा जाता है। गुरु का स्मरण हमारी अंतरात्मा में सदैव बना रहे, इस तरह की धारणा भी है।

अतः तिलक या त्रिपुण्ड लगाने से शरीर व्यापी चेतना शनैः शनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होकर सम्पूर्ण देह में फैली रहती है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कालपुरूष की गणना प्रथम राशि मेष से की गई है। महर्षि पराशर के सिद्धांत के अनुसार कालपुरूष के मस्तक वाले स्थान में मेष राशि स्थित है।

जिसका स्वामी मंगल ग्रह सिंदूरी लाल रंग का अधिष्ठाता है। सिंदूरी लाल रंग राशि पथ की मेष राशि का ही रंग है। इसीलिए लाल रोली या सिंदूर अथवा अमृतम चन्दन का तिलक या त्रिपुण्ड मेष राशि वाले व्यक्ति को निश्चित मस्तिष्क पर लगाना चाहिए।

उंगलियों में ऊर्जा होती है….

तिलक लगाने में सहायक हाथ की अंगुलियों का भी अलग-अलग महत्व बताया है।

अनामिका अंगुली से तिलक लगाने से शांति का अनुभव होता है। ज्योतिषीय सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार भी अनामिका तथा अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका सूर्य पर्वत की अधिष्ठाता अंगुली है।

यह अंगुली सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका तात्पर्य यही है कि सूर्य के समान, दृढ़ता, तेजस्व, प्रभाव, सम्मान, सूर्य जैसी निष्ठा-प्रतिष्ठा बनी रहे।

मघ्यमा अंगुली आयु वृद्धिदायक है।

अंगूठा हाथ में शुक्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है, जो वैवाहिक जीवन सुखी बनाता है। शुक्र ग्रह जीवन शक्ति का प्रतीक है।
संजीवनी विद्या का प्रणेता तथा जीवन में सौम्यता, सुख-साधन तथा काम-शक्ति देने वाला शुक्र ही भौतिक संसार का रचयिता है।

अंगूठे से तिलक लगाने या लगवाने से व्यक्ति की ख्याति तथा प्रभाव, इज्जत में बढोत्तरी होने लगती है। इसीलिए राजतिलक अथवा विजय तिलक अंगूठे से ही करने की परंपरा रही है।

तर्जनी उंगली से यदि सदगुरू लगा देवें, तो निश्चित ही मनुष्य मुक्ति या मोक्ष पाने का अधिकारी हो जाता है।

यदि हम आँखे बंद करके बैठ जाएँ और कोई व्यक्ति हमारे भ्रू-मध्य के एकदम निकट ललाट की ओर तर्जनी उँगली ले जाए । तो वहाँ हमें कुछ विचित्र अनुभव होगा । यही तृतीय नेत्र की प्रतीति है। इस संवेदना को हम अपनी ऊँगली भृकुटि-मध्य लाकर भी अनुभव कर सकता है।

इसलिए इस केन्द्र पर जब तिलक अथवा टीका लगाया जाता है, तो उससे आज्ञाचक्र को नियमित रुप से उत्तेजना मिलती रहती है। इससे सजग रुप में हम भले ही उससे जागरण के प्रति अनभिज्ञ रहें, पर अनावरण का वह क्रम अनवरत चलता रहता है। तिलक का तत्वदर्शन अपने आप में अनेंको प्रेरणाएँ सँजोएं हुए है।

तिलक या त्रिपुंड प्रायः चंदन का होता है। चंदन की प्रकृति शीतल होती है। शीतल चंदन जब मस्तक पर लगाया जाता है, तो उसके पीछे भाव यह होता है कि चिंतन का जो केंद्रिय संस्थान मस्तिष्क के रुप में खोपड़ी के अंदर विराजमान है, वह हमेशा शीतल बना रहे, उसके विचार और भाव इतने श्रेष्ठ हों जि अपनी तरह औंरो को भी शीतलता, शांति और प्रसन्नता प्रदान करता रहे।

फौजी के रण में जाते समय, प्रवास के प्रारंभ में प्रार्थना सहित माँ-बहिन पत्नी या कन्या तिलक लगाकर विदा करती थी।
किसी पुण्यात्मा के आगमन पर भी यही परम्परा आज भी है।

आदिकालीन तिलक का महत्व ऋषि-मुनियों के जीवन में अत्याधिक रहा है। सनातन हिन्दू धर्म में भी जब कोई महत्वपूर्ण, सम्मानसूचक, प्रसन्नदायक घटना घटती है, तो माथे पर तिलक लगा दिया जाता है। विवाह हो, कोई युद्ध पर जा रहा हो, विजयी होकर लौट रहा हो, तो तिलक लगाना एक आवश्यक कर्म है।

विवाहित स्त्रियाँ माँग में सिंदूर और माथे पर बिंदी लगाती है। यह सौभाग्य सूचक तिलक का प्रतीक है।

अमृतम चन्दन में मिले हैं-11 गुणकारी तत्व यानि 5 बहुमूल्य सुगंधित इत्र और 6 जड़ीबूटियों का पाउडर, अर्क, काढ़ा…..

अमृतम चन्दन लेप का फार्मूला....

(१) चन्दन मलया गिरी और चन्दन इत्र

(२)  ब्राह्मी

(३) केसर
(४) रक्त चंदन पाउडर
(५) अगर
(६) हरिद्रा ब्राह्मी
(७) शंखपुष्पी
(८) गुलाब इत्र
(९) जटामांसी
(१०) बहु सुगन्धि
(११) कपूर

अमृतम चन्दन में मिश्रित योगों के कार्य…

चन्दन मलया गिरी और ◆चन्दन इत्र
अमृतम चन्दन में मिश्रित
मलयागिरि भक्ति भाव पैदा करता है। आयुर्वेदिक ग्रन्थ भावप्रकाश कर्पूरादि वर्ग के अनुसार
चन्दति आल्हादयतीति, ‘चदि आल्हादे’
अर्थात- चन्दन मन एवं शरीर को आल्हाद प्रदान करता है
आल्हाद के अन्य अर्थ– मुकद्दर, सौभाग्यशाली, हर्ष,खुशी, अच्छी किस्मत, आनन्द मनाना, गर्व करना एवं  प्रसन्नता आदि है।
अमृतम चन्दन में मिलाया गया मलयागिरि चन्दन पाउडर मन-मस्तिष्क के संताप, दुःख, बेचैनी, घबराहट, रात को नींद न आना, डर, भय-भ्रम, चिन्ता को ऐसे हर लेता है। जैसे अग्नि कचरे को जला देती है।

जाने चन्दन के 11 गुणधर्म और लाभकारी परिणाम जानकर परम् आनंद का अनुभव करें….

कौटलीय अर्थशास्त्र:अधिकरण-२
प्रकरण-२७, अध्याय-११ में
मलयागिरि चन्दन के एकादश गुण
बताए गए हैं

【1】लघु स्निग्ध अश्यान अर्थात चन्दन काफी समय तक सूखता नहीं है।

【2】सर्पिस्नेह लेपी यानि शरीर को घी की तरह चमकने वाला

【3】गन्धसुख (सुगन्धयुक्त)

【4】त्वगनुसारी से आशय है-

त्वचा के भीतर शीतलता प्रदायक

【5】अनुल्बण अर्थात बिना फटा

फटी त्वचा को चमकाने वाला

【6】अविरागी यानि स्थायी गन्ध एवं

वर्ण का गौर करने वाला

【7】उष्णसह: मतलब- देह की अग्नि शांत कर ठंडक देने वाला

【8】दाहग्राही अर्थात- तनबकी गर्माहट शांत करने में सहायक

【9】सुखस्पर्श अर्थात- तन मन को सुखद अनुभव देकर मन हल्का करता है।

【10】मानसिक संताप नाशक

【11】ईश्वर प्रेरक भगवान से जोड़कर मन्त्र जाप में सहायक।
अमृतम चन्दन के ये 11 गुण भगवान शिव के 11 वैदिक गणों को प्रसन्नता प्रदान करते हैं।
11 गणों के नाम इस प्रकार हैं
{१} ॐ वामदेवाय
{२} ॐ जेष्ठाय
{३} ॐ श्रेष्ठाय
{४} ॐ रुद्राय
{५} ॐ कालाय
{६} ॐ कलविक्रणाय
{७} ॐ बलविक्रणाय
{८} ॐ बालाय
{९} ॐ बलप्रमथनाय
{१०} ॐ सर्वभूतदमनाय
{११} ॐ मनोन्मानाय

महादेव के ग्यारह रुद्रावतार हैं। 
शिवरहस्योउपनिषद के अनुसार
इन 11 रुद्रों को अलग-अलग सुगन्ध प्रिय
होने से भोलेनाथ की प्रसन्नता हेतु
अमृतम चन्दन में मिलाई गई हैं।

चन्दन राहु ग्रह को भी अतिप्रिय है।
दक्षिण भारत में कालसर्प दोष
की शांति के लिए राहुकाल में शिंवलिंग
पर अमृतम चन्दन का लेप किया जाता है।
राहु को बारे में ज्यादा जानने के लिए
अमृतम पत्रिका के पुराना ब्लॉग पढ़ें..
नीच लिंक क्लिक करें… ये सभी
पढ़ने योग्य हैं

https://amrutampatrika.com/omnamahshivaya-2/

◆ केसर कुमकुम के 8 फायदे….

1- मात्र माथे पर प्रतिदिन केसर टीका-तिलक या त्रिपुण्ड लगायें, तो पूरे तन में निखार आने लगता है। शिथिल नाड़ियों में ऊर्जा का संचार करने से यह यह स्वास्थ्यवर्धक भी है।
2- ग्रह-नक्षत्र शांति हेतु भी चमत्कारी है।

3- माथे पर केसर का तिलक लगाने
के होते हैं इतने फायदे….
वैसे तो गुरु ग्रह की शांति, कृपा के लिए
केसर का टीका माथे पर लगाना लाभकारी
होता है। साथ ही धन वृद्धि के लिए

4- माँ महालक्ष्मीजी का ध्यान कर केसर युक्त चन्दन का तिलक लगाने से सफलता शीघ्र मिलने लगती है। शुभ समाचार मिलते है।

5- मुख्यद्वार पर शुद्ध केसर युक्त अमृतम चन्दन  से स्वास्तिक बनाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश नहीं होता और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

6- धर्मिक अनुष्ठानो में केसर का सर्वाधिक उपयोग करने की परम्परा वैदिककाल से चली आ रही है।
7- गल्ले में केशर रखने से व्यापार में
बरक्कत होने लगती है।
8- अमृतम केशर ज्ञान तथा वैराग्य का प्रतीक है।

◆ अमृतम जटामांसी के फायदे…..
आयुर्वेद के एक प्राचीन शास्त्र भावप्रकाश में जटामांसी की बहुत ही ज्यादा प्रशंसा की गई है। यह मानसिक शान्ति प्रदाता बूटी है।
तनाव, अशान्ति, घबराहट, बेचैनी आदि विकारों को मिटाने में जटामांसी के बराबर
अन्य कोई द्रव्य दुनिया में दूसरा नहीं है। इसे त्रिकालद्रष्टा ऋषि चन्दन, केसर कपूर में मिलाकर उपयोग करते थे। यह सम्मोहन प्राप्ति में सहायक है।

◆ रक्तचंदन पाउडर 
रक्तचन्दन माख्यातं….तिक्त नेत्रहितं!
अर्थात माथे पर चन्दन से नेत्रों की रक्षा होती है। इसका त्रिपुण्ड-तिलक लगाने से कभी सिरदर्द और नेत्ररोग नहीं होते।

(५) अगर-ईगल वुड (Eagle wood)
योगज, प्रवर, क्रिमिज संस्कृत नाम हैं।
अगर बूटी 6 प्रकार से लाभकारी है….

★ वशीकरण, तन्त्र में उपयोगी।
★ अगर युक्त अमृतम चन्दन का टीका,
तिलक या त्रिपुण्ड लगाने से कभी
उच्चाटन नहीं होता।
★ अगर जड़ीबूटी मस्तिष्क की रूधिर
नाड़ियों में उत्तेजना उत्पन्न करती है।
★ सिर की सभी बीमारियों में अत्यन्त
लाभकारी है।
★ विचारों को स्थिर रख, मन को भटकने से
बचाता है।
★ नकारात्मक सोच खत्म कर देता है।

कुंकुमागुरुकस्तूरी चंद्रभागै: समीकृतै।
त्रिपुरप्रीतिदो गंधस्तथा चाण्डाश्व शम्भुना।।
 -कालिका पुराण
केशर अगुरु, कस्तूरी, चंद्रभाग, गोरोचन,
तमाल और जल को समान रूप में मिलाकर बनाया जाता है। यह शैव अष्टगंध कहलाता
है। इस चन्दन लेप को राहुकाल में  शिंवलिंग पर लगाने से चांडाल, अचानक हानि, मृत्यु का डर तथा अंदरूनी भय मिट जाता है।

(६) हरिद्राकीटाणुनाशक होता है।
इसका तिलक चन्दन मिलकर करने से आंखों में काला पानी प्रकट नहीं होता। देह में रक्त विकार, त्वचारोग नहीं होने देता।

(७) शंखपुष्पी-का तिलक लगाने से
चिन्ता, भय-भ्रम, अवसादग्रस्त यानि डिप्रेशन से पीड़ित व्यक्ति को राहत मिलती है। याददाश्त वर्द्धक।

(८) गुलाब इत्र-प्रेम, सौंदर्य, ऐश्वर्य दायक। गुलाब का इत्र लगाने से देह के संताप मिट जाते हैं

(१०) बहुसुगन्धि-मिट्टी का इत्र, अम्बर, खस,
कदम, कस्तूरी युक्त यह तन-मन, अन्तर्मन को महकाता है।

(११) कपूर अंदरूनी डर मिटाता है।
चेहरे पर आकर्षण लाता है। गहरी नींद लाने में सहायक। कीटाणु नाशक।
अमृतम ब्राह्मी-दिमाग को संतुलित कर, स्मृति दोष मिटाती है।
बुद्धि तेज करने में चमत्कारी है।
परम् आनंद पाने और मानसिक शांति के लिए नहाने के बाद अपने माथे पर अमृतम चन्दन का टीका- तिलक, बिन्दी या त्रिपुण्ड के रूप में 7 दिन लगाकर  चमत्कारों का अनुभव एवं एहसास करें। एक बार मंगवाकर देखें। ऑनलाइन उपलब्ध
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जाने- शरीर में देवताओं के 12 स्थान!

त्रिपुण्ड देह में कहाँ-कहाँ लगाएं….
पद्मपुराण में लिखा है कि मस्तक पर  तिलक कैसे लगाएं।  चन्दन लगाने की विधि का वर्णन महादेवजी द्वारा पार्वतीजी को बताया गया है। शरीर के विभिन्न स्थानों पर लगाये जाने वाले तिलक के स्थान व उनके नाम भी स्पष्ट किये गये हैं

यथा-’ललाट में अग्निदेवता,

कण्ठ में श्री वायु देवता,

नाभि में सूर्य देवता,

हृदय में ॐ,

बांयी पसली में चन्दमा देवता,

दाहिनी पसली में त्रिविक्रम,

मस्तक पर रूद्र देवता,

पीठ में पद्मनाभ नाग,

कानों में गंगा-यमुना नदी, तथा

भुजाओं में श्रीकृष्ण और हरि का निवास होता है। इन सब वर्णित स्थानों पर त्रिपुण्ड लगाने से सृष्टि के बारह देवता प्रसन्न एवं संतुष्ट होते हैं और पितरों की कृपा प्राप्त होती है। कालसर्प दोष शांत होता है

सनातन धर्म के सभी पंथों, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं।

कितनी तरह के होते हैं तिलक
अमृतम चन्दन का त्रिपुण्ड साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक है। शिव परम्परा में 72 और वैष्णव परंपरा में चौंसठ प्रकार के तिलक बताए गए हैं।

तीनों अँगुलियों द्वारा बाये नेत्र से दाहिने नेत्र तक ही छः अंगुल भस्म की रेखाएँ लम्बी हों।
भस्म लगाने से पहले भस्म को अभिमन्त्रित कर लेना चाहिये । भस्म को बायी हथेली पर रखकर जलादि मिलाकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़े –

ॐ अग्निरिति भस्म । ॐ वायुरिति भस्म।

ॐ जलमिति भस्म । ॐ स्थलमिति भस्म।

ॐ व्योमेति भस्म । ॐ सर्वं ह वा इदं भस्म।
ॐ मन एतानि चक्षूंषि भस्मानीति।

भस्म का अभिमन्त्रण कैसे करें…
ॐ यद्देवेषु त्र्यायुषमिति भुजायाम्।
ॐ तन्नो अस्तु त्र्यायुषमित ह्रदये।
भस्म लगाने का मन्त्र…..

 नमः शिवाय च शिवाय नमः

ॐ शम्भूतेजसे नमः या
ॐ त्रिलोकीनाथाय नमः।

इन तीनों मन्त्रों को बोलते हुए ललाट, ग्रीवा, भुजाओं और ह्रदय में भस्म लगाये, अथवा निम्नलिखित भिन्न-भिन मन्त्र बोलते हुए भिन्न-भिन्न स्थानोंमे भस्म लगाये –

ॐ त्र्यायुषं जमदग्नोरिति ललाटे ।
ॐ कश्यपस्य त्र्यायुषमिति ग्रीवायाम् ।

मस्तक, ललाट, कण्ठ, दोनों कंधों, दोनों भुजाओं, दोनों कोहनियों, दोनों कलाईयों, हृदय, नाभि, दोनों पसलियों एवं पीठ यह सोलह स्थान हैं जहां भस्म लगाना चाहिए। इन सभी अंगों पर अलग-अलग देवताओं का वास होता है। नित्य तिलक करने वालो को शिर पीडा नही होती

स्कंदपुराण में तिलक हीन व्यक्ति का दर्शन करना भी निषेध कहा गया है।

एक बात विशेष ध्यान देवें…. बहुत पुरानी कहावत है

बिना विचार, जो करे-वह पीछे पछताय

गुगल या मीडिया पर दी गई कोई भी जानकारी हो, लेकिन इसमें शास्त्रोक्त सन्दर्भ या पुस्तक, ग्रन्थ का नाम न हो, तो वह ज्यादा भरोसे लायक या

पूर्ण विश्वसनीय जानकारी नहीं होती।

 गूगल पर बहुत सारा मनगढ़त अधकचरा ज्ञान पड़ा हुआ है।

सावधान रहें जरा भी गलत, झूठी, भ्रमित जानकारी बिना सन्दर्भ या किताब के विश्वसनीय नहीं होती। इससे भारी नुकसान हो सकता है। अमृतम पत्रिका के सभी लेखों में ग्रन्थ, पुराण, पुस्तक, उपनिषद आदि का सन्दर्भ अवश्य दिया जाता है। अमृतम द्वारा लिखे गए लेख ज्ञान-विज्ञान की कसौटी पर खरे होते हैं। जैसा वेद, ग्रन्थों ने बताया, हम सरल भाषा और वैज्ञानिक तरीके से उसे प्रकाशित कर देते हैं।

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कुछ तो खाशियत है चन्दन में

चन्दन के मामले में कवि तुलसीदास का योगदान भी कम नहीं है। करीब 500 वर्ष पहले ही लिख गए थे चन्दन का महत्व।

मानस की यह पंक्तियाँ सर्वविदित हैं-

 चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़ , तुलसीदास चंदन घिसें ,तिलक देत रघुबीर .

इस प्रकार तिलक, त्रिपुण्ड, बिन्दी या टीका विज्ञान और दर्शन का साथ-साथ समावेश है।

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माँ का भी महत्व है-

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नारद जी के नाटक जाने

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हनुमानजी के रहस्य-

कलयुग में चराचर जीव-जगत के

जीवन की जबाबदारी हनुमानजी पर है। माँ अंजना के आशीर्वाद फलस्वरूप इन्हें चिंरजीवी होने का वरदान प्राप्त है। पवनपुत्र के चमत्कार की चर्चा चलचित्रों से लेकर ग्रन्थ-पुराणों में मिलती है। इन्हें चन्दन की जगह सिन्दूर का चोला चढ़ाने की परम्परा है। इनकी भक्ति से तन-मन चमक जाता है।

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